कठपुतली ( मैथीलि नाटक)
नाटक देखि वा भुखके शान्त करी सुजीत जी के नव कथा संग्रह बुलबुलमे एहिपर एकटा कथा आयल अछि एकबेर पढी । १३टा कथामे ई पहिल अछि । ई कथाक नाम कठपुतली अछि ।
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कठपुतली
✍सुजीत कुमार झा
पाँचे बजे ओ नाटक घर पहुँच गेल छल । ओना शो ७ बजेसँ छल, मुदा ओकरा चयन कहाँ छलैक ? आजुक दिनकेँ ओ बहुत व्यग्रतासँ बितल एक हप्तासँ प्रतीक्षा कऽ रहल छल । कोना ओ ई एक सय टका बचौने छल, ओ ओहे जनैत अछि । पाँच बाजि गेल छल, जँ यदि भीड़ बेसीओ हएत तऽ टिकट आरामसँ भेटि सकैत अछि ।
ब्रह्मा भाइकेँ ओ कहि देने छल, आई नाटक देखए जएबाक अछि, जल्दि जा रहल छी । ओतए पहुँच कऽ बिल्कुल एना लगैत अछि, जेना सपनाक संसारमे आबि गेल होइक । चारुदिस नाटककेँ पोष्टर आ सभ्रान्त व्यक्तिसभक भीड़ । काठमाण्डूक अन्य नाटक घर चलि जाउ वा इम्हर नाच घरमे जाउ । चारुदिस ओहेसभ देखाइ दैत छथि, जेकरासँ ओकरा प्रेरणा भेटैत हुए । प्रत्येक क्षण नाटकमे डुबल, रंगमंचक बात करैत लोक । एहने वातावरण, ओ चाहैत छल । अपन शहरमे ओकरा ई सभ नहि भेटि पाबि रहल छल । इहए माहोल जेकरा लेल, अपन घरसँ एतेक दूर एतेक पैघ शहरमे आएल छल ।
हँ, ओतउ कहिओ–कहिओ नाटक होइत छल । कोनो संस्थाक वार्षिक उत्सव वा कोनो मेला भेल जेना दुर्गा पूजा, छठि, होरी, गणेश पूजा सभमे नाटक मंचित होइत छल । ओहिमे टिकट नहि लगैत छल । ओ हरेकराति अबेरधरि बैसि कऽ पूरे मंचन देखैत रहैत छल । ओतए एहन रंगशाला नहि छल । खाली स्थानपर मंच बना कऽ नाटक होइत छल । रातिमे जखन घरमे भोजन बनावएकेँ समय होइत छल तऽ नाटक स्थलपर लोकक भीड़ बढि़ जाइत छल, जाहिमे बच्चा बेसी होइत छल । कारण ओकरा इहे बुझएमे अबैत छल, भोजन बनावएमे जखन बच्चा माँकेँ परेशान करैत हएत तऽ माँ कहैत हएत, ‘जो बेटा मुन्ना, जनक चौकपर नाटक देखि कऽ आ, तखनधरि हम भोजन बना लैत छी । एतए रहबे तऽ मुन्नीसँ झगड़ा होइत रहतउ ।’
महिलासभ अपन पतिसँ कहैत हएत, ‘अहाँ हमरा आरामसँ भोजन बनावए दिअ ताबैतधरि मिश्रा जीकेँ लऽ कऽ नाटक देखि आउ । भोजन बनलाक बाद टिंकुकँे पठा कऽ बजा लेब ।’
ओहिठाम हल नहि भेलाक कारण जखन मोन होइत छल, लोक अबैत छल आ जखन मोन होइत छल चलि जाइत छल । मंचक आगामे बच्चासभ रहैत छल आ पाछु बड़कासभ । किओ लगातार पाँच मिनेट मुँह बन्द कऽ कऽ नहि बैसैत छल । बीच–बीचमे लोक सीटी सेहो बजवैत रहैत छल । खास कऽ कऽ मंचपर कोनो सुन्दर लड़की अबैत छल आ ताली नहि बजएबला स्थानपर सेहो अपना शहरक प्रसिद्ध मस्तीकँे उदाहरण दैत एतेक एकतासँ एतेककाल ताली बजबैत रहैत छल, एक दू लाइन संवाद सुनाइ देब आसान नहि होइत छल ।
