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बूझल छल कहाँ जे बिखरि ई जेतै

मोन'क कोन सं
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छल निजगुत हमर एकटा खोंता एतै
बूझल छल कहाँ जे बिखरि ई जेतै

सभ अप्पन रहय खाम्ह ढाहय बला
आसहि टा रहल घ'र सम्हरि ई जेतै

भेल चेतौनी सेहो नहि मानल मोदा
सोचल जे भरोस की भहरि ई जेतै

आब बसाते बहल छै माहुर सं भरल
हमरा कहने की अन्हर ठहरि ई जेतै

तैयो हिय में रहल अगबे नेहे सरल
सगरो संसार धरि की पसरि ई जेतै

मोन होइए जे कनितौं मोदा की करू
जं कानब त' दुनियाँ बदलि की जेतै

- ✍प्रणव कान्त झा

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