के अपन, के आन (मैथीलि कथा)
के अपन, के आन
✒✍डा.अखिलेश झा
घनश्याम बाबू कहियो गामक जमींदार कहाबैत रहथि।पुरखाक अर्जल बिगहा के बिगहा जमीन, घरारी, गहना की नै रहनि। घनश्याम बाबूक पुत्रीक विवाह संपन्न घरमे बीस बरख पहिने भ' गेल रहनि। दूटा बेटा, एकटा विदेश के आ एकटा काठमाण्डू के भ' क' रहि गेल रहनि। सासुर एला पर कनियाँके कहियो ततेक काज नहि करय पड़लन्हि। मुदा आब घरमे लोक नहि।जमीनो-जाल अधिकांश बेटीक बियाह तथा बेटाक पढाईमे बिका गेल रहन्हि।
घनश्याम बाबु के दस वर्षक पहिने के गप मोन पड़लनि । कनियाँ घनश्याम बाबू के बहुत बेर कहि चुकल रहथिन 'एकटा काज करय बाला ताकि दिय न'। घनश्याम बाबू के एक्के टा जवाब "आब ओ जमाना रहलै, कियो नहि भेटत"।
एक दिन घनश्याम बाबू आठ-नौ साल के बच्चा ल' क' पहुँचलाह। कतय छी ये, देखू ककरा अनलहुँ।कनियाँ आबि देखैत छथि । 'इ के छी' ?
घनश्यामजी बजलाह, जत' कामति अछि इ ओतय के अछि। आब, कियो नै छै एकर। बापटा रहय ओहो रोगसँ पाँच दिन पहिने चलि बसल।
कनियाँ बजली, कनि भीतर आउ।(भीतर पहुंचला' पर ) ककरा उठा अनलहुँ? केहन लोक छै? केहन संस्कार, आ जाति कोन?
घनश्याम जी- देखू, हम एकर बाप के बड्ड दिनसँ चिन्हैत छलियै, बड्ड भला आदमी। एकरो कहियो कोनो शिकायत नहि भेटल। सब काज क' देत। हमहूँ सोचि लेने छी एकरा स्कूल मे नाउ लिखा देबै। जहाँ तक गप्प छै जातिके त' सब जातिमे नीक आ बेजाय होइत छैक। मनुख, मनुख होयत अछि।पैघ आ छोट जाति नै।
ओहि दिनसँ ओ बच्चाके घनश्याम बाबू उगना कहि क' बजबय लगलाह। एक साल बाद घनश्याम बाबू गामक डाकघरमे दू सौ रुपैया प्रतिमाह के हिसाबसँ उगनके नामे जमा करैत रहथि। खुश भ' कहियो-कहियो पाँच सौ हजार बेसियो जमा क' दैत रहथि। आइ ओ अवस्था नहि छन्हि। खेत बुझु चौपट छन्हि।लगभग चारि-पाँच बरषसँ धियो-पूता अपन दुनियाँमे अति व्यस्त रहैत छथि। धिया-पूता के फोनमे इशारा केलथि जे कनि पाइ पठा दै लेल। जहिया धान कटत त घूरा देब। मुदा ओ सब अहि बात के गंभीरतासँ नहि लेलकन्हि। इ बुझै छथि बरका शहरमे पाइके अपने खगता रहैत छै। छोटो बच्चाके दस हजार टाका महीना स्कूलमे लगैत छै। किछु मदति त' क' नहि सकैत छी उलटे माँगनाय उचित नहि से सोचला घनश्याम जी। मुदा आइ बात किछु आर अछि। रबिन्द्र जे अखन ठीकेदारी करैत अछि ओकरासँ छः महीना पहिने बीस हजार टाका कनियाँ के इलाज लेल पैंच लेने रहथि से चुका नहि सकला'। दू महीनासँ तगादा करैत रहनि। आइ कहि देलकनि जे पाइ घुराउ नहि त' खराप होयत। पम्पिंग सेट,पलंग, कुर्सी जे दलान पर अछि से सब उठा क' ल'जायब।
घनश्याम बाबूसँ एना कहियो नहि बाजल रहय रबिन्द्र। मोन गेलनि दलान परहक पलंग पर। बड्ड श'ख सँ बाबू बनबेने रहथि। शहरसँ मिस्त्री बजा क', शुद्ध सखुआके नक्काशी कयल। पाँच आदमी त' ठाठसँ सुति सकैत अछि। घनश्याम बाबूकेँ ओ पलंग बड्ड प्रिय। दस-पंद्रह दिनमे त' उपाय भ' जेतै मुदा आइ?
भीतर कनियाँ पुछैत छन्हि त' सब बात कहैत छथि।कनियाँ कहैत छन्हि लिय इ चूड़ी, दू भरि सोनक बनल। बन्हकी राखू या बेच क' ओकर पाइ घूरा दियौ।घनश्याम जी सोचैत छथि आब शहर जायब, जहाँ सोनार बुझत जे बेगरता अछि उचित दामो नहि देत मुदा उपाय कोन?
