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औरत के जिनगी

औरत के जिनगी..........
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✍अशोक कुमार सहनी
बाबु के घर छोइड केर जब पिया के घर जाय छै
एक लड़की जब शादी कैर के औरत बैन जाय छै
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अपनों से नाता तोइड के कोनो गैर के अपनाबै छै
अपन ख्वाहिश के जलाके दोसर के सपना सजाबै छै..
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 भोरे-भोरे जाइग के सबलेल  चाय बनाबै छै..
नहा धोके फेर सबकेलेल जलखै पकाबै छै
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पियाके विदा कैर बच्चा के टिफिन सजाबै छै..
झाडू पोछा लगाके कपड़ा धोबै में लैग जाय छै ..
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पतो नै चलै छै खकिन भोर सँ दोपहर भजाय छै.
फेर सबलेल खाना बनाबैले चूल्हा फुक जाय छै..
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साउस ससुर के खाना परोइसके स्कूल सँ बच्चा लाबै छै..
बच्चे केसंग हंसत हंसाबैत खाना खाईछै और खिलाबै छै..
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फेर बच्चा के टयूशन छोइड, झोलालके बाजार जाय छै..
घर के बहुत काम कुछे देरमें कैर लैय छै ..
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पतो नै चलै छैय दुपहरिया सँ साझ भजाय छै..
साउस ससुर के चाय बनाके फेर सँ चूल्हा-चौका में जुईंट जाय छै..
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खाना पीना खिया के फेर बर्तन में जुट जाय छै..
सबके सुताके भोरे उठैले फेर उ सुइत जाय छै..
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हैरान छि साथी ई देखके सौलह घण्टा ड्यूटी करै छै..
तैयो नै एक पैसा के मजदूरी  पाबैं छै..
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जे प्रिय मां बहन बेटी नै जानी कतेक रिश्ता बनाबै छै..
सबके नयन पोंछै मुदा अपने नयन सुखाबै छै..
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प्रणाम करै छि उ घरके लक्ष्मी के जे घरके स्वर्ग बनाबै छै..
ड़ोली में बैठके आबै छै  और अर्थी पर लेटके चैल जाय छै..

✍अशोक कुमार सहनी

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