दर्शकमे किशोर लड़कीकँे होवएकेँ सम्भावना सेहो होइत छल । एहि सम्भावनाकँे नजरअन्दाज नहि करैत किछु स्थानीय स्कुलक किशोरसभ सम्भावनाकँे खोजीमे ओहिठाम चलि अबैत छल, नवका सुन्दर सर्ट आ टमाटर कट जेहन क्रिज लागल पेन्ट लोककेँ आकर्षित करैत छल ।
किछु गिन्तीकेँ दर्शक होइत छल, नाटककेँ नाटक जकाँ देखैत छल । बाँकी मात्र टाइम पास करबाक लेल अबैत छल । ओकरा कहिओकाल कऽ बहुत तामस होइत छल, ई नाटक संस्था जे एतेक दूरसँ अबैत अछि कि सोचत हमरा शहरक विषयमे ? कि ओ इहे शहर अछि, देशकेँ बड़का–बड़का नाटककार रमेश रञ्जन, अवधेश पोखरेल जेहनकँे जन्म देने अछि । मैथिलीक शेक्सपीयर महेन्द्र मलंगियाक कर्मभूमि रहल अछि । जिनकर लिखल नाटकक मंचन आइयो देशक विभिन्न स्थानपर होइत अछि ।
किछुदेरमे लोकक भीड़ जम्मा होबए लागल छल । हरेकदिस पढ़ल लिखल आ सम्भ्रान्त लोकक झुण्ड देखाइ दऽ रहल छल । सुन्दर–सुन्दर कार वा अन्य गाड़ीमे बैसि कऽ महिला पुरुष आ स्मार्ट युवा जिनका आगा सम्भावना बहुत सागर लहरा रहल छल, मात्र नाटक देखबाक लेल अपन समय निकालि कऽ आएल छल । सभकेँ दिस देखि कऽ लगैत छल, सभ मात्र नाटक आ सबाना आजमीक विषयमे बात कऽ रहल अछि ।
एकटा सपनाकेँ सत्य होएबाक जेहन सभ किछु, ओकरा लेल रंगमंचक बहुत बड़का कलाकार, ओकर प्रिय अभिनेत्री आई आँखिक सोझा अभिनय करतीह । एतए सहीमे सम्मान होइत अछि, नाटक आ अभिनेताकेँ । ओतए शहरमे मित्रसभ मात्र एहिबातपर ओकर मजाक उड़ौने छल, ओ आन्हर लड़काद्वारा प्रस्तुत नाटक देखए चलि गेल छल ।
‘तऽ कि तोसभ मात्र लड़कीएकेँ देखए जाइत छिही ? नाटक बढि़या हुए वा खराब, अभिनय कोन स्तरक अछि, प्रकाश, मंच, संगीत केहन अछि, एहिमे तोरासभकँे कोनो फरक नहि पड़ैत छौक ?’ पूरा बहसकेँ बाद सहीमे चौकएबला बात ओकरा पत्ता चलल छल ।
उत्तरमे सभ एकहिसँग हँसि देने छल । ओकरा अपना संगतिपर दया आएल । स्नातकक परीक्षा समाप्त होइते ओ काठमाण्डू चलि आएल । ओतए ओहँुना ओकरा लेल किछु नहि बचल छल । बाबूजीसँ ओकर अल्पसंवाद, जे प्रारम्भेसँ औपचारिक रहल, आब नाटकप्रति बढ़ल सखक कारण समाप्त जकाँ भऽ गेल छल । माँ बड़का भाईजीक तलब, हुनक विवाह जेहन समस्यामे फसल छलीह ।
