बटगमनी में मैथिलानी केर मनोभाव केर निधोख उद्गार
बटगमनी में मैथिलानी केर मनोभाव केर निधोख उद्गार
लेखक :- ✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
बेर-बेर जखन मौथिली लोकगीत केर अवलोकन करैत छी, एकर स्वरुप आ व्यवहार देखैत छी, विधि आ विधान देखैत छी त मोनक ई धारणा आरो प्रबल भेल जा रहल अछि जे लोकगीत आ मैथिलानी एक दोसरक पूरक छथि। गीतक अनेक रूप एहेन अछि जे केवल स्त्री द्वारा प्रयुक्त होइत अछि। पुरुख के कोनो योगदान अथवा उपयोगिता नहि। कदाचित कुनो पुरुख अगर ओहि में घुसैत छथि आ गेनाइ शुरू करैत छथि त स्त्रीगण सङ्ग पुरुख समाज द्वारा मौगमेहरा शब्द सँ समस्त उपहासक पात्र बनैत छथि।
एहने गीतक एक परम्परा "बटगमनी" अछि। बटगमनी के बटगवनी सेहो कहल जाइत छैक। बज्जिका आ मगध क्षेत्र में बटगमनी के अतिरिक्त लोक एकरा "सजनी" गीत सेहो कहैत छथि। सजनी शायद अहि हेतु जे प्रथम पाँति केर अंतिम आखर अहि में "सजनी गे" अनिवार्य रुपे होइते छैक। किछु उदाहरण देखू:
(1)
ई दिन बड़ दुर्लभ छल सजनी गे
देखल नन्द-दुलारे ...
(2)
तरुण बयस मोहि बीतल सजनी गे
पहुँ बिसरल मोहि नामे ....
(3)
नव जौबन नव नागरि सजनी गे
नव तन नव अनुराग
पहुँ देखि मोरा मन बढ़ल सजनी गे
जेहेन गोपी चंद्राल...
जेना कि नाम छैक, अहि तरहक गीत स्त्रिगन सब बाट में हेंज में चलैत आ समवेत स्वर में गबैत रहैत छथि। बाट में चलैत गेबाक कारने एकरा बटगमनी कहब सर्वथा उचित। चूँकि चलबाक गति में डेग झट-झट चलैत छैक त गीत सेहो थोड़ेक जोर सं आ वेग सं गबैत छथि। चलबाक क्रम में साँस नहि उखरै तांहि लेल झट चलब आ झट गायब एकर मुख्य सूत्र छैक। एकपेरिया रस्ता में बटगमनी गेबाक जे आनंद छैक से बुझू बैकुंठक आनंद सं कनिकबो कम नहि। मेला-ठेला में, तीर्थ स्थान में, सिमरिया घाटक रस्ता में, इनार, अथवा नदी सं घैल में पानि आनय काल में स्त्रिगन सब बटगमनी गबैत छथि (बल्कि ई कहि जे गबैत छली)। एहि में मिलन आ बिछोह दुनू भाव एक संगे व्यक्त होइत छैक। मिथिला में बटगमनी के संस्कार, आ मांगलिक अनुष्ठान सं सेहो अदौं सं जोड़ल गेल छैक। आइओ मांगलिक होमक कारने मैथिलानी सब झुण्ड में ग्राम देवता डीहबार, ब्रम्ह्स्थान, माँटिमंगल, आम-महु बिबाह आदि विधि में बटगमनी गबैत जैत छथि। आगा-आगा गीतगैन आ पाछा-पाछा ढ़ोल-पिपही बजबैत रसनचौकी केर कलाकार। गीत गाबैत छथि मैथिलानी आ वाद्ययंत्र केर भाड़ा पुरुख के।
बटगमनी के स्वरुप, एकर शब्दावली, समवेत गेबाक परंपरा आदि के अगर समाजशास्त्रीय विवेचना करी जे दुर्भाग्य सं एखन धरि नहि भेल अछि त पता चलत जे ई परंपरा महिला सब के अपन स्वतंत्रता आ स्वछन्दता के मुक्ताकाश में व्यक्त करबाक, बल्कि निर्भीक भाव सं व्यक्त करबाक एक पब्लिक प्लेटफार्म छैक – नहि डर ने भय, निर्भय। बटगमनी के गीत में शब्द आ भावना के निर्भीकता सं व्यक्त कैल जैत छैक। सब बन्धन सं मुक्त रहैत छथि गीतगैन। जिम्मेदारी एकक नहि, सबहक। बटगमनी में सिनेह, चुम्बन, आलिगन, मधुमासक कामइच्छा केर अधिकता, राग आ अनुराग युक्त सम्भोगक वर्णन नायिका अथवा गायिका केर उक्ति में प्रयुक्त होइत छैक – निश्छल, निर्विकार, अविरल, बारम्बार, समवेत भाव में:
