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हे जननी, शरण अहींक हम एलहुँ-२

हे जननी
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✍अमरनाथ  मिश्र'
हे जननी, शरण अहींक हम एलहुँ-२
शरण अहींक हम एलहुँ, हे जननी-२
शरण अहींक हम एलहुँ ॥

जीवन कठिन कठोर बनल अछि,
दु:ख छोड़ि सुख नहि पेलहुँ, हे जननी।
संकट विकट पछोर केलक अछि,
दर-दर ठोकर खेलहुँ ॥
हे जननी, शरण अहींक---------

भवसागर बीच नाव हमर अछि,
डगमग-डगमग भेलहुँ, हे जननी।
जीवन अगम अथाह बनल अछि,
मातु कियैक विसरेलहुँ ॥
हे जननी, शरण अहींक---------

पुत्र "अमर" केँ व्यथा कथा अछि,
आसरा अहींक लगेलहुँ, हे जननी।
थाकि हारि दुआरि छेकल अछि,
शरणागत हम भेलहुँ ॥

हे जननी, शरण अहींक हम एलहुँ-२
शरण अहींक हम एलहुँ, हे जननी-२
शरण अहींक हम एलहुँ ॥

दुर्गापूजाक अनंत शुभकामनाक संग
अमरनाथ मिश्र' भटसिमरि

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