मिथिला में जितिया पावैन (फोटो के साथ में)
मिथला में जितिया पावैन
<><><><><><><><><><>
संतान दीर्घायुक कामना सौं आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमीक अत्यन्त कठिन आ उच्च फल दैइवला जितिया पावैन मिथिला में अति लोकप्रिय आ महत्वपूर्ण अछि।
अपन मिथिला में इ व्रत केनिहारि सधवा लोकनि एक दिन पूर्व मरूआ रोटी आ माछ खाई छथि, "जिया जीवछ बढई छै"।विधवा लोकनि अरवा-अरवैन खाई छथि।पितरैन के निमंत्रण दय जिनका जते जे उपलब्ध पवित्र सौं भोजन करबै छथि आ तेल सिनूर लगा जैंत-पीच के सेवा सुश्रुखा कय ससम्मान विदा करै छथि , जौं कनियाँ-बहुरिया निमंत्रित रहै छनि त थारी बाटी में साजि पारस पठा दै छथि।
जाहि मैथिल बेटीक एहिसाल विवाह भेल रहै छैन सासुर सौं माछ मरूआ ओठगनक लेल दही-चूड़ा आ श्रृंगारक समान चूड़ी लहठी सारी आदिक भार आबई छनि,सौंसे टोल समाज सोलहो श्रृंगार कय माछ आ मरूआ रोटी अंगने अंगने छमकि छमैक के परसै छथि कहल जाई छै अहिवात सुरक्षित रहै छै।
मिथिला में व्रत सौं पूर्व जौं अष्टमी तिथि नै परल रहै छै त भोरूकवा में चूड़ा दही चीनी अम्मट अचार नून मिरचाई जिनका जतेक स्वाद साजो सामान लय ओठगन करै छथि दू साँझ जाधरि तिथि नहिं बदलल निर्जला उपास रहे परै छनि।धियापुता सब त ओठगनक नाम सुनि आनंदविभोर भय जाई छथि आ माँ के खूब आगू पाछू करै छथि जे भोरूकवा में ओठगन करब किएक नै हुए भोरूकवा में दही चूड़ा खाई वला एकटा येह अद्वितीय पावैन अछि।
पुरूष लोकनि स्त्री के खौंझबै लेल इहो कहै छथि
"जितिया पावैन बड़ भारी
धियापुता के ठोकि सुतेलनि
अपने लेलैन भरि थारी"
किन्तु जे माँ ओहि संतानक लेल एतेक कठिन व्रत रखै छथि ओ कहूँ ओहि संतान के ओठगन काल नहिं उठबथिन जाहि बेर ओठगनक समय अष्टमी परियो जाई छै त अपने त नहिंये खाई छथि धियापुता के अवश्य ओठगन करबै छथि किएक त मैथिल स्त्री पति संतान परिवारक लेल सदा अपन बलिदान बलिवेदी पर रखने रहै छथि।
अष्टमी जाहि दिन परै छै मैथिल व्रती स्त्री जाहि ठाम स्नान करै छथि इनार पोखैर नदी वा कल पर पूब मुँहे ठार भय आँजुर में जल लय सूर्यदेव के इ मंत्र पढैत अर्घ्य दै छथि-
"नम: एषोर्घ: सूर्यनारायणाय नम:"
एहि तिथि में विशेष योग भेला सौं "षडजितिया" सेहो लगै छै अहिदिन सौं नवका व्रती व्रतक आरंभ सूर्यदेव के अर्घ्य दऽ हथ में तेकुशा तील जल लऽ इ मंत्र पढि संकल्पित होई छथि-
"नमो अद्य आरभ्य षोडष वर्षाणि यावत् प्रतिवर्षिया आश्विन कृष्णाष्टम्यां प्रदोषे जीमूतवाहनस्य व्रत-पूजा संकल्प अहं करिष्यामि"
इ व्रत खंडित नै हेबाक चाही।
अर्घ्योपरांत दिनभरि निर्जला रहि साँझखन पवित्र से गायक गोबर सौं अंगना नीपी एकटा छोटे खाधि खुनि पोखरीक निर्माण कय ओकरा महार पर एकटा पाकडिक ठारि गाडि गोबर-माटिक चिल्ह आ गिदरनीक आकृति बना डारि पर चिल्हौर आ निचा में गिदरनीक के राखि कलश में कुशक जीमूतवाहनक मूर्तिक स्थापन कय बाँसक पात रंग विरंगक साग पान सुपारी सिनूर टिकली सम सामयिक फल फूल अक्षत मखानादि सौं डाली सजा नैवेद्य ओंकरी सोंहाँस सबचीजक बारीकी सौं व्यवस्था कय श्रद्धा पूर्वक संतान रक्षित शालिवाहन राजाक पुत्र जीमूतवाहनक पूजा करै छथि।महादेव द्वारा पार्वतीक संतान रक्षार्थ इ व्रत कथा करलेल कहने छथि। चिल्ह आ सियार पर आधारित कथा मनोयोग सौं सुनि आरती विसर्जन करै छथि।
प्रात भेने तिथि बदलला के बाद स्नान ध्यान कय जीतवाहन के नैवेद्य दय पारण करै छथि।
**नोट-जे ओरियान नै हुए मानसिक क ली।
माँक संतानक लेल कठिन तपस्या।
हे माँ! हे जननी! आहाँ के शत् शत् नमन।
जय मिथिला जय मैथिल जय मैथिली
*साभार - मिथिला पेज
<><><><><><><><><><>
![]() |
| पूजा के लेल सजल डाली |
