अहाँ विन सुन्न लगैए चहुँओर राधा
कि साँझ आ कहुँ कि हम भोर राधा
अहाँ विन सुन्न लगैए चहुँओर राधा॥
सदिखन नयन तकैए सुरति अहिँके,
अहिँ लए करेज करैए किलोर राधा॥
छोडि देलौ बीच बाटमे बताह बना,
बात इ सगरो छै अगवे सोर राधा॥
देह छुवि खाय छलौ सप्पत हजार,
क्षणहिमे तोड़लौ प्रितक डोर राधा॥
जते बहे निर्मल नोर 'विद्यानन्द' के,
तते हसे अहाँक कोमल ठोर राधा॥
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__✍ विद्यानन्द वेदर्दी
सप्तरी,राजविराज
हाल: विराटनगर
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