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चमरी रहि जैतै तँ, रौइया पलटिऐ जैतै


चमरी रहि जैतै तँ, रौइया पलटिऐ जैतै




✍👤राम सोगारथ यादब 


डुबलै  सुरज  जखन , चँन्द्रमा  उगिऐ  जैतै
छनिके घडिक बात अछि, ऐहो कटिऐ जैतै

चारु ओर देखै छी जे, गुजगुज इ अन्हरियाँ
किछु  देरमे   प्रेमक  इजोत , पसरिऐ  जैतै

बँचु  यै  साँझक  गदगद अन्हरियाँसँ, धनि
कते  बेर  रहतै  कोह , भोरमे  फटिऐ  जैतै

मरुभुमिमे  गाछ  जेना , अहाँ मन बनालिय
धैर्यताक  बात  सभटा, मनमे  सटिऐ  जैतै

ऐहे  दुवा  क'दिय  बाँचिजाय , देहक चमरी
चमरी  रहि जैतै   तँ , रौंइया  पलटिऐ  जैतै

राम सोगारथ यादव


लेखकः- राम सोगारथ यादब जी









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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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