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अहाँ स प्रेम कियक हम करू ?

अहाँ स प्रेम कियक हम करू?

धधकैत आगी में कियक हम जरू,
अहाँ स प्रेम कियक हम करू ?
नहिं लेनाई छै बेचैनिया बिमारी,
अहिना असगरे हम ठिक छियै बरू ।।

पहिने त बड़ा मधुर स बजेवै ,
बादमे फटकारि अहाँ हुकुम चलेबै ।
बुझै छी हम सब नखरा अहाँ के ,
जाऊ जाऊ हम अहाँ के वात में नै परू ।।

चलत अहाँ के नै जादू कोनो,
नैना सं एना अहाँ वाण नहिं छोडू ।
फेन आयब नहिं घुमिके अहाँ ,
चलु नापु अब रस्ता हमर वात कान धरू ।।

                              ✍ दिपेन्द्र यादव मैथिल
                            ( 2073/8/13, सोमवार )
                                 @ विराटनगर


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पोस्ट :-  अशोक कुमार सहनी
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