एतए आकांक्षाक जहाजपर बैसि कऽ आएल ओ ओहि समय पूरापूर निराश भऽ गेल, जखन ओ छोटका–बड़का, धनी–गरीबसभकेँ भागैत देखलक । एहि अन्हरदौड़Þमे, जतए ओकरा स्वयं नहि पत्ता छल कोन मूल्यपर कि पाबएकेँ लेल दौड़ रहल छी ? ओ एकटा गोल परिधिमे भगैत लोककेँ देखलक, जे भागि कऽ हरेक साँझ ओहि बिन्दुपर आबि जाइत अछि, जतएसँ भोरमे भागब शुरु कएने छल । जीवनक एकदिन निकलि जएबाक अनुभवो नहि होइत छल आ दोसर दिन भागब शुरु कऽ दैत छल । ओ बुझि गेल, एतए स्थान बनाएब ओतेक आसान नहि अछि, जतेक ओ बुझैत छल ।
नाटककँे आनन्द उठावएकेँ लेल जीबित रहब आवश्यक अछि, जीबित रहबाक लेल किछु खाएब, किछु खएबाक लेल कमाएब सेहो । ओ एकटा कुरीयर कम्पनीमे काज करब शुरु कऽ देलक । ओना बीना मोटरसाइकिलकेँ काज भेटएमे बहुत दिक्कत भेल आ करएमे सेहो बहुत दिक्कत । मुदा भीतरक एकटा अभिलाषा ओकरा हरेक समय सक्रिय रखैत छल ।
चाहैत तऽ काठमाण्डूक कोनो करकुटुम्ब वा मित्रसँ उधार वा किछु मद्दत लऽ सकैत छल मुदा अपना भीतरक आगि आ स्वाभिमान ओकरा असगरे सपनाक देबालपर अपन पसीनाक प्लाष्टर करएमे लगौने छल ।
किछु समयक बाद ओ एकटा नाट्य संस्था ज्वाइन कऽ लेलक, जतए साँझ कऽ दू तीन घण्टा रिहर्सलमे समय देवए पडैÞत छल । निर्देशक जे ओहि नाट्य संस्थाक मालिक रहथि, ओकरासँ एक हजार टाका फि सेहो लैत छल जे बादमे ओकरा व्यर्थ लागए लागल छल । तीनटा नाटकक अनुभव बतौलाक बादो निर्देशक ओकरा मंच सज्जाक काजमे लगौने छल आ एतेक दिन बितलाक बादो एखनधरि ओ वएह कऽ रहल छल । मुदा पात्रकेँ संवाद बजबाक ढंङ्गसँ ओहि संस्थाकेँ पूरा स्तर बुझएमे चलि अबैत छल । सदस्यसभ कतेको क्षेत्रकँे छल ओकर संवाद बजबाक कलासँ आँखि बन्द कऽ कऽ सेहो पत्ता लागि जाति छल, कोन मातृभाषा बाजएबला लोक अछि । धीरे–धीरे ओ ओतए जाएब छोडि़ देलक आ कोनो योग्य निर्देशक आ नाट्य संस्थाकँे खोजी करए लागल ।
आब दिनभरि ओ अपन काज करैत छल आ साँझमे अफिसमे जानकारी करा काठमाण्डूक नाट्य संस्थामे साटल निर्देशकक फोन नम्बर नोट करए लगैत छल । फेर प्लान करए, काजक बोझ कम आ पैसाक आम्दानी बढ़लाक बाद कोनो बढि़या नाट्य संस्थामे जुडि़ कऽ अभिनय करब । तखनधरि नाटकसँ जुड़ल रहबाक तरिका ओकरा नाटक देखए आ ओहिसँ जुड़ल साहित्य पढ़एकेँ लेल बाध्य कएने छल ।
