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हमरा चढौने होउ तऽ बलियो चढा दिहें

शोणित मे कलम बोरि अपन नाँ कढा लिहें
हमरा चढौने होउ तऽ बलियो चढा दिहें

पोखैर खुना के राखि देने जा रहल छियौ
सट्ठा जँ होउ तऽ घाट सब पक्के मढा लिहें

धकियौने छौक आइ जतेक काटि-छाँटि कय
तोँ मर्द छेँ तऽ कम सऽ कम ओतबो बढा लिहें

चलबाक छौक दूर धरि नेनहर बगूर पर
आ हाथ लेल लोह केर सिक्कर गढा लिहें

मैथिल समुद्र मे उठय जहिया कोनो ज्वाइर
शप्पथ जे अगिले माँगि ले हमरे अढा लिहें

लहकैत कलम केर एगो दहकैत सन गजल
अपना सँ नहि हेतौक तँ 'सरस' सँ पढा लिहें...!

लेखक -✍ सियाराम झा 'सरस'
फोटो- सड़क नाटकसँ
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