लट छल खुजल बयस सजनी गे
बैसल मांझ दुआरे
ताहि अवसर पहु आयल सजनी गे
देखल नयन पसारे
एक हाथ केस सम्हारल सजनी गे
अचरा दोसर हाथे
पहु के पलंग चढि बैसल सजनी गे
तखन करथि बलजोरे
नहिं-नहिं जओं हम भाखीय सजनी गे
तओं राखथि मन रोशे
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे पुरुषक यैह बढ़ दोषे।।
अगर ऊपर केर बटगमनी के विवेचन करी जे मान्यता के अनुसारे महाकवि विद्यापति के द्वारा लिखल गेल अछि त पता चलत जे केना एक नायिका अपन प्रेमक आ रति-रभस केर इच्छा के व्यक्त क रहलि छथि। मांझ आंगन अथवा दुआरि पर एहि भाव सं बैसल नायिका जे कोना समय काटू? मुदा बिना कुनो आशा, सूचना के पाहुन आबि जैत छथिन। फेर की, आंखि त विस्मृत भाव सं थोड़ेक क्षण लेल केवल पाहुन पर केन्द्रित भ जैत छनि! झट दनि एक हाथ सं केस आ दोसर हाथ सं साड़ी केर आँचर सम्हारैत प्रेमक आवेग में मातल पाहून लग घर में प्रवेश करैत पलंग लग नायिका चलि जैत छथि। पलंग में सकुचायल बैसैत छथि। पाहुन भला कोना मान’बला? तुरत अपन बाहुपाश में लेबाक लेल उद्यत भ जैत छथि। लज्जा त अन्ततः स्त्रिगणक सिंगार ने भेलैक! नायिका पहिने थोड़ेक प्रतिकार करैत छथि। मुदा पाहुन की कुनो कम जाबिर छथि, झट दनि रुईस रहबाक धमकी देमय लगैत छथि। आब बेचारी नायिका, कामायनी, भला करती त की करती? समर्पण के आलावा कुनो उपाय कहाँ? विद्यापति कवि नायिका के भाव के अनुभव करैत कहैत छथि – की करबैक सुन्नरी! पुरुख के ई बड्ड पैघ दोख छैक, मुदा एकर कुनो प्रतिकारो नहि।
ई त भेल मिलन, प्रेमालिंगन, रति-रभस, नायिका आ नायक के समागम, देह सं देह आ मोन सं मोनक मिलन, सब किछु अनुकूल. मुदा बटगमनी में मिलन केर संग-संग बिछोह केर भाव सेहो प्रस्फुटित होइत छैक. आब केना मिलन सं बिछोह केर स्थिति भ जैत छैक से उदाहरण देखी:
फरल लवंग दूपत भेल सजनी गे
फल-फूल लुबधल डारि
खोंइछा भरि तोरल फफरा भरि तोरल
सेज भरि देल छीरियाय
फूलक धमक पहुँ जागल सजनी गे रुसि चलल परदेस
बारह बरख पर लौटल सजनी गे
ककबा लैल सनेस ओहि ककबा लय थकरब सजनी गे
रुचि-रुचि कैल सींगार
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे
पुरुषक नहिं विश्वास।।
बाह रे विद्यापति! नारी मनोदशा के अन्तस में आनि अगर शब्द में बखान करक हो त ई कला अपन सर्वोत्कृष्ट स्वरुप में विद्यापति केर मैथिली लोकगीत में व्यक्त होइत अछि। एक-एक भाव जेना भोगल हो. कविक ह्रदय में जेना नायिका केर घर बनल हो। उपमा एहेन जे सिंगार गर्वित होमय लागए। भाव एहेन जे नायिका के विभोर करक क्षमता रखैत हो। गीत गेबाक काल जाहि में हरेक गीत गाबय बाली मैथिलानी ओहि गीतक भाव सं अपना के जोडि सकथि। किछु उपमा मिथिला सं बाहर के अछि मुदा ओकर प्रयोग एहेन जेना ओ भाव संगे आ परिस्थिति संगे चलैत नहि दौरैत हो। ऊपर वर्णित बटगमनी पर विचार करी। लौंग केर गाछ पात आ लौंग सं लबधल छैक. ओकर सुगन्ध पाहून के निक लागनि ताहि केहू कामिनी ओकरा भरि खोइंछा तोरि लेने छथि। होइत छनि, शायद थोड़ेक आरो ल लेब त चहु दिस वास सुवास भ जैत। पाहून थोड़ेक अधिक प्रसन्न हेता। फेर तोरती त रखती कत’? व्योंत करैत फफरा में सेहो थोड़ेक तोरि राखि लैत छथि। घर अबितहि ओछायन पर सब