विद्यापति केर वयःसंधि पर ठाढ़ नायिका
💐विद्यापति केर वयःसंधि पर ठाढ़ नायिका 💐
✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
सैसव जौवन दुहु मिलि गेल।
श्रवनक पथ दुहु लोचन लेल।।
वचनक चातुरि लहु-लहु हास।
धरनिये चान कएल परगास।।
मुकुर हाथ लए करए सिंगार।
सखि पूछइ कइसे सुरत-बिहार।।
निरजन उरज हेरई कत बेरि।
बिहँसइ अपन पयोधर हेरि।।
पहिले बदरि-सम पुन नवरंग।
दिन-दिन अनँग अगोरल अंग।।
माधब पेखल अपरुब बाला।
सैसव जौवन दुहु एक भेला।।
विद्यापति कवि तोहें अगेआनि।
दुहु एक जोग इह के कह सयानि।।
मैथिली भावानुवाद
नेनपन आ जुआनी दुनू बयस केर संगम भेल छैक। अपरूप आँखि कानक रास्ता कटाक्ष करबा लेल पकड़ि लेने छैक। शब्द चातुर्य में माहिर नायिका ऐना नहु-नहु हँसैत अछि जेना चांदनी अपन छटा बिखेरने हो! अपने हाथ में ऐना लेने अपन सिंगार करैत नायिका सखि सब सँ प्रश्न करैत छथि: "काम क्रीड़ा केर अनुभव कहु ने केहेन होइत छैक?" असगर में अपन उन्नत वक्ष के निहारि रहलि छथि आ बेर-बेर अमृत घट सन गढ़ल कुच के देखि प्रसन्न होइत मंद-मंद हँसैत छथि। नायिका केर वक्ष प्रारम्भ में बेर फल सन आ तत्पश्चात बढ़ैत क्रम में समतोला सन्हक भ गेल छनि। कामदेव ई देखि ततेक लोभा गेला जे सब काज धंधा छोड़ि नायिका के घरक समक्ष डेरा खसा लेने छथि। हे माधव, आई वयःसन्धि पर ठाढ़ एक नायिका के देखल जकर नेनपन आ जुआनी केर संगम एके संगे भ रहल छैक। विद्यापति कहैत छथि, अज्ञानी नहि बनु, ज्ञानी बनु आ देखु दू रूप केर अपरूप मिलान कोना भ रहल छैक।
हिन्दी भावानुवाद
बचपन और जवानी मानो दोनों अवस्थाओं का संगम हो गया है। दो सुन्दर नयनों ने कानों की राह पकड़कर कटाक्ष करना सीख लिया है। बोलने में तो इसे अद्भुत चातुर्य ह ही ऊपर से मन्द-मन्द हंसी देखकर लगता है जैसे चांदनी ने अपना प्रकाश बिखेड़ दिया हो। हाथ में आईना लेकर अपना श्रृंगार कर रही है और सखियों से पूछती हैं “बताओ केलि-क्रिया का अनुभव”! एकांत में अपने उन्नत वक्षस्थल को बार-बार निहारती रहती है और अपने अमृत भरे वक्ष की सुन्दरता और कामुकता से प्रफुल्लित होते हुए मन्द-मन्द मुस्काती रहती है। उसके कुच प्रारंभ में बैर फल के सामान छोटे फिर नवरंग अर्थात नारंगी या नींबू जैसे दिखने लगे हैं। कामदेव तो इस विकास को देखकर इतना कामुक हो सब कुछ छोड़कर वहीँ डेरा डाल दिया है (जिससे हर पल नायिका के विकशित होते हुए दैहिक सौन्दर्य को निहारता रहे)। हे माधव, एक अपूर्व वयःसंधि पर खरी नायिका को देखा हैं जिसका सैसव और जौवन दोनों का एक साथ संगम हो रहा है। विद्यापति कहते हैं की अज्ञानी मत बनो, सयानी बनो और देखो किस तरह दो रूप का सफल मिलन हो रहा है?
Poetic Translation in English
The childhood and youth are merged together
Her eyes have taken the path to her ears (to a appreciate the beauty)
Queen of soft words, she smiled slowly
As if the moon is appeared on the earth with its radiant light.
Holding a mirror she arrays herself
And casually inquires, "What is the game of love, my dear friends?"
Time and again she secretly looked at her breasts
Smiling to see her breasts looking like two vessels filled with nectar.
Initially like a plum, then again like an orange
Physical charm day by day enfolds her limbs
Seeing her symmetrical body cupid decided to stay with her
O Madhava! I saw a most beautiful girl,
Childhood and youth were one in her!
Oh foolish maid; says Vidyapati
The wise would say, the Twain have met.