धीर–धीरे बहुत लोक जम्मा भऽ चुकल छल । ओसभ अपन मित्रक सँग छोट–छोट समूह बना कऽ बातचित कऽ रहल छल । ओकरा अनुभव भेल, कतेक मोनसँ ओ नाटककेँ पोष्टर देखि रहल अछि आ कतेक भक्तिभावसँ नाटकक विषयमे बात कऽ रहल अछि । मुदा ओतए बाबूजी ई कहैत छलथि, ‘झूठफूसकेँ कलाकारसभ इम्हर ओम्हर नचैत रहैत अछि । कोनो नीक घरक लोक थोरहे रहैत अछि ..... ।’
ओना ओकर कम तलबमे हरेक नाटक देखि पाबि सम्भव नहि छल, मुदा ओ नाटक अवश्य देखैत छल, जकर टिकटक मोल कम रहैत छल । २५÷३० सँ बेसीकँे नहि टिकट होइत छल तऽ पैसाक कमीक कारणसँ ओकरा कतेको पसीनक निर्देशककेँ नाटक छोडि़ देबए पडैÞत छल, जकर पूर्ति ओ ओकर समीक्षा पढि़ कऽ करैत छल ।
जीवन एखन बहुत कठिनसँ चलि रहल छल । ई एक सय रुपैया जुटावएकेँ लेल बितल एक हप्तासँ एकहुँ कप चाह नहि पिलक अछि । मुड फ्रेस करबाक लेल चाह बहुत आवश्यक अछि । जतेक जल्दि एकर आदत छुटि जाइ ओतेक बढि़या हएत । ओना चाह, कनी मनी भुख सेहो मारैत अछि । ओना कनी मनी भुख ओकरा लागि रहल छल, एतेक बढि़या माहोलमे एतेक बड़का अभिनेत्रीक नाटक देखबाक उत्साह ओहि भुखपर हाबी भऽ गेल छल ।
ओ प्रसन्न छल आ पहिलबेर एक सय टकाक टिकट किनएकेँ लऽ कऽ एकदम गम्भीर सेहो । जेबमे किछु खुद्रा पैसा सेहो छल, बसक टिकटमे काज आवएबला छल । टिकट यदि पचासकेँ भेल तऽ आओर मजा आएत । नाटको देखि लेब आ भरि पेट मःमः सेहो खा लेब । पचास रुपैया तऽ चारि पाँचदिन चलिए जाएत, एकरबाद तलब सेहो भेटत । ई तऽ सोचने छल, जे ई नाटक देखि लेब यदि पैसा बचल तऽ रातिमे खाएब । ब्रह्मा भाईकँे कहि देने छल, ‘एहिबेर तलब समयपर चाही ।’
ब्रह्मा भाई ओहि कुरीयर कम्पनीक मालिक रहथि, जाहिमे ओ काज करैत छल । ओ देखएमे लगैत छला जे ओ, कुरीयर कम्पनी चलावएकँे लेल एहि पृथ्वी पर जन्म लेने छथि । छोट कद, दूरधरि निकलल पेट, बड़काटाकेँ माथ जाहिपर बचल केशकेँ रंगएकेँ चक्करमे अपन चानि रंगि लैत रहथि । ढिलढालबला कपड़ामे ओ एकटा इन्ट्रेस्टेड पार्सल लगैत रहथि । मुदा ओ हृदयक बहुत बढि़या लोक रहथि आ ओकर नाटक प्रेमक कारण अफिससँ कनिक जल्दि निकलि जएबाक आदेश दऽ दैत रहथि । ओ बिजनेसमैन भेलाक बादो एकटा कलाप्रेमी रहथि । अपन क्याम्पसक समयमे नाटकमे हिरो बनैत छला । ओ ब्रह्मा भाईसँ एक–दूबेर मजाकेमे सही, नाटक देखए चलबाक लेल आग्रह कएने छल । मुदा हुनक कहब रहन्हि, ‘पूरे संसारे एकटा रंगमंच अछि आ हमसभ कठपुतली छी ।’
ओ एहि संसारक नाटककेँ बहुत नजदिकसँ देखने रहथि एहिद्वारे एहि नाटकमे हुनक मोन नहि लगैत छल । ओकरा नाटकक विषयमे बात कएला पर ब्रह्मा भाई ई बात बराबर दोहरबैत छलथि आ बादमे इहो अवश्य जोडि़ दैत छलथि, युवा अवस्थामे ओ बहुत रसीक आ कलाप्रेमी रहथि ।
