मोन सँ केलहुँ अहाँ सँ सेनूर दाने सहीँ॥
मोन सँ केलहुँ अहाँ सँ सेनूर दाने सहीँ॥
✍विधानन्द वेदर्दी
ईन्द्रक परी छी अहाँ,हम त' दरबाने सहीँ
छोडि हमरा,जीवन संगी चुनु आने सहीँ॥
अपन तन किए ने ओकर नाम करि दिय,
मोन सँ केलहुँ अहाँ सँ सेनूर दाने सहीँ॥
साँचल हरेक सपना अहाँके विपना होय,
ओइ खातिर दिय पड़े हमरा जाने सहीँ॥
अहाँ नजरिमे छोट जाति आ गरिब हम,
फुसके घरमे रहैछी,मानिके मकाने सहीँ॥
जौ नै रहे दुनियामे बिसरि जेब 'राधा',
'विद्यानन्द'के समझि अहाँ विराने सहीँ॥
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✍विद्यानन्द वेदर्दी
राजविराज,सप्तरी
हाल: विराटनगर,

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