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घर-घरमे आबिक' लक्ष्मी बास करैत रहए

घर-घरमे आबिक' लक्ष्मी बास करैत रहए


✒✍ विधानन्द वेदर्दी



सुख,शान्ति,समृद्धिक फुलझरी झरैत रहए
घर-घरमे आबिक' लक्ष्मी बास करैत रहए॥

कलियुगमे बढि रहल अछि दुराचार सगरो,
दुराचारी रावण, रामचन्द्र हाथे मरैत रहए॥

यमुना सन बहिनक आशिष जीनगी भरि,
भरदुतियामे एक-एक भाइक' लगैत रहए॥

भागि जाय काल घर, दुआरि, अङ्गना सँ,
सभक मोनमे मानवताक दीप जड़ैत रहए॥

आऊ सृजनक गीत मिलि गाबी विद्यानन्द,
जे एक दिन नै,सृष्टी सदति चमकैत रहए॥
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✒✍ विद्यानन्द वेदर्दी
  राजविराज,सप्तरी



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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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