आई ओकराद्वारा सबाना आजमीक चर्चा करिते, ओकरा तुरुन्त छुट्टी दऽ देने रहथि । एहि रहस्यकेँ खुलासो कएलन्हि, ‘युवा अवस्थामे ओ सबाना आजमीकँे बहुत बड़का फ्यान छलथि ।’
ओ टिकट खिड़कीकेँ खुलबाक प्रतीक्षा कऽ रहल छल । एखनधरि तऽ खुलि जएबाक चाही छल । प्रायः ७ बजेक शो केँ लेल ६ बजे खिड़की खुलि जएबाक चाही । मुदा ६ सँ उपर भेलाक बादो खिड़की नहि खुजल छल । बन्द खिड़कीक भीतर एक गोटेकेँ किछु कागजपत्र सम्हारिकऽ लऽ जाइत, ओ देखलक ।
‘सुन्नुस दाई (सुनू भाईजी)...... ।’
‘भन भाई (हँ कहुँ) ।’
‘यो टिकट खिड़की अहिलेसम्म बन्द किन रहेको छ ? टिकट कुन बेला देखि काटिन्छ ? (ई टिकट खिड़की कखनधरि बन्द रहत ? टिकट कखनसँ कटत ?’
‘टिकट....? कुन टिकट ? (टिकट ....?कोन टिकट ? )’
‘यो नाटकको टिकट.....(ई नाटककेँ टिकट )’
‘टिकट छैन ?(टिकट नहि अछि ?) पासबाट एन्ट्री रहेको छ । (पाससँ एन्ट्री रहल अछि ।)’
‘पाससँ....? कसरी भेटाउँछ (पाससँ....? कोना भेटत ।)’ ओ आश्र्चयमे छल, ओकरा पत्ते नहि चलल छल ।
‘अब भेटाउँदैन जसलाई भेटनु थियो, त्यसलाई भेटाइहाल्यो । (आब नहि भेटत । जकरा भेटबाक छल, ओकरा भेटि गेल अछि ।)’ ओ तमसाइत बाजल ।
‘इम्हर तऽ कतहुँ नहि लिखल अछि, टिकट पाससँ देल जाए ।’ कहैत ओ आगा बढि़ गेल ।
एहि विषयमे सोचबे नहि कएने छल । ओ ध्यान देलक जतेक लोक भीतर जा रहल अछि सभक हातमे लाल कार्ड अछि, एहिद्वारे खिड़की एखनधरि नहि खुजल अछि । तऽ ओ बाहर आबिकऽ चबुतरापर बैसि गेल । पूरे शरीर भीतरसँ एकटा अप्रत्याशित झटकासँ काँपि रहल छल । एकटा सुन्दर सपना पूरा होइत–होइत रहि गेल ।
सबानाकेँ नजदिकसँ देखबाक एतेक सुन्दर अवसर हातसँ जा रहल छल । एतेक सुन्दर सपना जे एतेक आसानीसँ पूरा होबएबला छल, से टूटि रहल छल ।
एकक्षणक लेल ओकरा लागल, चलु कोनो बात नहि । एतए तऽ ओहिना बड़का–बड़का कलाकार अबैत रहैत अछि, जाहिमे बलिउडक सेहो । आई नहि तऽ आओरो कोनो दिन सही । मुदा फेर एकटा साधारण महानगरीय कलाप्रेमी एकटा छोटका शहरक असाधारण कला प्रेमीपर हाबी भऽ गेल, जेकरा लेल अपन आदर्श अभिनेत्रीपर साक्षात अभिनय देखब एकटा छोटछिन घटना नहि छल ।
एकटा अन्तिम प्रयास करैत छी, सोचैत आगा बढ़ल । ओ गेटपर ठाढ़ भऽ कऽ प्रवेश करएबला लोकसँ पुछए लागल, ‘हेल्लो सर, अपने लग अतिरितm पास अछि ?’
