अहाँ के याद में
*** **अस्तित्व** ***
आइ काल्हि
हेरै छी हम
अपने अस्तित्व
जे
नै जानि कोना हेरा गेल
बनैत बिगड़ैत
संबंधक जड़िमे
अपने सऽ
पूछि रहलौ अछि
यक्ष प्रश्न.
की, वएह छी अहाँ?
जकर मोन पर
गढ़ल छल मात्र
हमरे नामक अरिपन
जे,
हमर सभ छोट पैघ बात
सुनबाक लेल
रहैत छल अपस्याँत.
सत्ते,
हमहीं छी ढ़हलेल
जे
बूझि बैसल छलौ
अपना आपके विशेष
बहुते खास.
मुदा आब,
ओकरा अनुभूति कराबए
पड़ैत अछि अपन उपस्थिति
लगैए जेना
अपना पहिचान लेल
अपने सऽ लड़ि रहल हम.
संभवत:
यएह छैक
विधनाक गढ़नि
यएह छैक
समय केर मांग
जे खतम भऽ जाए
अपना सऽ लड़बाक
प्रतिस्पर्धा
कारण,
आब अनसोहाँत सन लगैछ
इ संबंध.
अहूं,
किएक सहब
हमर अतिरिक्त भार.
जाउ,
हमहूं करैत छी
अहांके
एहि स्नेहक भार
आ
नेहक जंजाल सऽ
मुक्त.
हं, हमर मोन,
पर तऽ रहबे करत
हमर राज
जाहिमे बसै छी
अहां ओ अहांक इयाद.........
___✍(आरती झा)
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