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नारायण मधुशाला के पाँच टा गीत


नारायण मधुशाला के पाँच टा गीत 

✍👤नारायण मधुशाला 

-:दहेज विरुद्ध एक गीत:-१

बदल्नेटा मात्र नाकारात्मक' नियत
जौँ बचि जाइय घरक पैघ ईज्जत
तँ दहेजके नकारय लेल किए पछुआयल छी ?
घर-घरमे किएक' हमहीँ सब नुकायल छी ?

आगा बढु यौ भैया आगा बढु
आगा बढु हे बहिना आगा बढु
सामाजिक कैँसर भगाबय लेल शुभ काजक' सुरुवात करु
जँ बुझै छी नारी-पुरुष एक्के सम्मान बनि आयल छी

अन्धविश्वासक' गहबरमे
जारल जाइय कनिआ कोहबरमे
कतेक' दिन करब एहन व्यवहार ?
कतेक' दिन राखब घोघे तरमे ?
ओहो आजादसँ जिब सकैय, बेरी किए लगायल छी ?

आऊ संकल्प ली मतभेद नै करब
पुरुषे सन नारीयोक' सम्झब
बिना नगदके विआह करिक'
सभ्य मानवके परिचय देखायब
बुद्धिमे अचेतनाक' ताला मारि किए ओङ्घायल छी ?

गीत-२ 

याद करैत अहाँके हमर राति बिति गेल
नेहमे अहाँके बताह सन हाल हमर भेल
बुझलौँ जे अहाँ बनि गेलौँ दूरक मेहमान सन
किछ देरक लेल आबैत छी दुतियाक चान सन
स्वीकार नहियो होइत हमर  प्रेमक जपतप,
अहाँके पुजैत रहलौँ मोनेमन भगवान सन
स्वेक्षा अहाँक जिताबु की हराबु आस्थाक खेल
नेहमे अहाँके बताह सन हाल हमर भेल

.गीत-३


असफल भेलही तऽ की भेलै मिता, नै कर अपन मन छोट रौ ।
हारलोमे तु परसैत रह्नऽ, प्रेरणा भरल इजोत रौ ।।
तोरे देख कते जिबा लए सिख जेतै, करि लेतै सँघर्ष रौ ।
खिनताके कहियो बोध नै हेतै, भरल रहतै उत्कर्ष रौ ।।
मनमे विश्वास, खूनमे साहश भरिले, करिले दृढ अठोट रौ ।
असफल भेलही तऽ की भेलै मिता, नै कर अपन मन छोट रौ ।।
सब तऽ छीयौ अपने भैयारी,टाँग घैँच ककरा मन होईछो गिराबी ।
हार जीत छीयै मेहनतक खेला, आई केकरो काल्हि केकरो बाजी ।।
बढऽ दही सभके आगा, नै राख ककरो प्रति मनमे खोट रौ ।
असफल भेलही तऽ की भेलै मिता, नै कर अपन मन छोट रौ ।।
जँ अपन गल्तीके सुधारैत चलबे तऽ, सफलता कोन पैघ बात छीयै ।
लागल रह रै मिता जागल रह, सबसँ बढि आत्मसात छीयै ।।
सब दु:ख अपना लले, नै पुगऽ दही ककरो हृदयमे चोट रौ ।
आबो चेतन पुरुष बन, भेल रहबे अपने कते लोतपोत रौ ।।


.गीत-४ 

बनि चान सुरजक किरण अहाँ आबुन । हे यै प्रिय हमर दिलके अही बहलाबुन ।।
अहाँके बिना एको क्षण निक नै लागैय बेगैर अहाँके दुनियामे किछ ने भाबैय ।। आबि भटिक रहल ई मनके सम्झाबुन । प्रिय...............................................
बित ने जाय अहिना बैसल ई मधुमास । साठले ने रहि जाय कहि मोनके आश ।। मानिनी मान छोड़ि हिआसँ लगाबुन । प्रिय...............................................
वर्षोसँ पियासल छी हम तँ उपासल छी । अहीके सर्वस्व न्योछावर करि बौरायल छी ।। बड्ड तडपेलौ अहा आब जुनि तड़पाबुन । प्रिय............................................... बनि...............................................


.गीत-५ 

आऊ प्यारे आऊ आऊ ठामै पर घुमि जाऊ आऊ
चढा काँध पर हरपालो खेतके उखमाबम करि जाऊ आऊ
ई गगन अपने अछि, अपने धरती माता
सबके देखनीहार अछि एकटा भाग्य विधाता
भोकमरीसँ लडबालए चट्टान फोडि जाऊ आऊ
चढा काँध पर हरपालो खेतके उखमाबम करि जाऊ आऊ
नै हरान कर तोँ हमरा, नै परेसान कर
अछि दूइए आतर मनके नै झुझुवान कर
चढा काँध पर हरपालो खेतके उखमाबम करि जाऊ आऊ.

गीतकार - नारायण मधुशाला जी


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