दहेज बन्द करु
देहज बन्द करु
कन्नारोहट भऽरहल छल,
भोरे-भोर हमर पड़ोसियाक आगन मे।
हूलिमालि मचल छल गाम मे,
अपस्याँत लोक, कानैत जनानी सब,
सब आबि रहल छल ऐ आंगन मे।
हमहुँ बिछाउन सँ उठि पड़ैलौँ,
जा पहुँचलौँ हूलिमालि मचल पड़ोसियाक आंगन।
भारी लोक जुटल छल, मौगी-मूनसा आ धीया-पूता।
खुसुर-फुसुर गप्प एक-दोसर मरद आ जनानी मे।
हमरा किछु नै बुझना जाइत छल!
हम पुछलौँ, फन्ना काकी कि भेलए यै ?
कहलक, फन्नाक ननकिरबी आगि सँ झड़कल मरल अछि।
हम पुछलौँ, कोना यै काकी?
कहलक, ननकिरबीक लहास ओकर सासुर सँ नैहर ऐलएयऽ।
हम पुछलौँ, आगि मे कोना झड़कि मरल?
कहलक, यएह तँ अखन नै बुझलौँ ह गैय बुच्ची।
हम जुटलौँ खोज-खबरि मे, ई कोना भेल?
बात पता चलल, सब दहेजक अछि ई खेल।
भरल आंगनक भीड़ केँ चीड़ैत जखन पहूँचलौँ हम,
लहास देखि ठाढ़ होमए कऽ हिम्मत नै रहल।
खनए मे भीड़ सँ बहरइलौँ नोर टपकाबैत हम।
आंगनक हाल की छल ऐ क्षण, सोचि सकैत छी अहाँ?
हमहुँ सोचि मे पड़ि गेलौँ, जे ई की भेल?
कि! एखनो ऐ तरहक भऽ सकैए।
लोक पढ़ैत-लिखैत छथि आ अपना केँ बुधियारो बूझैत छथि।
मुदा? तैयो ऐ तरहक दृश्य देखऽ पड़ैत अछि!
देह सिहरि उठल हम्मर, हमरो भगवान हमहु त आखीर बेटी छी ।
मरद तँ मरद, जनानियो ऐ तरहक कुकर्म करैत छथि।
अपने जनानी भऽ कऽ, एकटा दोसर जनानी केँ जड़ाबैत मारैत छथि।
ई गामे टा नै, शहर मे सेहो खूब होइत अछि।
अपना केँ सभ्य कहैबला लोक, एना खसि जाइत छथि।
टोल-पड़ोस आ समूचा गाम कानि रहल छल।
ई की भेल, ई की कऽ देलक मुचंट दहेजक राक्षस !
जे कहियो ऐ गामक माटि आ आंगन मे,
जनम् लेलक, हँसि-बोलि-खेलि नमहर भेल छलि।
नवातुरे मे आइ "शिकुया",
बीच आंगन मे झड़कल, जड़ल बौक बनि पड़ल अछि
Unknown .writer
हे हम हाथ जोईर कहैत छी बन्द करु आबो त मनुख्ख बनू
✍अज्ञात
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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कन्नारोहट भऽरहल छल,
भोरे-भोर हमर पड़ोसियाक आगन मे।
हूलिमालि मचल छल गाम मे,
अपस्याँत लोक, कानैत जनानी सब,
सब आबि रहल छल ऐ आंगन मे।
हमहुँ बिछाउन सँ उठि पड़ैलौँ,
जा पहुँचलौँ हूलिमालि मचल पड़ोसियाक आंगन।
भारी लोक जुटल छल, मौगी-मूनसा आ धीया-पूता।
खुसुर-फुसुर गप्प एक-दोसर मरद आ जनानी मे।
हमरा किछु नै बुझना जाइत छल!
हम पुछलौँ, फन्ना काकी कि भेलए यै ?
कहलक, फन्नाक ननकिरबी आगि सँ झड़कल मरल अछि।
हम पुछलौँ, कोना यै काकी?
कहलक, ननकिरबीक लहास ओकर सासुर सँ नैहर ऐलएयऽ।
हम पुछलौँ, आगि मे कोना झड़कि मरल?
कहलक, यएह तँ अखन नै बुझलौँ ह गैय बुच्ची।
हम जुटलौँ खोज-खबरि मे, ई कोना भेल?
बात पता चलल, सब दहेजक अछि ई खेल।
भरल आंगनक भीड़ केँ चीड़ैत जखन पहूँचलौँ हम,
लहास देखि ठाढ़ होमए कऽ हिम्मत नै रहल।
खनए मे भीड़ सँ बहरइलौँ नोर टपकाबैत हम।
आंगनक हाल की छल ऐ क्षण, सोचि सकैत छी अहाँ?
हमहुँ सोचि मे पड़ि गेलौँ, जे ई की भेल?
कि! एखनो ऐ तरहक भऽ सकैए।
लोक पढ़ैत-लिखैत छथि आ अपना केँ बुधियारो बूझैत छथि।
मुदा? तैयो ऐ तरहक दृश्य देखऽ पड़ैत अछि!
देह सिहरि उठल हम्मर, हमरो भगवान हमहु त आखीर बेटी छी ।
मरद तँ मरद, जनानियो ऐ तरहक कुकर्म करैत छथि।
अपने जनानी भऽ कऽ, एकटा दोसर जनानी केँ जड़ाबैत मारैत छथि।
ई गामे टा नै, शहर मे सेहो खूब होइत अछि।
अपना केँ सभ्य कहैबला लोक, एना खसि जाइत छथि।
टोल-पड़ोस आ समूचा गाम कानि रहल छल।
ई की भेल, ई की कऽ देलक मुचंट दहेजक राक्षस !
जे कहियो ऐ गामक माटि आ आंगन मे,
जनम् लेलक, हँसि-बोलि-खेलि नमहर भेल छलि।
नवातुरे मे आइ "शिकुया",
बीच आंगन मे झड़कल, जड़ल बौक बनि पड़ल अछि
Unknown .writer
हे हम हाथ जोईर कहैत छी बन्द करु आबो त मनुख्ख बनू
✍अज्ञात
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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