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मिथलाक छैठिक सामग्री आ पूजाक विधान

मिथलाक छैठिक सामग्री आ पूजाक विधान
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    आस्था विश्वासक अति कठिन पावैन!अहि छैठ में ओना त बहुत रास सामग्री अछि।किछु अहिठाम प्रदर्शित अछि आरो बहुत रास सामग्री अछि जिनका जेहन कोवला तेहन समानक ओरियान।अत्यधिक मेठैन वला शीघ्र फलदायी इ पावैन मैथिल लोकनि बड पवित्र श्रद्धा विश्वास सौं करैत छथि।बहुत लोकनि के संपूर्ण होईछनि त किछुलोक के अंशत: किन्तु सबमें बड उल्लास।मूलतः अपन आ परिवारक आरोग्यता लेल भगवान सूर्य के अर्घ्य देल जाई छनि।इ पावैन केला सौं असाध्य स असाध्य पाप रोगक निदान भय जाईत अछि।सूर्य के उपासना सब पापक समूल नष्ट कय उज्वल काया आ सर्व मनोरथ सिद्ध करैवला छैठ। चौठके व्रती नहा कऽ अरवा-अरवैन खा प्रात पंचमी के जकरा खरना पावैन कहल जाई अछि दिनभरि उपास रहि साँझखन नव चूल्हि पर नव कोहा में गूड़खीर बना डालीक अनुसार वा एकेठाम उत्सर्ग कऽ कुमारि संग अपनो खाय प्रसाद बंटै छथि खरनाक बाद व्रती लगभग 36 घंटा जा धरि पारणा नै होई छनि निराहारे रहै छथि।इ कठिन व्रत केनहार के कोटि-कोटि प्रणाम। षष्ठी दिन व्रती नित्यकर्म सौं निवृत भऽ  नाना प्रकारक पकवान पवित्रताक खास ख्याल रखैत छठिक गीत गुनगुनैत बनवै छथि। साँझखन सूर्यास्त सौं पहिने व्रत करै वाली वा करै वला नव वस्त्र पहिरि नदी वा पोखैर जतय पूर्व सौं सगर समाज द्वारा छील बना नीपी केराक थम्ह रंग विरंगक पताका छठिक गीत बजैत बाजा लागौने रहै छथि पहुँचि,जतेक गोटाक निमित्ते अर्घ्य देवाक रहै छनि ततेक डाली सूप वा ढाकन अर्घ्य सामग्री जेना ठकुआ भुसवा मधुर नारियल कुशियार केरा सामयिक फल फूल पान सुपारी धूप दीप अंकुरी आदि सजा पुरष वा स्त्री जे कियो व्रत करै छथि जल में सूर्यक मूँहे ठार् होई छथि।

☆पूजा विधान-----
 पुरूष आ विधवा कूश, तील, जल लऽ आ सधवा दुवि अक्षत लऽ इ संकल्प करै छथि-

"नमोऽद्य कार्तिक मासीय शुक्ल पक्षीय षष्ठम्यां तिथौ अमुक गोत्रस्य अमुक नाम शर्मन जन्म-जन्मान्तरार्जित ज्ञाताज्ञात कायिक वाचिक मानसिक सकल पाप क्षयपूर्वक चिरंजीवी पुत्र पौत्रादि गोधन धान्यादि समृद्धि सुख सौभाग्य अवैधव्य सकल कामावात्पि-काम अद्य प्रातश्च  सूर्यायार्घमहं दास्ये।"

***अमुक गोत्र के जगह अपन गोत्र आ अमुक नामके जगह अपन नाम ली।


संकल्प के बाद अक्षत ल-"नमो भगवान सूर्य इहागच्छ इहतिष्ठत" सराय में अक्षत अर्पण कय राखि जल लय-एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्नानीय पूनराचमनीय नमो भगवते श्रीसूर्यनारारणाय नम: कहि जल चढा फूल में लाल चानन लगा लाल फूल, दुबि अक्षत पकवान सहित जल लऽ सूर्य के दैखैत नमोस्तु सूर्याय नम:। कहि सब डाली उत्सर्ग कय बहुत लोकनि घर आवि वा बहुत ओहिठाम भरिराति रहै छथि।पुन: भोर में वेह सब सामग्री के सूर्य के उत्सर्ग कय सूतजी द्वारा शौनकादि ऋषिक कहल कथा श्रवण करै छथि।कथा सुनलाक बाद पूजित देवता के प्रणाम कय विसर्जन कऽ ब्राह्मण के यथासाध्य दक्षिणा आ प्रसाद दऽ व्रति पारण करै छथि।
  अहि तरहे जे इ पावैन श्रद्धा पूर्वक करै छथि धन-धान्य सुहाग संतान संततिक रक्षा निरोगी काया आ मनोवांछित फलक भागी होई छथि।
मिथिला पेज सँ साभार

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पोस्ट-: अशोक कुमार सहनी
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