सांझ परल बरखा मे शरद केर भोर यौ
शरद मैथिलि गीत
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मटकि रहल धान बोन, पुरबा केर जोर यौ,
सांझ परल बरखा मे शरद केर भोर यौ।
फुलायल अछि "काश" बान्ह
पोखरि जल उमरल छै
मेघ केर विदा क'
आकाश नील निर्मल छै,
आबि रहलि माँ दूर्गा, मुस्की ल' ठोर यौ,
सांझ..........॥
सरस-रस भरि उपवन
मखान पान पसरल छै
हथिया केर मेघ सूढ़
बना कोन घुमरल छै,
स्वाति लेल चातक, बहाबै छथि नोर यौ,
सांझ..........॥
दूबि परल शीत बून्न
मोती सन चमकै छै
भगवतीक स्वागत मे
सिंगरहार गमकै छै,
बाल-चान बिहुंसि रहल, नील गगन कोर यौ,
सांझ..........॥
छोट छीन्ह बेंग सभ
फुदकि रहल आंगन मे
खेलि रहल हरखित भ'
पहिल शरद जीवन मे,
थोड़ लागै ठंढा आ गरमी आब थोर यौ,
सांझ..........॥
मटकि रहल धान बोन, पुरबा केर जोर यौ
सांझ परल बरखा मे शरद केर भोर यौ॥॥
✍Rajesh mohan
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मटकि रहल धान बोन, पुरबा केर जोर यौ,
सांझ परल बरखा मे शरद केर भोर यौ।
फुलायल अछि "काश" बान्ह
पोखरि जल उमरल छै
मेघ केर विदा क'
आकाश नील निर्मल छै,
आबि रहलि माँ दूर्गा, मुस्की ल' ठोर यौ,
सांझ..........॥
सरस-रस भरि उपवन
मखान पान पसरल छै
हथिया केर मेघ सूढ़
बना कोन घुमरल छै,
स्वाति लेल चातक, बहाबै छथि नोर यौ,
सांझ..........॥
दूबि परल शीत बून्न
मोती सन चमकै छै
भगवतीक स्वागत मे
सिंगरहार गमकै छै,
बाल-चान बिहुंसि रहल, नील गगन कोर यौ,
सांझ..........॥
छोट छीन्ह बेंग सभ
फुदकि रहल आंगन मे
खेलि रहल हरखित भ'
पहिल शरद जीवन मे,
थोड़ लागै ठंढा आ गरमी आब थोर यौ,
सांझ..........॥
मटकि रहल धान बोन, पुरबा केर जोर यौ
सांझ परल बरखा मे शरद केर भोर यौ॥॥
✍Rajesh mohan

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