‘नो साँरी ।’
‘हेल्लो सर, डू यू हएब एनी एक्स्ट्रा पास ?’
‘साँरी यंग मेन ।’
‘सर, अपने लग पास अछि.....?’
‘साँरी ।’
‘सर, आई निड अ.... ।’
‘साँरी ।’
‘सर, इफ यू...... ।’
‘साँरी, आई डन्ट हएब ..... ।’
हरेक उत्तरक सँग ओ आओर निराश होइत चलि गेल । एकटा १८÷१९ बर्षक लड़का ओकर गतिविधिकेँ ध्यानसँ देखि रहल छल । ओ उदास आ निरास टहलैत एकटा समूह लग जा कऽ ठाढ़ भऽ गेल जाहिमे तीनटा सुन्दर लड़की आ दूटा स्र्माट देखएबला आपसमे बात कऽ रहल छल । ओ उदास मोनसँ ठाढ़ भऽ कऽ बोर्डकँे देखि रहल छल, जाहिपर नाटककेँ परिचय लिखल छल । लड़का–लड़की अपना बातमे डूबल छल । ओ ओकरसभक बातकेँ सुनएकेँ प्रयास सेहो कऽ रहल छल, सायद सबानाकेँ आगुकँे कार्यक्रमक विषयमे किछु पत्ता चलए ।
‘ह्वाट दिस प्ले इज अल अबाउट ?’ नम्हर केश आ कानमे बाली पहिरने लड़का बाजल ।
‘आइ डाँट नो एक्जैक्टली, थिंक बेस्ट अन सम स्टोरीज,’ उज्जर कुर्ता बाली लड़की बजलीह ।
‘मुदा रवि, एतेक भीड़ किए अछि आई ?’ लाल टिसर्टबाली लड़की पुछलीह जिनकर टिसर्टक फैलाव हुनक देहक फैलावट आगा कम क्षमताबला साबित भऽ रहल छल ।
‘मित्र, सबाना हएज कम फार दिस शो,’ उज्जर कुर्ताबाली लड़की बजलीह ।
‘हँ सबाना ?’ लड़कीक जिज्ञासा आओर बढ़ल ।
‘सबाना आजमी, द फेमस एक्टर अफ आर्ट सिनेमा एण्ड हिन्दी,’ बाली आ लम्बा केशबला लड़का फटाकसँ सबाना आजमीक उपयुक्त वर्गीकरण कऽ अपन ज्ञान आ प्रजेन्स अफ माइन्डसँ लड़कीकेँ प्रभावित करबाक चेष्टा कएलन्हि ।
‘आइ डाँट लाइक आर्ट सिनेमा एण्ड सबाना आजमी,’ लड़की हुनक चेष्टा पर पानि फेडैÞत अपन दुनू हात उपर कएलन्हि । अँगौठी मोड़ लेलन्हि आ अपन ढोरीकेँ दर्शन उपस्थित लोकक सुलभ कऽ देलन्हि ।
‘देन हु डू यू लाइक,’ लड़का एहि प्रश्नकेँ उपयोग रब्बर जकाँ कऽ लड़कीक जवावकँे सुन्दर बनावएकेँ प्रयास कएलन्हि ।
‘टाँम क्रुज, ’ लड़का स्वयं निरुतर भऽ गेल ।
ओ एहि बातसभकेँ सुनि कऽ आश्चर्यमे डुबल जा रहल छल । बाप रे ! हिनकर विषयमे ओ कि–कि सोचि रहल अछि । ई एतेक कलाप्रेमी अछि, समर्पित अछि आ नहि जानि कि–कि अछि ...। एतए तऽ कि सभ भऽ रहल अछि, इहोधरि पता नहि अछि ।
