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नारी

*बस्तीक स्त्री*

बस्तीक हजार टा घ'रमे
नुकाएल अछि अनेक चीज
एक चीज अछि स्त्री
स्त्री नुकाएल रहत दिनमे
नुकाएल रहत रातिमे
सभ टा स्त्री एक बेर बहराए
जमा भ' जाए एक ठाम
से नहि अंकित करत
अपन उपस्थिति
भानस करैत
नेना लेल अन्न आ कमीजक व्यवस्था करैत
छोट-छोट घ'रक थोड़ जगहमे
स्त्री बिता देत आयुक अस्सी-नब्बे बर्ख !
रान्हलो भोजन ओ घाँटत नहि
राखलो वस्त्रकेँ देह पर नहि
पेटीमे ध' देत
पृथ्वी पर सन्तति अछि
एक-एक सन्तति पाछाँ
अनेकानेक स्त्री गला देत सम्पूर्ण आयु
सन्तति लेल कहियो ओ क्रोधसँ धधकत
कैकयी जकाँ कोप-भवनमे जा बैसत गए
सन्ततिक उत्कर्ष लेल मंदिरमे दीप देत
सन्ततिक समृद्धि लेल
पहिरत ओ बाघक नह
आ ककरो भम्होड़ि लेत।

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रचनाकार-स्वर्गीय श्री 'जीवकांत'

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