संतान दीर्घायुक कामना सौं आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमीक अत्यन्त कठिन आ उच्च फल दैइवला जितिया पावैन मिथिला में अति लोकप्रिय आ महत्वपूर्ण अछि।
अपन मिथिला में इ व्रत केनिहारि सधवा लोकनि एक दिन पूर्व मरूआ रोटी आ माछ खाई छथि, "जिया जीवछ बढई छै"।विधवा लोकनि अरवा-अरवैन खाई छथि।पितरैन के निमंत्रण दय जिनका जते जे उपलब्ध पवित्र सौं भोजन करबै छथि आ तेल सिनूर लगा जैंत-पीच के सेवा सुश्रुखा कय ससम्मान विदा करै छथि , जौं कनियाँ-बहुरिया निमंत्रित रहै छनि त थारी बाटी में साजि पारस पठा दै छथि।
![]() |
| घिरा पता में पूजा केर फोटो |
जाहि मैथिल बेटीक एहिसाल विवाह भेल रहै छैन सासुर सौं माछ मरूआ ओठगनक लेल दही-चूड़ा आ श्रृंगारक समान चूड़ी लहठी सारी आदिक भार आबई छनि,सौंसे टोल समाज सोलहो श्रृंगार कय माछ आ मरूआ रोटी अंगने अंगने छमकि छमैक के परसै छथि कहल जाई छै अहिवात सुरक्षित रहै छै।
![]() |
| मरुवा के रोटी |
मिथिला में व्रत सौं पूर्व जौं अष्टमी तिथि नै परल रहै छै त भोरूकवा में चूड़ा दही चीनी अम्मट अचार नून मिरचाई जिनका जतेक स्वाद साजो सामान लय ओठगन करै छथि दू साँझ जाधरि तिथि नहिं बदलल निर्जला उपास रहे परै छनि।धियापुता सब त ओठगनक नाम सुनि आनंदविभोर भय जाई छथि आ माँ के खूब आगू पाछू करै छथि जे भोरूकवा में ओठगन करब किएक नै हुए भोरूकवा में दही चूड़ा खाई वला एकटा येह अद्वितीय पावैन अछि।
पुरूष लोकनि स्त्री के खौंझबै लेल इहो कहै छथि
![]() |
| दही चुरा चीनी |
"जितिया पावैन बड़ भारी
धियापुता के ठोकि सुतेलनि
अपने लेलैन भरि थारी"
किन्तु जे माँ ओहि संतानक लेल एतेक कठिन व्रत रखै छथि ओ कहूँ ओहि संतान के ओठगन काल नहिं उठबथिन जाहि बेर ओठगनक समय अष्टमी परियो जाई छै त अपने त नहिंये खाई छथि धियापुता के अवश्य ओठगन करबै छथि किएक त मैथिल स्त्री पति संतान परिवारक लेल सदा अपन बलिदान बलिवेदी पर रखने रहै छथि।
![]() |
| थारी में खाना |
अष्टमी जाहि दिन परै छै मैथिल व्रती स्त्री जाहि ठाम स्नान करै छथि इनार पोखैर नदी वा कल पर पूब मुँहे ठार भय आँजुर में जल लय सूर्यदेव के इ मंत्र पढैत अर्घ्य दै छथि-
"नम: एषोर्घ: सूर्यनारायणाय नम:"
एहि तिथि में विशेष योग भेला सौं "षडजितिया" सेहो लगै छै अहिदिन सौं नवका व्रती व्रतक आरंभ सूर्यदेव के अर्घ्य दऽ हथ में तेकुशा तील जल लऽ इ मंत्र पढि संकल्पित होई छथि-
![]() |
| डेरवा माछ |
"नमो अद्य आरभ्य षोडष वर्षाणि यावत् प्रतिवर्षिया आश्विन कृष्णाष्टम्यां प्रदोषे जीमूतवाहनस्य व्रत-पूजा संकल्प अहं करिष्यामि"
इ व्रत खंडित नै हेबाक चाही।
![]() |
| पूजा के समान सब |
अर्घ्योपरांत दिनभरि निर्जला रहि साँझखन पवित्र से गायक गोबर सौं अंगना नीपी एकटा छोटे खाधि खुनि पोखरीक निर्माण कय ओकरा महार पर एकटा पाकडिक ठारि गाडि गोबर-माटिक चिल्ह आ गिदरनीक आकृति बना डारि पर चिल्हौर आ निचा में गिदरनीक के राखि कलश में कुशक जीमूतवाहनक मूर्तिक स्थापन कय बाँसक पात रंग विरंगक साग पान सुपारी सिनूर टिकली सम सामयिक फल फूल अक्षत मखानादि सौं डाली सजा नैवेद्य ओंकरी सोंहाँस सबचीजक बारीकी सौं व्यवस्था कय श्रद्धा पूर्वक संतान रक्षित शालिवाहन राजाक पुत्र जीमूतवाहनक पूजा करै छथि।महादेव द्वारा पार्वतीक संतान रक्षार्थ इ व्रत कथा करलेल कहने छथि। चिल्ह आ सियार पर आधारित कथा मनोयोग सौं सुनि आरती विसर्जन करै छथि।
प्रात भेने तिथि बदलला के बाद स्नान ध्यान कय जीतवाहन के नैवेद्य दय पारण करै छथि।
**नोट-जे ओरियान नै हुए मानसिक क ली।
माँक संतानक लेल कठिन तपस्या।
हे माँ! हे जननी! आहाँ के शत् शत् नमन।
जय मिथिला जय मैथिल जय मैथिली
*साभार - मिथिला पेज







कोई टिप्पणी नहीं