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महिलोके खातीर ओहिने खुल्ला संसार होबाक चाहीँ

महिलोके खातीर ओहिने खुल्ला संसार होबाक चाही


✍👤 विधानन्द वेदर्दी

नइ विभेद,नइ शोषण आ नइ बलत्कार होबाक चाहीँ
महिला-पुरूष मानसिकता सँ एकाकार होबाक चाहीँ॥

रजस्वला,गर्व धारण,इत्यादीके दरद के बुझत सृष्टीमे?
महिलाक भावना प्रति पुरषके समझदार होबाक चाहीँ॥

जहिना पुरूष जीबैछै सिना तानिके मान-सम्मान सँ,
महिलोके खातीर ओहिने खुल्ला संसार होबाक चाहीँ॥

कतेक कनतै पिजड़ाक सुगा सन ठोर सिब-सिबके,
महिलोके जीनगीमे बसन्त केर बहार होबाक चाहीँ॥

राष्ट्रक विकासमे पुरूषेटा लागला- जागला सँ नइ,
महिलोके उपस्थिती नित जगजियार होबाक चाहीँ॥
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✍👤 विद्यानन्द वेदर्दी
  सप्तरी,राजविराज
  हाल: विराटनगर,मोरङ्ग
  » 2073/08/16




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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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