ठाम छिट दैत छथिन। आब एहि बातक इंतजार क रहलि छथि जे पाहून त प्रेम विभोर भ जेता। रति रभस अपूर्व हैत. मुदा ई की? लौंग केर गमक सुइंघ नींद में भेर भेल पाहून उठि जैत छथि. प्रेमक प्रदर्शन करबाक बदला तमशा जैत छथि। रुसैत, तम्सैएत दूर देस चलि जैत छथि. बेचारी नायिका बारह बरख धरि वियोग में बीतबैत छथि। आब बारह बरख के बाद पाहून फेरो सं नायिका लेल ककबा (कंगही) सनेश लेने आयल छथि। नायिका के मिलन केर इच्छा छनि। केस विन्यास पहुक आनल ककबा सं क रहलि छथि। मुदा मोन में कखनो काल इहो डर होइत छनि; की पता, कुन बात पर रुसना पाहुन भरकि जेता आ कही सब किछु उल्टा ने भ जाय! भागि ने जाथि? सब सिंगार कहीं व्यर्थ ने भ जाय? मिलन के क्षण में विरह केर आशंका केर बेजोड़ वर्णन एहि गीतक मादे कैल गेल अछि। विद्यापति के माध्यम सं नायिका कहैत छथि आ गबैत छथि जे एहि पुरुख जातिक कोन भरोषा?
एहि गीतक महानता ई अछि जे नारी मनोदशा केर वर्णन एक पुरुख अर्थात एहि गीतक रचैता विद्यापति करैत छथि। ताहू सं पैघ बात जे स्त्रिगन अर्थात मैथिलानी एकरा जसोदा जकां अपन बना लैत छथि। गीत संगे अपना के जोडि लैत छथि। एक केर प्रेम आ विरह केर मनोस्थिति सबहक भ जैत अछि।
बटगमनी में एक आर विशेषता ई छैक जे ई ऋतु केर हिसाबे सेहो काम आ सिंगार केर प्रति नायिका केर भाव प्रदर्शित करैत छैक। बटगमनी केर सखी बहिनपा छैक तिरहुत आ ऋतु गीत अर्थात बारहमासा, छौमासा, एवं चौमासा। कखनो-कखनो तिरहुत आ कोनो-कोनो छौमासा आ चौमासा त एकहि बात के चर्च करैत रहैत छैक। तीनू कनिक जल्दी-जल्दी आ चलैत गेबाक गीत छैक। तीनू में समवेत गेबाक परम्परा छैक। ठीक छैक बसन्त ऋतुराज अछि मुदा मधुमास त बरसात छैक। बरसातक वर्णन कनि बटगमनी आ तिरहुत के अधिक उत्तेजक, श्रृंगारिक, कर्णप्रिय बना दैत छैक; प्रेमक भाव, विरह केर आवेग आ आशा सब जेना प्रबल भ जैत छैक।
एक एहेन बटगमनी जाहि में बरसातक अन्हरिया राति में नायिका केर मनोदशा के देखि कोन धीरमति थीर रहत? कोना नायिका पहुक घर में समागम हेतु जेती? कनि भाव के देखी:
चंद्रवदनि नवकमिनी सजनी गे
यामिनि अति अन्हार सजनी गे
सखि सँग चललि केलिगृह सजनी गे
कर पंकज दीप बारि सजनी गे
पवन झकोर जोर बहु सजनी गे
तैं धरु आँचर झाँपि सजनी गे
देखि उर अति सुंदर सजनी गे
दीप राशि उठु काँपि सजनी गे।।
ई गीत बहुत मार्मिक छैक। बरसात केर घनघोर अन्हरिया राति में नायिका पहिल बेर अपन पहु लग जा रहलि छथि। मोन में नाना तरहक भाव आबि रहल छैक। सुन्दरि चंद्रबदनि छथि, नबे पर जौबन केर भार सँ सुसज्जित भेलि छथि। चेहरा के सौन्दर्यक कतेक वर्णन करी? घनघोर राति में बरखा आ ताहू में हवा के झोंका आ उज्झट। ऐना में केलि गृह में पहु सँग जेती कोना? मुदा केहनो समय हो अभिसार त हेबे करतैक। पाहून अवश्य अकुतायल हेता आ इंतज़ार करैत हेता। सुन्नरि के सखि सब सँग कए हुनकर कमल सन कोमल हाथ में दीप राखि पहुक घर दिस बढ़ि रहलि छथि। हवा केर झट्टक अतेक तीव्र छैक जे नायिका दीप के अपन आँचर सँ झाँपने छथि। नायिका केर बक्ष अतेक उन्नत आ आकर्षक छनि से देखि दीपक रौशनी काँपे लगैत छैक आ से देखि नायिका के ह्रदय काँपे लगैत छनि जे कही दीप ने बुझा जाय!
