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दाइ,घुर आ ओ बसिया रोटी

दाइ,घुर आ ओ बसिया रोटी 

लेखक ✍👤विन्देश्वर ठाकुर 

याद अछि कनि कनि -
अपन जिनगीक एकटा पन्ना 
जे भरल अछि केवल -
नेह,सिनेह आ ममत्व सँ ।

भोरे उठलाक बाद विना मुंह धोनेही
घुरालग बैसक' 
 कोरियबैत छलौ छाउर आ
ढारैत छलौ नेप से सत्ते! 

कोना हपसिक' धरैत छली दाइ?
पोछैत छली आँचर सँ नोर
दैत छली -नोन-तेल-रोटी
आ साटि लैत छली अपन करेजमे।

ओएह बसिया रोटी खा'
पहुँचैत छलौ प्रसन्नताक 
चरम सिमानपर,
गद गद भऽ जाइत छल मोन आ 
खुशी सँ झुमि उठैत छलै 
आसपासके सरदियाएल मौसम। 

आइ अच्चानक -
खाडीक एहि जङ्गलसँ 
याद आबिगेल दाइ,घुर आ 
ओ बसिया रोटी 
मुदा,
आब त हमरा लेल
ने रहली ओ दाइ
ने रहल ओ जाड आ
नहिए रहल ओ करसी जरैत घुर 
जत' खा सकी नोन-तेल-रोटी आ
पका सकी भोरे भोर भुंभुरमे अल्लु । 

✍👤विन्देश्वर_ठाकुर
१९/०१/२०१७।


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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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