✍👤कैलाश कुमार मिश्र
💝💝💝💝💝💝💝💝🎼💝💝💝💝
पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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| Photo courtesy: श्रीमती Mukti Jha। |
✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
सैसव जौवन दुहु मिलि गेल।
श्रवनक पथ दुहु लोचन लेल।।
वचनक चातुरि लहु-लहु हास।
धरनिये चान कएल परगास।।
मुकुर हाथ लए करए सिंगार।
सखि पूछइ कइसे सुरत-बिहार।।
निरजन उरज हेरई कत बेरि।
बिहँसइ अपन पयोधर हेरि।।
पहिले बदरि-सम पुन नवरंग।
दिन-दिन अनँग अगोरल अंग।।
माधब पेखल अपरुब बाला।
सैसव जौवन दुहु एक भेला।।
विद्यापति कवि तोहें अगेआनि।
दुहु एक जोग इह के कह सयानि।।
मैथिली भावानुवाद
नेनपन आ जुआनी दुनू बयस केर संगम भेल छैक। अपरूप आँखि कानक रास्ता कटाक्ष करबा लेल पकड़ि लेने छैक। शब्द चातुर्य में माहिर नायिका ऐना नहु-नहु हँसैत अछि जेना चांदनी अपन छटा बिखेरने हो! अपने हाथ में ऐना लेने अपन सिंगार करैत नायिका सखि सब सँ प्रश्न करैत छथि: "काम क्रीड़ा केर अनुभव कहु ने केहेन होइत छैक?" असगर में अपन उन्नत वक्ष के निहारि रहलि छथि आ बेर-बेर अमृत घट सन गढ़ल कुच के देखि प्रसन्न होइत मंद-मंद हँसैत छथि। नायिका केर वक्ष प्रारम्भ में बेर फल सन आ तत्पश्चात बढ़ैत क्रम में समतोला सन्हक भ गेल छनि। कामदेव ई देखि ततेक लोभा गेला जे सब काज धंधा छोड़ि नायिका के घरक समक्ष डेरा खसा लेने छथि। हे माधव, आई वयःसन्धि पर ठाढ़ एक नायिका के देखल जकर नेनपन आ जुआनी केर संगम एके संगे भ रहल छैक। विद्यापति कहैत छथि, अज्ञानी नहि बनु, ज्ञानी बनु आ देखु दू रूप केर अपरूप मिलान कोना भ रहल छैक।
हिन्दी भावानुवाद
बचपन और जवानी मानो दोनों अवस्थाओं का संगम हो गया है। दो सुन्दर नयनों ने कानों की राह पकड़कर कटाक्ष करना सीख लिया है। बोलने में तो इसे अद्भुत चातुर्य ह ही ऊपर से मन्द-मन्द हंसी देखकर लगता है जैसे चांदनी ने अपना प्रकाश बिखेड़ दिया हो। हाथ में आईना लेकर अपना श्रृंगार कर रही है और सखियों से पूछती हैं “बताओ केलि-क्रिया का अनुभव”! एकांत में अपने उन्नत वक्षस्थल को बार-बार निहारती रहती है और अपने अमृत भरे वक्ष की सुन्दरता और कामुकता से प्रफुल्लित होते हुए मन्द-मन्द मुस्काती रहती है। उसके कुच प्रारंभ में बैर फल के सामान छोटे फिर नवरंग अर्थात नारंगी या नींबू जैसे दिखने लगे हैं। कामदेव तो इस विकास को देखकर इतना कामुक हो सब कुछ छोड़कर वहीँ डेरा डाल दिया है (जिससे हर पल नायिका के विकशित होते हुए दैहिक सौन्दर्य को निहारता रहे)। हे माधव, एक अपूर्व वयःसंधि पर खरी नायिका को देखा हैं जिसका सैसव और जौवन दोनों का एक साथ संगम हो रहा है। विद्यापति कहते हैं की अज्ञानी मत बनो, सयानी बनो और देखो किस तरह दो रूप का सफल मिलन हो रहा है?
Poetic Translation in English
The childhood and youth are merged together
Her eyes have taken the path to her ears (to a appreciate the beauty)
Queen of soft words, she smiled slowly
As if the moon is appeared on the earth with its radiant light.
Holding a mirror she arrays herself
And casually inquires, "What is the game of love, my dear friends?"
Time and again she secretly looked at her breasts
Smiling to see her breasts looking like two vessels filled with nectar.
Initially like a plum, then again like an orange
Physical charm day by day enfolds her limbs
Seeing her symmetrical body cupid decided to stay with her
O Madhava! I saw a most beautiful girl,
Childhood and youth were one in her!
Oh foolish maid; says Vidyapati
The wise would say, the Twain have met.
✍👤कैलाश कुमार मिश्र
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| कवि - कैलाश कुमार मिश्र जी |
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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