बटगमनी में बरखा केर वर्णन आ मधु मिलन केर केहेन आकांक्षा होइत छैक तकर एक प्रमाण निम्न बटगमनी में देखु:
जखन गगन घन गरजत सजनी गे
सुनि हहरत जीव मोर सजनी गे
प्राणनाथ परदेस गेल सजनी गे
चित भेल चान चकोर सजनी गे
एकसरि भवन हम कामिनी सजनी गे
दामिनी लेल जीव मोर सजनी गे
दामिनी दमकि डेराओल सजनी गे
आब ने बचत जीव मोर सजनी गे
झिंगुर झमकत चहुँओर सजनी गे
कुहुकत कोयल मोर सजनी गे
से सुनि जिय घबराय सजनी गे
यौवन कैल घोर सजनी गे
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे
मन जूनि करिय उदास सजनी गे
सबसँ पैघ धैरज थिक सजनी गे
भ्रमर आओत तोर पास सजनी गे।।
एहि गीत सँ एक ई स्पष्ट होइत अछि जे बरखा ऋतू सही अर्थ में मधुमास अछि। केलि, प्रेम आ साहचर्य केर अनुभूति एहि मासक अपूर्व होइत अछि। जखन साहचर्य अतेक आनंददायक त अहि समय में नायिका केर नायक अगर दूर देस होथि त विरह केहेन भ सकैत छैक ओकर अनुमान लगेनाइ कतेक दुष्कर कार्य छैक! नायिका बेचारी विरहिणी केर जीवन अइ बरखा केर बज्र कारी राति में बिता रहलि छथि। जखन-जखन बरखा होइत छैक, मेघ बजैत छैक, नायिका केर ह्रदय घबरेनाइ शुरू भ जाइत छैक। बेचारी केर नायक परदेस गेल छैक, ऐना में ओकर चित भला थिर कोना रहतैक? घर में असगरे बैसलि बेचारी राति कोना कटती? के दुःख बुझतैक? राति अन्हार, बिजली के लोका चित के बेहाल केने छैक। झिंगुर अनेरे सबतरि अनघोल केने अछि। मोर मस्त भ नाचि रहल अछि; कोयलिया गीत गाबि-गाबि मदन केर ज्वाला के जगा रहल छैक। नायिका बेचारी की करथि! मोन घबरा रहल छनि। यौवन अनेरे अनघोल केने छैक। विद्यापति सांत्वना दैत कहैत छथिन; "उदास जूनि होउ, धैरज राखू, अहाँक प्रेमी अर्थात अहाँ सन पुष्प रूपी नायिका लग ई पुरुख रूपी भमर एबे टा करत।"
एहि तरहे ऋतुक सिंगार, सब समय में प्रेम, आलिंगन, केलि क्रिया, अभिसार, आ विरह एकै सङ्गे सब भाव केर निश्छल गान मैथिलानी बटगमनी के रूप में करैत छथि। ई गीत आब नहु-नहु खत्म भेल जा रहल अछि।
अहि गीत में मैथिलानी के नहि पुरुख सँ धोख, नहि सासु सँ, आ नहि समाज सँ। घर आ अँगना केर चौहद्दी सेहो हुनका लग नहि छनि फेर चलैत रास्ता में भय केहेन? जखन सब उमंगे मातलि त फेर धाख ककर। भांड़ में गेल मर्यादा आ अनेरे के खिंचल देबार। घोघट के भितर के बात गीतक आखरि बनि जेना किछु क्षण लेल मैथिलानी केँ अलग संसार में ल जाइत छनि!
एखन एतबे.......
✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
साभार: पहिल फोटो Mukti Jha केर पेंटिंग
दोसर फ़ोटो मेहदी सँ पैर के सजेने नायिका ।।।।
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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लेखक :- ✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
बेर-बेर जखन मौथिली लोकगीत केर अवलोकन करैत छी, एकर स्वरुप आ व्यवहार देखैत छी, विधि आ विधान देखैत छी त मोनक ई धारणा आरो प्रबल भेल जा रहल अछि जे लोकगीत आ मैथिलानी एक दोसरक पूरक छथि। गीतक अनेक रूप एहेन अछि जे केवल स्त्री द्वारा प्रयुक्त होइत अछि। पुरुख के कोनो योगदान अथवा उपयोगिता नहि। कदाचित कुनो पुरुख अगर ओहि में घुसैत छथि आ गेनाइ शुरू करैत छथि त स्त्रीगण सङ्ग पुरुख समाज द्वारा मौगमेहरा शब्द सँ समस्त उपहासक पात्र बनैत छथि।
एहने गीतक एक परम्परा "बटगमनी" अछि। बटगमनी के बटगवनी सेहो कहल जाइत छैक। बज्जिका आ मगध क्षेत्र में बटगमनी के अतिरिक्त लोक एकरा "सजनी" गीत सेहो कहैत छथि। सजनी शायद अहि हेतु जे प्रथम पाँति केर अंतिम आखर अहि में "सजनी गे" अनिवार्य रुपे होइते छैक। किछु उदाहरण देखू:
(1)
ई दिन बड़ दुर्लभ छल सजनी गे
देखल नन्द-दुलारे ...
(2)
तरुण बयस मोहि बीतल सजनी गे
पहुँ बिसरल मोहि नामे ....
(3)
नव जौबन नव नागरि सजनी गे
नव तन नव अनुराग
पहुँ देखि मोरा मन बढ़ल सजनी गे
जेहेन गोपी चंद्राल...
जेना कि नाम छैक, अहि तरहक गीत स्त्रिगन सब बाट में हेंज में चलैत आ समवेत स्वर में गबैत रहैत छथि। बाट में चलैत गेबाक कारने एकरा बटगमनी कहब सर्वथा उचित। चूँकि चलबाक गति में डेग झट-झट चलैत छैक त गीत सेहो थोड़ेक जोर सं आ वेग सं गबैत छथि। चलबाक क्रम में साँस नहि उखरै तांहि लेल झट चलब आ झट गायब एकर मुख्य सूत्र छैक। एकपेरिया रस्ता में बटगमनी गेबाक जे आनंद छैक से बुझू बैकुंठक आनंद सं कनिकबो कम नहि। मेला-ठेला में, तीर्थ स्थान में, सिमरिया घाटक रस्ता में, इनार, अथवा नदी सं घैल में पानि आनय काल में स्त्रिगन सब बटगमनी गबैत छथि (बल्कि ई कहि जे गबैत छली)। एहि में मिलन आ बिछोह दुनू भाव एक संगे व्यक्त होइत छैक। मिथिला में बटगमनी के संस्कार, आ मांगलिक अनुष्ठान सं सेहो अदौं सं जोड़ल गेल छैक। आइओ मांगलिक होमक कारने मैथिलानी सब झुण्ड में ग्राम देवता डीहबार, ब्रम्ह्स्थान, माँटिमंगल, आम-महु बिबाह आदि विधि में बटगमनी गबैत जैत छथि। आगा-आगा गीतगैन आ पाछा-पाछा ढ़ोल-पिपही बजबैत रसनचौकी केर कलाकार। गीत गाबैत छथि मैथिलानी आ वाद्ययंत्र केर भाड़ा पुरुख के।
बटगमनी के स्वरुप, एकर शब्दावली, समवेत गेबाक परंपरा आदि के अगर समाजशास्त्रीय विवेचना करी जे दुर्भाग्य सं एखन धरि नहि भेल अछि त पता चलत जे ई परंपरा महिला सब के अपन स्वतंत्रता आ स्वछन्दता के मुक्ताकाश में व्यक्त करबाक, बल्कि निर्भीक भाव सं व्यक्त करबाक एक पब्लिक प्लेटफार्म छैक – नहि डर ने भय, निर्भय। बटगमनी के गीत में शब्द आ भावना के निर्भीकता सं व्यक्त कैल जैत छैक। सब बन्धन सं मुक्त रहैत छथि गीतगैन। जिम्मेदारी एकक नहि, सबहक। बटगमनी में सिनेह, चुम्बन, आलिगन, मधुमासक कामइच्छा केर अधिकता, राग आ अनुराग युक्त सम्भोगक वर्णन नायिका अथवा गायिका केर उक्ति में प्रयुक्त होइत छैक – निश्छल, निर्विकार, अविरल, बारम्बार, समवेत भाव में:
