समय
"समय संग हम"--(कविता)
वाह रे समय वाह !
गजबकेँ तोहर फेर बदल छौ,
आखिर आँखिकऽ नोर ,
हाथसँऽ पोछाइऐ देले ।
गजबकें तोहर गति छौ,
आखिर सबटा खुसी,
हाथसँऽ छोडाइऐ देले ।।
दुरतँ अपनासऽ कैले- कैले,
साथ जे लजैते ओहि ठाम ।
एक तर्फ खुसिकेँ लडु बँटितै,
हम पिति गमकऽ जाम ।।
वाह रे समय वाह !
गजबकेँ तोहर कोल्हु छौ ।
जहिमे तोरी जका ,
सभहक भाग्य पेडैत छे ।।
ऐहन मोड पऽ लाँ खाडा कैले,
अपनाकें खुसी नहिं साथ बाँट सकली ।
नहिं मुंहस्ँ हसिऐ सकली,
नहिं हाथसँ ताली बजाबिऐ सकली ।।
दिन राती मेहन्त करैत छी,
मुदा,सभटा फल तो छिनाइए देले ।
वाह रे समय वाह !
कि हम करैत छी ?
कि हमर लक्ष्य अछि ?
कुछो नहिं बुझ सकली ।
तोरे दोसर नाम भाग्य छौ कि ?
तोहर नीति नहिं हम बुझ सकली ।।
तो चलबैत गेले,
हम चलैत गेलि,साथे साथ मुदा,
तैंओ तोरा नहिं पहिचान सकली ।
अन्त्त्त जवानीसँ
बुढापामे धकेलिए देले ।।
वाह रे समय वाह !
गजबके तोहर नीति छौ
आखिर लहरैत चितामे धकेल,
हमर जिनगिक अंत कैए देले ।।
वाह रे समय वह !
✍राम सोगारथ यादव
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