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घोघ ( मैथिली कविता)

घोघ ( मैथिली कविता)


मिथिलानी सबहक, साझा संस्कृति ।
अर्धज्ञानी अजनवी, कहैछै विकृति ।।
आरोप प'प्रत्यारोप, लागाबैछै लोक ।
महत्त्वकांक्षा बुझैछै नै, कि छै घोघ ।।


युगौंयुगसं चलिआयल, सुन्दर प्रथा ।
मुक्ति पाबै अहिसं, विभिन्न व्याथा ।।
वर्णित आदर्श नारी, सीताक गाथा ।
घोघवंशी महान, बखान करै कथा ।।


घोघ मिथिलाक इज्जत और शान ।
समृद्ध रीती-संस्कृति, जगमे महान ।।
पूर्खाक संस्कारसं, संरक्षित जहान ।
भरि माङ सिन्दुरसँग घोघ पहचान ।।


घोघ भितर सुन्दर रुपी, चन्द्रमूखी ।
मैथिल'क नारी सज्जल, सुर्यमूखी ।।
कूलक सम्मान और पहचान घोघ ।
अप्पन संस्कारपऽ, विदुषीक ढोग ।।


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रचनाकार ✍👤 :- Ganga Prasad Kushwaha 'JN'
ठेगाना :- गोविन्दपुर - ०६ ( मलहन्मा )
जिल्ला:- सिरहा ( नेपाल )

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पोस्ट:- अशोक कुमार सहनी
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