लट छल खुजल बयस सजनी गे
बैसल मांझ दुआरे
ताहि अवसर पहु आयल सजनी गे
देखल नयन पसारे
एक हाथ केस सम्हारल सजनी गे
अचरा दोसर हाथे
पहु के पलंग चढि बैसल सजनी गे
तखन करथि बलजोरे
नहिं-नहिं जओं हम भाखीय सजनी गे
तओं राखथि मन रोशे
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे पुरुषक यैह बढ़ दोषे।।
अगर ऊपर केर बटगमनी के विवेचन करी जे मान्यता के अनुसारे महाकवि विद्यापति के द्वारा लिखल गेल अछि त पता चलत जे केना एक नायिका अपन प्रेमक आ रति-रभस केर इच्छा के व्यक्त क रहलि छथि। मांझ आंगन अथवा दुआरि पर एहि भाव सं बैसल नायिका जे कोना समय काटू? मुदा बिना कुनो आशा, सूचना के पाहुन आबि जैत छथिन। फेर की, आंखि त विस्मृत भाव सं थोड़ेक क्षण लेल केवल पाहुन पर केन्द्रित भ जैत छनि! झट दनि एक हाथ सं केस आ दोसर हाथ सं साड़ी केर आँचर सम्हारैत प्रेमक आवेग में मातल पाहून लग घर में प्रवेश करैत पलंग लग नायिका चलि जैत छथि। पलंग में सकुचायल बैसैत छथि। पाहुन भला कोना मान’बला? तुरत अपन बाहुपाश में लेबाक लेल उद्यत भ जैत छथि। लज्जा त अन्ततः स्त्रिगणक सिंगार ने भेलैक! नायिका पहिने थोड़ेक प्रतिकार करैत छथि। मुदा पाहुन की कुनो कम जाबिर छथि, झट दनि रुईस रहबाक धमकी देमय लगैत छथि। आब बेचारी नायिका, कामायनी, भला करती त की करती? समर्पण के आलावा कुनो उपाय कहाँ? विद्यापति कवि नायिका के भाव के अनुभव करैत कहैत छथि – की करबैक सुन्नरी! पुरुख के ई बड्ड पैघ दोख छैक, मुदा एकर कुनो प्रतिकारो नहि।
ई त भेल मिलन, प्रेमालिंगन, रति-रभस, नायिका आ नायक के समागम, देह सं देह आ मोन सं मोनक मिलन, सब किछु अनुकूल. मुदा बटगमनी में मिलन केर संग-संग बिछोह केर भाव सेहो प्रस्फुटित होइत छैक. आब केना मिलन सं बिछोह केर स्थिति भ जैत छैक से उदाहरण देखी:
फरल लवंग दूपत भेल सजनी गे
फल-फूल लुबधल डारि
खोंइछा भरि तोरल फफरा भरि तोरल
सेज भरि देल छीरियाय
फूलक धमक पहुँ जागल सजनी गे रुसि चलल परदेस
बारह बरख पर लौटल सजनी गे
ककबा लैल सनेस ओहि ककबा लय थकरब सजनी गे
रुचि-रुचि कैल सींगार
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे
पुरुषक नहिं विश्वास।।
बाह रे विद्यापति! नारी मनोदशा के अन्तस में आनि अगर शब्द में बखान करक हो त ई कला अपन सर्वोत्कृष्ट स्वरुप में विद्यापति केर मैथिली लोकगीत में व्यक्त होइत अछि। एक-एक भाव जेना भोगल हो. कविक ह्रदय में जेना नायिका केर घर बनल हो। उपमा एहेन जे सिंगार गर्वित होमय लागए। भाव एहेन जे नायिका के विभोर करक क्षमता रखैत हो। गीत गेबाक काल जाहि में हरेक गीत गाबय बाली मैथिलानी ओहि गीतक भाव सं अपना के जोडि सकथि। किछु उपमा मिथिला सं बाहर के अछि मुदा ओकर प्रयोग एहेन जेना ओ भाव संगे आ परिस्थिति संगे चलैत नहि दौरैत हो। ऊपर वर्णित बटगमनी पर विचार करी। लौंग केर गाछ पात आ लौंग सं लबधल छैक. ओकर सुगन्ध पाहून के निक लागनि ताहि केहू कामिनी ओकरा भरि खोइंछा तोरि लेने छथि। होइत छनि, शायद थोड़ेक आरो ल लेब त चहु दिस वास सुवास भ जैत। पाहून थोड़ेक अधिक प्रसन्न हेता। फेर तोरती त रखती कत’? व्योंत करैत फफरा में