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नारी के सम्मान आ प्रेम आदिवासी समाज सँ ग्रहण क सकैत छी

नारी के सम्मान आ प्रेम आदिवासी समाज सँ ग्रहण क सकैत छी



✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

हमर पिता ताइदिनक छोटानागपुर आ अजुका झारखण्ड में खादी भंडार में नोकरी करैत छलाह। आदिवासी सब लेल किछु ने किछु योजना चलबैत रहैत छलाह। हुनका संगे हम नेने सँ रहैत रही। शुरू में पिताजी लोहरदगा, घाघरा, सिमडेगा आदि क्षेत्र में रहथि जतय कुल जनसंख्या केर बहुत पैघ भाग आदिवासी सबहक रहैक। सेन्हा में किछु बनिया, तेली, राजपूत, ब्राह्मण, कुरमी, लोहार, आ मुसलमान सेहो रहैक। आदिवासी में मूल रूप सं ओरांव आ मुन्डा लोकक जनसंख्या रहैक। दुनू आदिवासी अपन भाषा ओरांव आ मुंडारी बजैत छलैक। दुनू के भाषा आ वेष भिन्न। सामान्य लोक ओकर सबहक भाषा नहि बुझि पबैक।  स्थानीय लोक सब एक दोसर सं या एक आदिवासी के लोक दोसर आदिवासी समुदाय केर लोक सं जे भाषा अर्थात लिंक भाषा में बात करैक तकर नाम रहैक सादरी। सादरी सब बुझैक। आई काल्हि सादरी भाषा झारखण्ड में प्रचलित लोकभाषा के स्थान ल लेने अछि। एकर पढाई सेहो बहुत ठाम स्कूल, कॉलेज सब में शुरू भ गेल छैक। आब एकरा खोरठा भाषा कहल जाइत छैक। एहि में नाना तरहक साहित्य केर रचना लोक क रहल छथि। अनेक पोथी, पत्रिका, स्मारिका आदि छपैत रहैत छैक। 

आदिवासी समाज केर लोक निश्छल होइत छल। एखनो ओ निश्छलता ओकर चेहरा पर परिलक्षित होइत रहैत छैक। एक बात आरो जे एहि समाजक लोक के होइत छैक जे ओकर सभक निश्छलता, सहजता आ प्रकृति प्रेम के देखबैत छैक ओ ई जे आदिवासी लड़का लड़की स्नान मुक्त आकाश में करैत अछि। ककरो प्रति ककरो कुनो कुप्रबृत्ति नहि भेटि सकैत अछि। प्रेम त प्रकृति केर गहना छैक। प्रेम आदिवासी युवक आ युवती में सेहो होइत छैक आ खूब होइत छैक। होबाको चाही। मुदा प्रेम में घृणा आ दोसरक मर्यादा के हनन के भाव सर्वथा नहि रहैत छैक। कतेक आदिवासी लड़की जकर अवस्था 17-25 वर्षक रहैत छलैक से सब अपन वक्ष के केवल एक पतरका लाल गमछा सँ झपने नाहैत छलि। निर्विकार भाव, ने डर ने भय। ककरो कुदृष्टि ओकर अंग, यौवन पर कुनो दोसर भाव सँ नहि जाइत छलैक। 

