अपन भाभट सम्हारु यै रहलो ने जाय।
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बाण नजरक अहाँ के ई सहलो ने जाय
अपन भाभट सम्हारु यै रहलो ने जाय।
चाइल अहाँक मदमातल हिलैये धरती
मुस्की जिया दैये लाश चढ़ल अरथी
मारै हिलोर हिया कते कहलो ने जाय
अपन भाभट सम्हारु यै रहलो ने जाय।
नींदों हरा गेल छीनल हमर चैनों
मिलल अझक्के जखन संग नैनों
हियाक हाल देखु आब हंसलो ने जाय
अपन भाभट सम्हारु यै रहलो ने जाय।
भोर- सांझ, दिन- राइत रहलौ उदासे
मोनक ई मधुबन पड़ल अछि उपासे
केकरा सँ कहबै ई बजलो ने जाय
अपन भाभट सम्हारु यै रहलो ने जाय।
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राजीव कर्ण।
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