सेहो थोड़ेक तोरि राखि लैत छथि। घर अबितहि ओछायन पर सब ठाम छिट दैत छथिन। आब एहि बातक इंतजार क रहलि छथि जे पाहून त प्रेम विभोर भ जेता। रति रभस अपूर्व हैत. मुदा ई की? लौंग केर गमक सुइंघ नींद में भेर भेल पाहून उठि जैत छथि. प्रेमक प्रदर्शन करबाक बदला तमशा जैत छथि। रुसैत, तम्सैएत दूर देस चलि जैत छथि. बेचारी नायिका बारह बरख धरि वियोग में बीतबैत छथि। आब बारह बरख के बाद पाहून फेरो सं नायिका लेल ककबा (कंगही) सनेश लेने आयल छथि। नायिका के मिलन केर इच्छा छनि। केस विन्यास पहुक आनल ककबा सं क रहलि छथि। मुदा मोन में कखनो काल इहो डर होइत छनि; की पता, कुन बात पर रुसना पाहुन भरकि जेता आ कही सब किछु उल्टा ने भ जाय! भागि ने जाथि? सब सिंगार कहीं व्यर्थ ने भ जाय? मिलन के क्षण में विरह केर आशंका केर बेजोड़ वर्णन एहि गीतक मादे कैल गेल अछि। विद्यापति के माध्यम सं नायिका कहैत छथि आ गबैत छथि जे एहि पुरुख जातिक कोन भरोषा?
एहि गीतक महानता ई अछि जे नारी मनोदशा केर वर्णन एक पुरुख अर्थात एहि गीतक रचैता विद्यापति करैत छथि। ताहू सं पैघ बात जे स्त्रिगन अर्थात मैथिलानी एकरा जसोदा जकां अपन बना लैत छथि। गीत संगे अपना के जोडि लैत छथि। एक केर प्रेम आ विरह केर मनोस्थिति सबहक भ जैत अछि।
बटगमनी में एक आर विशेषता ई छैक जे ई ऋतु केर हिसाबे सेहो काम आ सिंगार केर प्रति नायिका केर भाव प्रदर्शित करैत छैक। बटगमनी केर सखी बहिनपा छैक तिरहुत आ ऋतु गीत अर्थात बारहमासा, छौमासा, एवं चौमासा। कखनो-कखनो तिरहुत आ कोनो-कोनो छौमासा आ चौमासा त एकहि बात के चर्च करैत रहैत छैक। तीनू कनिक जल्दी-जल्दी आ चलैत गेबाक गीत छैक। तीनू में समवेत गेबाक परम्परा छैक। ठीक छैक बसन्त ऋतुराज अछि मुदा मधुमास त बरसात छैक। बरसातक वर्णन कनि बटगमनी आ तिरहुत के अधिक उत्तेजक, श्रृंगारिक, कर्णप्रिय बना दैत छैक; प्रेमक भाव, विरह केर आवेग आ आशा सब जेना प्रबल भ जैत छैक।
एक एहेन बटगमनी जाहि में बरसातक अन्हरिया राति में नायिका केर मनोदशा के देखि कोन धीरमति थीर रहत? कोना नायिका पहुक घर में समागम हेतु जेती? कनि भाव के देखी:
चंद्रवदनि नवकमिनी सजनी गे
यामिनि अति अन्हार सजनी गे
सखि सँग चललि केलिगृह सजनी गे
कर पंकज दीप बारि सजनी गे
पवन झकोर जोर बहु सजनी गे
तैं धरु आँचर झाँपि सजनी गे
देखि उर अति सुंदर सजनी गे
दीप राशि उठु काँपि सजनी गे।।
ई गीत बहुत मार्मिक छैक। बरसात केर घनघोर अन्हरिया राति में नायिका पहिल बेर अपन पहु लग जा रहलि छथि। मोन में नाना तरहक भाव आबि रहल छैक। सुन्दरि चंद्रबदनि छथि, नबे पर जौबन केर भार सँ सुसज्जित भेलि छथि। चेहरा के सौन्दर्यक कतेक वर्णन करी? घनघोर राति में बरखा आ ताहू में हवा के झोंका आ उज्झट। ऐना में केलि गृह में पहु सँग जेती कोना? मुदा केहनो समय हो अभिसार त हेबे करतैक। पाहून अवश्य अकुतायल हेता आ इंतज़ार करैत हेता। सुन्नरि के सखि सब सँग कए हुनकर कमल सन कोमल हाथ में दीप राखि पहुक घर दिस बढ़ि रहलि छथि। हवा केर झट्टक अतेक तीव्र छैक जे नायिका दीप के अपन आँचर सँ झाँपने छथि। नायिका केर बक्ष अतेक उन्नत आ आकर्षक छनि से देखि दीपक रौशनी काँपे लगैत छैक आ से देखि नायिका के ह्रदय काँपे लगैत छनि जे कही दीप ने बुझा जाय!