आदिवासी युवतीक शरीर गसल-गसल, चमकैत केश, शायद करंजक तेल केर व्यवहार आ प्रकृति सँग रहबाक कारणे गजब के झमटगर आ खूब कारी। घरों पर कुमारि कन्या सब निचा में स्कर्ट अथवा छोट सन नुआ पहिरने आ अपन सुन्दर, सुडौल वक्ष के मात्र पातर सन आधा ट्रांसपरेंट ललका गमछा सँ झपने सब काज करैत। निर्विकार भाव आ ओकर चेहराक भाव जे देखत ओकरा ओकर भाव में अद्भुत सौन्दर्य आ सौन्दर्यशास्त्री के ओहि में सकुन्तला के साक्षात् स्वरुप भेट सकैत छलैक। छोट-छोट आँखि, कारी मुदा भरल-भरल देह, दाड़िम सन गसल आ दूध जकाँ चकमक करैत दात, विकसित नितम्ब एक आदिवासी नायिका के विश्व सुन्दरी बना दैत छैक। ओ बाला मतबाला सभक मोन में बैस जाइत अछि। बाला अपन प्राकृतिक सुंदरता सँ लबालब भरल बनबाला बनि जाइत अछि। ककर मोन भला एक क्षण लेल ओहि बनबाला के अपन बाहुपाश में लेबाक नहि करतैक? लेकिन तमाम प्रक्रिया में निश्छल सौन्दर्य छैक, विकृति अथवा आन बात नहि। ओहि आनंद केर अनुभूति आ दर्शन करबाक हेतु सौन्दर्य केर ज्ञान भेनाई आ ओकर दर्शन कर आनंद लेबक कला में महारथी भेनाई परमावश्यक ।
 हमरा लेल जनजातीय जीवन आ परंपरा केर गाइड छल हमर स्कूल केर सङ्गी-साथी जाहि में अधिकांश आदिवासी लड़का लड़की छ्ल।  आदिवासी सब बाल-विवाह नहि करैत अछि।  कुनो लडकी के विवाह 20 वर्ष सं पहिने नहि होइत छैक।  एक बात आरो, आदिवासी समाज केर माता पिता प्रेम के मामला में कनि नहि बल्कि बहुत अधिक उदार होइत छथि। हुनका लड़का लडकी के आपसी प्रेम में कुनो बड्ड आपत्ति नहि होइत छनि। अगर कुनो लड़की कुनो लड़का सं प्रेम करैत अछि प्रेमाधिक्य में किछु एहनो-ओहनो भ जैत छैक तकर बादो अगर कुनो कारने दुनू के लगैत छैक जे एक संगे जीवन संभव नहि अछि त दुनू सहजता सं ओहि बन्धन सं मुक्त भ सकैत अछि।  ओहि लड़की के अथवा लड़का के मिथिला समाज जकां चरित्रहिन नहि बुझल जैत छैक। ओ केहनो लड़का सं विवाह क सकैत अछि।  विवाह में कुनो वाधा नहि होइत छैक।  माता पिता सेहो एहि बात के सहजता सं स्वीकार क लैत छथि।  काश! अपना आपके विकसित, ज्ञानी, पैघ आ सर्वश्रेष्ट कहेबला मैथिल समाज एहि लघु समाज सं प्रेमक आ स्वतंत्रता केर परिभाषा सीख लितथि???


एक बेर एक आदिवासी लड़का जे प्रखंड विकास पदाधिकारी रहैक केर विवाह ठीक भेलैक। हमर पिता पुछलथिन, "की सब भेटल सासुर सँ?" 
ओ आदमी कनि असहज होइत बजला, "की भेटत, सब सँ पैघ बात ई जे एक लड़की भेटल। ओ हमर पदनाम, मूल, गोत्र सब स्वीकारि लेलक। एक आर्थिक, सामाजिक आ आनुवंशिकता के बढ़बय बाली आबि गेली, अहि सँ नीक कथी भ सकैत छी?" 

हमर पिता आदिवासी समाज के एहि बात जानि बहुत आश्चर्यचकित भेला। जखन हमर पिता सँ ओहि व्यक्ति के ई ज्ञात भेलैक जे अपना अर्थात मैथिल समाज में लड़की बला लड़का बला के बहुत पाई आ वस्तु दहेज़ के रूप में दैत छथि त ओ आश्चर्य आ घृणा केर भाव सँ भरि गेलैक। कारण लड़का बला के आर्थत ओ आदिवासी युवक अपन होमय बाली पत्नी के माता पिता के विवाह सँ पूर्व एक बरद, एक सुगर, एक मोन चाउर देने रहैक। 

ओ व्यक्ति हमर पिता के सम्मान दैत बाजल: "केहेन बात कहैत छी! एक त लड़की अपन घर, समाज, सब नाता छोड़ि कुल के त्यागि लड़का बला लग जिनगी भरि लेल जाइत अछि, आ ऊपर सँ लड़की बला लड़का बला के पाई आ सामान सेहो देतैक? ई कोना संभव छैक? ई केहेन समाज अछि अहाँ सभक?"

