अपन मिथिला में दुर्गा पूजा
अपन मिथिला में दुर्गा पूजा
👃👃👃👃👃👃👃👃👃👃
✍अशोक कुमार सहनी
प्राचीन काल सौं शक्तिक उपासक मिथिलाक गाम-गाम में पंडाल सजा त पूर्व सौं बनल मंदिर में मूर्ति स्थापित कय संपूर्ण श्रद्धा से वैदिक विधि सौं दुर्गा पूजा भय रहल अछि।एहि दस दिन मिथिला में बड हर्षक समय रहैये।गाजा-बाजा मेला-ठेला सांस्कृतिक कार्यक्रम सौं संपूर्ण मिथिला गुंजायमान रहैये। दुर्गा मंदिर पर ते सानंदक बसात बहैये। किएक नै स्वयं जगदम्बाक गाम-गाम में पदार्पण होई छनि।संपूर्ण मिथिला आध्यात्मिक आनंद में बहैत रहैये।
मिथिलाक सबहक अंगना में गोसाऊनिक घर अनिवार्य रूप सौं रहबे टा करै छैनि।मैथिल लक्ष्मी स्त्री एकदिन पूर्वहि घर अंगना के नीपी बहैर पवित्र करै छथि।प्रात:काल भोरगरे उठि स्नान कय फूल तोरी गोसाऊनिक घरके नीपी धोई गोसाऊनिक सिरा पर पिठार सौं गोल फूलक अरिपन दय सिरा आगू में सेहो एकटा अरिपन दय छथि आ पुरष स्नान कय लाल पियर धोती पहिर पूर्व सौं आनल बालू ओहि अरिपन पर पसारी जौऊ छीटी जयन्ती बाग करय छथि।एकटा कलश में जल भरि द्रव्य आ सुपारी आ आमक पल्लव दय ओहि बालूक मध्य कलशक स्थापन करै छथि।पुनःकलश आ आमक पल्लव पर सिनूर पिठार लगा सामयिक फल औंकरी सोहाँस सौं नैवेद्य दय धूप दीप सौं सुगंधित वातावरण में माँक पूजा अर्चना कय दुर्गा सप्तशतीक पाठ नितदिन दुर्गा विसर्जन धरि करै छथि।कियो कियो संपुट पाठ त कियो एके ऐके अध्याय किन्तु पाठ अवश्य करै छथि। बहुतो घर में पुरूषक अभाव वा समयाभाव या फेर अपने नै सम्हरला के कारण या कोनो औरो कारण से पंडित राखि नित पाठ कराऊल जाई अछि।दुर्गापाठ सबहक ओहिठाम हेबे टा करै छनि।कोनो कोनो घर में त सपरिवार पाठ करै छथि दुर्गापाठोपरांत सपरिवार आरती में भाग लै छथि।आरती कय सपरिवार के आरती देखा नैवेद्य वितरण करै छथि। सबदिन सायंकाल माटिक दिवारी गोसाऊन आ कलशक आगू में जरा धूप धूपबत्ती सौं सुगंधित कय सपरिवार आरती करै छथि।
ई क्रम विसर्जन धरि चलैये। विसर्जन दिन जकरा मिथिला में जतरादिन सेहो कहल गेल अछि किएक त दुर्गा माँ ओहि दिन विदा भय जाई छथि तें ओहि दिन के यात्रादिन कहल जाई अछि माँ के चुड़ा दही चीनीक नैवेद्य चढाओल जाई छनि किएक त मिथिला में दही खाके यात्रा शुभ मानल जाई अछि। जयन्ती काटि भगवती के चढाबै छथि तखन सपरिवार के माथ पर जयन्ती दय भगवती के प्रणाम कय भगवतीक अर्पण केल दही चूड़ा सपरिवार खाई छथि आ अपन अपन श्रेष्ठजन के प्रणाम कय आशिर्वाद लय छथि। एहिदिन नीलकण्ठक दर्शन अति शुभदायी मानल जाई अछि। आनदिन नीलकण्ठ देखाई छनि त सब मैथिल येह कहै छथिन्ह-
"नीलकण्ठ नीलकण्ठ गोर लगैछी!
जतरा दिनका भेट करै छी!!
जय माँ अम्बे! जय जगदम्बे!!
जय मिथिला जय मैथिल जय मैथिली
साभार - मिथिला पेज सँ




कोई टिप्पणी नहीं