बटगमनी में बरखा केर वर्णन आ मधु मिलन केर केहेन आकांक्षा होइत छैक तकर एक प्रमाण निम्न बटगमनी में देखु:
जखन गगन घन गरजत सजनी गे
सुनि हहरत जीव मोर सजनी गे
प्राणनाथ परदेस गेल सजनी गे
चित भेल चान चकोर सजनी गे
एकसरि भवन हम कामिनी सजनी गे
दामिनी लेल जीव मोर सजनी गे
दामिनी दमकि डेराओल सजनी गे
आब ने बचत जीव मोर सजनी गे
झिंगुर झमकत चहुँओर सजनी गे
कुहुकत कोयल मोर सजनी गे
से सुनि जिय घबराय सजनी गे
यौवन कैल घोर सजनी गे
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे
मन जूनि करिय उदास सजनी गे
सबसँ पैघ धैरज थिक सजनी गे
भ्रमर आओत तोर पास सजनी गे।।
एहि गीत सँ एक ई स्पष्ट होइत अछि जे बरखा ऋतू सही अर्थ में मधुमास अछि। केलि, प्रेम आ साहचर्य केर अनुभूति एहि मासक अपूर्व होइत अछि। जखन साहचर्य अतेक आनंददायक त अहि समय में नायिका केर नायक अगर दूर देस होथि त विरह केहेन भ सकैत छैक ओकर अनुमान लगेनाइ कतेक दुष्कर कार्य छैक! नायिका बेचारी विरहिणी केर जीवन अइ बरखा केर बज्र कारी राति में बिता रहलि छथि। जखन-जखन बरखा होइत छैक, मेघ बजैत छैक, नायिका केर ह्रदय घबरेनाइ शुरू भ जाइत छैक। बेचारी केर नायक परदेस गेल छैक, ऐना में ओकर चित भला थिर कोना रहतैक? घर में असगरे बैसलि बेचारी राति कोना कटती? के दुःख बुझतैक? राति अन्हार, बिजली के लोका चित के बेहाल केने छैक। झिंगुर अनेरे सबतरि अनघोल केने अछि। मोर मस्त भ नाचि रहल अछि; कोयलिया गीत गाबि-गाबि मदन केर ज्वाला के जगा रहल छैक। नायिका बेचारी की करथि! मोन घबरा रहल छनि। यौवन अनेरे अनघोल केने छैक। विद्यापति सांत्वना दैत कहैत छथिन; "उदास जूनि होउ, धैरज राखू, अहाँक प्रेमी अर्थात अहाँ सन पुष्प रूपी नायिका लग ई पुरुख रूपी भमर एबे टा करत।"
एहि तरहे ऋतुक सिंगार, सब समय में प्रेम, आलिंगन, केलि क्रिया, अभिसार, आ विरह एकै सङ्गे सब भाव केर निश्छल गान मैथिलानी बटगमनी के रूप में करैत छथि। ई गीत आब नहु-नहु खत्म भेल जा रहल अछि।
अहि गीत में मैथिलानी के नहि पुरुख सँ धोख, नहि सासु सँ, आ नहि समाज सँ। घर आ अँगना केर चौहद्दी सेहो हुनका लग नहि छनि फेर चलैत रास्ता में भय केहेन? जखन सब उमंगे मातलि त फेर धाख ककर। भांड़ में गेल मर्यादा आ अनेरे के खिंचल देबार। घोघट के भितर के बात गीतक आखरि बनि जेना किछु क्षण लेल मैथिलानी केँ अलग संसार में ल जाइत छनि!
एखन एतबे.......
✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
साभार: पहिल फोटो Mukti Jha केर पेंटिंग
दोसर फ़ोटो मेहदी सँ पैर के सजेने नायिका ।।।।
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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