हमर एक जनजातीय मित्रानी कहली, "केहेन संस्कार अछि अहाँ समाजक?  जे सीता अहाँक मिथिला के छलि जिनकर हाथ पत्नी के रूप में ग्रहण करबा लेल के के नहि पहुचल। साक्षात् विष्णुअर्थात भगवन राम धनुष तोड़ि सीता के अपन पत्नी बनेलनि। ताहि सीता के माता पिता के आई राम अनबाक हेतु पाई आ वस्तु के व्यवस्था करय पड़ैत अछि! ऊपर सँ समाज विकसित अछि ताहि बातक दम्भ?"

आब होइत अछि  ओ ठीके त छलि। अतेक शुद्ध मोनक आ उदार होइत अछि आदिवासी सब। छली आ सब कर्म सं भरल अछि अपन मैथिल समाज। अनेरे सभ्यता आ संस्कृति में पैघ होमाक दंभ भरैत रहैत अछि। आदिवासी सब के असभ्य, जंगली, अशिक्षित, अविकसित आ ने जानि की-की कहैत अछि? बेटा के विवाह में जखन निर्लज्ज भेल अपन आ बेटा केर पद, प्रतिष्ठा, शिक्षा आदि के तराजू केर एक पलड़ा में राखि निरंकुश बनिया जकां तौलैत अछि आ मोल-भाव करैत अछि ताहि काल कत जैत छैक मर्यादा?

एक दिन हम आ किछु आरो आदिवासी लड़की-लड़का संगे अगल  बगल केर एक गाम में घुमक हेतु गेल रही।  एकाएक एक घर सं एक महिला के दर्द सं चिचियेबक अबाज एलेक. हमर पैर झट दनि ठमकि गेलनि। तुरते एक पुरुख केर आवाज़ सेहो ओहिना एलैक. हमरा भेल जरुर परिवार में कुनो अनिष्ट भेल छैक।  मुदा कानब में शारीरिक पीड़ा केर भाव बुझा रहल छलैक। एकर बादो अगल-बगल केर स्त्रिगन आ पुरुख मस्त भेल हँसैत आ अपना काज में भेर। हमरा किछु नहि फुरा रहल छल। 
हम एक लड़की सँ जिज्ञासा कैल: “ई की भ रहल छैक?” एहि पर एक आदिवासी युवती कहलनि:
 “ एहि घर में एक महिला के प्रसव वेदना भ रहल छैक। थोड़ेक काल में बच्चा जन्म लतैक तकर निश्चित सम्भावना छैक। ओहि प्रसव पीड़ा सं ई महिला कानि रहलि छैक।” आश्चर्य व्यक्त करैत हम पुनः जिज्ञासा कलह:  “चलू, ई बात त स्पष्ट भेल। मुदा महिला संगे पुरुख कथी लेल कानि रहल अछि?” आब ओ आदिवासी बाला बात के फरछाबैत बजली, “सुनु,  हमरा आदिवासी समाज में एहेन परंपरा छैक जे पुरुख ई अनुभव करै जे कोना एक स्त्रीगन प्रसव के समय दर्द सं छटपटाईत छैक, कोना वेदना सहैत छैक? अगर पुरुख के ई अनुभूति शुरू में भ जैक त ओकर प्रेम दुनू – संतान आ पत्नी – सं अत्यधिक बढ़ि जेतैक। अहि परंपरा के कुआवाद या सह्प्रसविता कहि सकैत छी। एहि में प्रसव पीड़ा के समय गर्भवती महिला संगे ओकर पति के सेहो दोसर घर में बंद क देल जैत छैक। जेना-जेना पत्नी अपन घर सं कानतैक आ तहिना-तहिना पति के कनबाक छैक। अहि में अभिनय नहि यथार्थ होइत छैक। जखन बच्चा के जनम भ जैत छैक त पुरुख के घर सं बाहर निकालि देल जैत छैक।” 

हमरा भेल, “कतेक निक परंपरा छैक ओहि समाजक जकरा लोक अशिक्षित, असभ्य, जंगली, आ ने जानि कोन-कोन उपहासक बात सं तुलना करैत तुच्छ बुझैत अछि।"/

लेखकः-✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जी





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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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