केबारक दोगसँ सब बात सुनैत उगनाके रहल नहि गेलै आ बाजल। हमर नाउमे जे पाइ अछि ओ कहिया काज लगतै? घनश्याम बाबू आ कनियाँ अवाक भ' देखलक उगनाके। घनश्याम बाबू नोरा गेला'।कहलखिन्ह नहि रे, तू इ बजलिहि, हम तोहर सिनेहक गुलाम भ' गेलौं । हृदयसँ उगना के लगा लेलथि। चिंता नहि, गहना फेर आबि जेतै। आ ऊपर देख मोने-मोन बजला के अपन, के आन? कहनाय कठिन।
✒✍ ( डा. अखिलेश झा )
✒✍डा.अखिलेश झा
घनश्याम बाबू कहियो गामक जमींदार कहाबैत रहथि।पुरखाक अर्जल बिगहा के बिगहा जमीन, घरारी, गहना की नै रहनि। घनश्याम बाबूक पुत्रीक विवाह संपन्न घरमे बीस बरख पहिने भ' गेल रहनि। दूटा बेटा, एकटा विदेश के आ एकटा काठमाण्डू के भ' क' रहि गेल रहनि। सासुर एला पर कनियाँके कहियो ततेक काज नहि करय पड़लन्हि। मुदा आब घरमे लोक नहि।जमीनो-जाल अधिकांश बेटीक बियाह तथा बेटाक पढाईमे बिका गेल रहन्हि।
घनश्याम बाबु के दस वर्षक पहिने के गप मोन पड़लनि । कनियाँ घनश्याम बाबू के बहुत बेर कहि चुकल रहथिन 'एकटा काज करय बाला ताकि दिय न'। घनश्याम बाबू के एक्के टा जवाब "आब ओ जमाना रहलै, कियो नहि भेटत"।
एक दिन घनश्याम बाबू आठ-नौ साल के बच्चा ल' क' पहुँचलाह। कतय छी ये, देखू ककरा अनलहुँ।कनियाँ आबि देखैत छथि । 'इ के छी' ?
घनश्यामजी बजलाह, जत' कामति अछि इ ओतय के अछि। आब, कियो नै छै एकर। बापटा रहय ओहो रोगसँ पाँच दिन पहिने चलि बसल।
कनियाँ बजली, कनि भीतर आउ।(भीतर पहुंचला' पर ) ककरा उठा अनलहुँ? केहन लोक छै? केहन संस्कार, आ जाति कोन?
घनश्याम जी- देखू, हम एकर बाप के बड्ड दिनसँ चिन्हैत छलियै, बड्ड भला आदमी। एकरो कहियो कोनो शिकायत नहि भेटल। सब काज क' देत। हमहूँ सोचि लेने छी एकरा स्कूल मे नाउ लिखा देबै। जहाँ तक गप्प छै जातिके त' सब जातिमे नीक आ बेजाय होइत छैक। मनुख, मनुख होयत अछि।पैघ आ छोट जाति नै।
ओहि दिनसँ ओ बच्चाके घनश्याम बाबू उगना कहि क' बजबय लगलाह। एक साल बाद घनश्याम बाबू गामक डाकघरमे दू सौ रुपैया प्रतिमाह के हिसाबसँ उगनके नामे जमा करैत रहथि। खुश भ' कहियो-कहियो पाँच सौ हजार बेसियो जमा क' दैत रहथि। आइ ओ अवस्था नहि छन्हि। खेत बुझु चौपट छन्हि।लगभग चारि-पाँच बरषसँ धियो-पूता अपन दुनियाँमे अति व्यस्त रहैत छथि। धिया-पूता के फोनमे इशारा केलथि जे कनि पाइ पठा दै लेल। जहिया धान कटत त घूरा देब। मुदा ओ सब अहि बात के गंभीरतासँ नहि लेलकन्हि। इ बुझै छथि बरका शहरमे पाइके अपने खगता रहैत छै। छोटो बच्चाके दस हजार टाका महीना स्कूलमे लगैत छै। किछु मदति त' क' नहि सकैत छी उलटे माँगनाय उचित नहि से सोचला घनश्याम जी। मुदा आइ बात किछु आर अछि। रबिन्द्र जे अखन ठीकेदारी करैत अछि ओकरासँ छः महीना पहिने बीस हजार टाका कनियाँ के इलाज लेल पैंच लेने रहथि से चुका नहि सकला'। दू महीनासँ तगादा करैत रहनि। आइ कहि देलकनि जे पाइ घुराउ नहि त' खराप होयत। पम्पिंग सेट,पलंग, कुर्सी जे दलान पर अछि से सब उठा क' ल'जायब।
घनश्याम बाबूसँ एना कहियो नहि बाजल रहय रबिन्द्र। मोन गेलनि दलान परहक पलंग पर। बड्ड श'ख सँ बाबू बनबेने रहथि। शहरसँ मिस्त्री बजा क', शुद्ध सखुआके नक्काशी कयल। पाँच आदमी त' ठाठसँ सुति सकैत अछि। घनश्याम बाबूकेँ ओ पलंग बड्ड प्रिय। दस-पंद्रह दिनमे त' उपाय भ' जेतै मुदा आइ?
भीतर कनियाँ पुछैत छन्हि त' सब बात कहैत छथि।कनियाँ कहैत छन्हि लिय इ चूड़ी, दू भरि सोनक बनल। बन्हकी राखू या बेच क' ओकर पाइ घूरा दियौ।घनश्याम जी सोचैत छथि आब शहर जायब, जहाँ सोनार बुझत जे बेगरता अछि उचित दामो नहि देत मुदा उपाय कोन?
केबारक दोगसँ सब बात सुनैत उगनाके रहल नहि गेलै आ बाजल। हमर नाउमे जे पाइ अछि ओ कहिया काज लगतै? घनश्याम बाबू आ कनियाँ अवाक भ' देखलक उगनाके। घनश्याम बाबू नोरा गेला'।कहलखिन्ह नहि रे, तू इ बजलिहि, हम तोहर सिनेहक गुलाम भ' गेलौं । हृदयसँ उगना के लगा लेलथि। चिंता नहि, गहना फेर आबि जेतै। आ ऊपर देख मोने-मोन बजला के अपन, के आन? कहनाय कठिन।
✒✍ ( डा. अखिलेश झा )

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