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कानू जुनि औ मैथिल, आबहु जागू

👃कानू जुनि औ मैथिल, आबहु जागू👃


✍👤प्रणव नार्मदेय


सदिखन जाय अनभुआर डांरि
गौरबे आन्हर जे भेल फिरय
अप्पन सहरजमीन जे बिसरल
ठोकर खाय मुँह भ'र गिरय

परभाखा बरु मौसिए सन नेही
माय'क आंचरक गन्ह कतय
अप्पन सन कतबहु ओ लागओ 
परदेस में माटि'क रंग कतय

जानि कोन पापें देस छुटल अछि
आबहु चेतू औ मैथिल प्राण
माय केर जं सम्मान देलहुं नहि
केहन होयत भावी संतान

माय'क मुँह सं सुनल-गुनल जे
जाहि सं भेटल जीवन'क ज्ञान
पहिलुक आखर 'माय' सिखौलक
माय'क बोल मैथिली कें प्रणाम

मातृभाखा, मातृभूमि आ माय'क कोनो दोसराइत नहि।

कानू जुनि औ मैथिल, आबहु जागू!

लेख :-✍👤प्रणव नार्मदेय

कवि -प्रणव नार्मदेय जी



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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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