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प्रेमक वर्णमाला *अ*

प्रेमक वर्णमाला *अ* 

लेखक ✍👤श्याम झा
अतेक लिख पढ़ए क' कतेक बेर हम , अदर -  बदर  बजै छी
अद्य चलु  फेर  एक बेर मिल' क', अक्षर प्रेम'क'  खूब गढ़े छी

अ कहाबे पहिलुक अक्षर,अकिल सँ पढ़ी दूर हटाबी प्रेम निरक्षर 
अनुप्रास की कवि गढ़त, अछि रंग अंग विधाता अद्भुत गढ़ल

अए सुनु कनि हम कथा कहै छी, अकिञ्चन मनक वृथा कहै छी
अएना पर सँ अंशु छिटकल , अपसरा एक ओहि पर सँ देखल

अकचका गेलौं पलँग पर सुतल , अहाँक फेनु एक बेर हम  देखल
अभिभूत भेलौं  हम  दर्शन  पा क', अखन धरि छलहूँ अभिज्ञ अहाँ सँ

अगङ्ग की बुझत अगाथ बेग क' , अंगबार बिना अनजान पथ सँ
अटारी कतेक दूर किया नेँ,अदिग नेँ होए अवति कहियो अधिप

अकुलाएल मन छल कतेक दिवस सँ ,अकाबोन भेल देखैत अकास क'
अकादारुन अकूत विचारक, अंकुरित भ' रहल अकोल अप्रभास सँ

अभास भेल छनहि छन मे, अभिमंत्रित छी अहाँ कुनु देवक अक्षत 
अभिजित छल नक्षत्र क्षितिज पर, अभाबिरित भेल चँनरंग अकार ल'

अंग क' वर्णन हम की करहूँ, अधो अधर  देखि अधिर भ गेलहूँ
अलक देखि अवलोकन केलों, अलकापुरी अवनि पर उतरल 

अमूमन केल  देह अबिरक, असल अपार अछि महिमा प्रीतक
अरविन्द सिरखार अरसी सँ देखल, आब नेँ हम कुनु फूसि बाजब

अनुरक्त भ की हम अनुभव केलों , असमर्थ छी हम एहि प्रसंग पर
अस्तुति करे छी अहर्निश अभिराम क', अनारी की बुझत सुगंध अगस्तिक

अनुनय अछि अपन बुझी क', अपक काव्य अनुसोधन करि
अभगला माधौ क अन्त्य, अभिसार अकथ अकतिआर सँ भरि

..✍👤श्याम झा


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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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