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💐 बीहनि कथा 🐚 बैष्णव

💐 बीहनि कथा
                       🐚 बैष्णव


लेखकः✍👤 वी०सी०झा"बमबम"




 बाबू के बिनु माछक फरी सऽ काज नहि चलैत छलन्हि , भोजनक करवा काल जॉउ दुओ कुट्टी मांछ नहि होन्हि तऽ ओ भोजन के अपूर्णहि मानैत छलथि ! हं तखन जुमितो छलन्हि अपनहि चारि - चारि गोट पोखरि बाप - दादा के कोराओल सम्पति छलनि ! महार पर छौंड़ा सब बेजाय बंसी पथनहि रहैत छल ओहि मऽ सऽ हरि बाबू के एक आध फरि भेटिए जाइत छलनि पोखरि बला होयवा'क नाते ! जाहि दिन बंसी संऽ नहि होइत छलनि तऽ मलाह के सेहो बसेनहि छलाह तखन हरि संऽ कहुं बंचित रहय माछक फरी ?
हुनक माछिल बालक वंशीधर जेकरा नेना मे हाथ सऽ कउखन बंसी नहि हटय ! माछ मारवा मे ततेक प्रविण छल सटको मे बोर द मांछ मारि लैत छल ! ओकरा मात्र पढ़वा मे मोन नहि लगैत छलहि तांय हरि बाबू चिंतित रहैत छलथि जे इ कहिं बूड़िया ने जाय ? तांय किछु गोटेक विचार संऽ ओकरा संस्कृत पढ़वा लेल वनारस पठा देलखिन जे सूधरि जेतय ! आब बूरबकहे सब के लोक ने संस्कृत पढ़वा लेल कहैत छैइक होसियार सब अंग्रेजी पढ़ैत अछि खैर जे किछ ! आय ओ वंशीधर संऽ पं०वंशमणि वनि आपस भेल छल आंगन मे मांछ देखि घोंघिया लागल आंय ब्रह्मण कहुं मांछ खाय ? एतबहि गप सनतहि हरि बाबू आगि'क गोला बनि गेलाह रउ बंशीधर तूं बूड़ि'क बूड़िए रहि गेलह ! हमर बाप पितामह कि पंडित जोतखी नहि छलथि ? ओ सब बारबे नहि केलथि आ तों दू आखर संस्कृत कि पढलह नीति देमह लगलह जा जाह ! बंशीधर सऽ वंशीमणि आ वंशमणि सऽ वंशबूड़ि बनलह तों ! हय आय घर मे सबहल लेल मांछहि बनतहि आ एकरहु खाय परतय अन्यथा आय जे मांछ नहि खायत तकरा पितृ सम्पति'क अधिकार संऽ बंचित कय गेल जेतहि ! हउ हम पूछैत छियऽ जखर घर पोखड़िक महार पर रहतैक से कहुं बैष्णव हुए ?

लेखकः✍👤वी०सी०झा"बमबम"
                                 कैथिनियाँ




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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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