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#तोरोमे_किछ_छौ

#तोरोमे_किछ_छौ


✍👤राम सोगारथ यादव

हम अतेक बुझितो
अपन मन, घबाह कर पऽ बिवस भगेलहुँ ।
कि तोरा मनमे धोंइध छौ
जत पहिलेसँ कतोको मन घाहील छै
ओकरा सभहक घाब पऽ खोंटी बैठते
तों चटसँ ओदारि दै छी ही आ
क'दैत छी ही ।
एकटा नवरंगक प्रेमकें जादु 
फेंरसँ ओ मन लहुलहुवान होइतो
तोरा मनक धोंइधमे रहबाक 
मजबुर भ'जाए छौ ।
तों छरपी सेहो छे ।
कखन कोन धुर तोडबे 
कखन केकरा पऽ भडकबे
से तहुँ नहिं जनैत छे ?
तोहर समुचा करनमा देखितो 
हम तोरा मनक कोनामे जा बैठ गेलहुँ
ऐकर मात्र ऐकहिटा कारण छलै
से सायत तों नहिं बुझिसकै छे ?
तोरोमे अपनत्व बढैबाक गुण कतेक छौ ।
ओहे गुण हम सिखबाक लेल
तोरामे मिझराइत गेलियौ 
संनिहाईत गेलियौ ।
हमरा स्वार्थी नहिं बुझिहे ?
हम एकटा खोजकर्ता बनिक
तोरामे खोजी लेलियौ अपनत्वक गुण
आ निकैल गेलियौ तोरा मनसँ बाहर ।

लेखक :- ✍👤राम सोगारथ यादव
धनुषा,पुरन्दहा वाड नं ३ 
गा. वि .स मिथिलेश्वर निकास 
(नेपाल)

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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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