‘आइ अल्सो डाँट लाइक दिस आर्ट सिनेमा एण्ड दिज बोरिङ्ग हिन्दी प्लीज अल्सो .......,’ ब्लु टपबाली लड़की ओहि लड़कीसँ दू कदम आगा बढि़ कऽ ओकर समर्थन कएलक, जाहिसँ ओ बहुमतमे आबि गेल । एहि खुसीमे ओ दुनू अपन बाँकी मित्रसँ चारि कदम आगा जा कऽ सिगरेट पिबए लागल । लम्बा केसबला लड़का अपन केश आ बालीक कारणसँ लड़कीकेँ समूहमे जा कऽ मिलल आ सिगरेट पिबएकेँ कार्यक्रममे सहयोग करए लागल । बाँकी बचल मित्रसभ अपनामे बात कऽ रहल छल ।
‘यार राम, तो असगरे कोना ? मीरा कहाँ छथि ?’ उज्जर कपड़ामे कनी भलादमी लागएबाली लड़की सभ्य भाषामे पुछलिह ।
‘सी इज अबाउट टू कम,’ जीन्स सर्ट आ जीन्स प्यान्ट लगावएबला लड़का गम्भीरतासँ जवाव देलन्हि ।
‘श्योर ...... ? प्रश्नमे सायद कोनो ब्यङ्ग नुकाएल छल ।
‘श्योर ? आ यदि नहि अएलन्हि तऽ ई दुनू पास फाडि़ देब एण्ड विल नेवर मिट हर,’ लड़का कनीक तामसमे आबि गेल ।
ओ कन्खी आँखिसँ ओहि लड़का दिस देखलक जकरा लेल नाटकसँ आवश्यक एकटा लड़कीकेँ लेल ओतए पहुँचब छल । भगवान ओ लड़की नहि आवए आ ओ ओहि लड़कासँग पास माँगि कऽ ई नाटक देखि सकए ओकरा मोनमे आयल ।
‘आर प्ले नहि देखब ?’ उज्जर कुर्ताबाली लड़की पुछलन्हि ।
‘बुलसीट प्ले ।’
ओ लड़की चुप भऽ गेलीह । कनीक देर चुप रहलाक बाद फेर ओ सम्झावए लागल, ‘यू नो, यू अल गाइज हैभसेम प्रोब्लेम, मीरा हरिकेँ सँग कनीक घुमए चलि गेल, आ अहाँ .......’
ओ आगा नहि सुनलक ओतएसँ हटि गेल प्राङ्गणमे ठाढ़ भऽ कऽ सेहो ई सभ बात सुनि सकैत अछि । ओकरा छोट–छोट समस्याकँे लऽ कऽ एहि नाटककँे महत्व नहि देब बढि़या नहि लागि रहल छल । एकटा ओ जे भोजन जेहन प्रमुख चीजकेँ तिलांजली दऽ कऽ आएल अछि, तैओ ओकरा देखएकँे अनुमती नहि अछि आ एकटा ई अछि, मात्र घुमएकेँ उद्देश्यसँ आएल अछि । ओ एकबेर पूरे भीड़ दिस तकलक । नहि ..... । किओ नहि, किओ नाटक देखए नहि आएल अछि, मात्र टाइम पास करए आएल अछि । ओकरा लागल, जेना ओ सबानाकेँ देखबाक लेल उताहुल भऽ गेल अछि । ओकरा सतांश सेहो किओ नहि अछि । सभ अपन साँझकेँ सुन्दर बनावएकेँ लेल चलि आएल अछि ।
लड़का एखने ओकरा दिस देखि रहल अछि । ओ ओकरा दिस चलए लागल आ लड़का सेहो ओकरा दिस आबए लागल ।
‘कि बात अछि ?’ लड़का नजदिक आबि कऽ धीरेसँ बाजल ।
‘कोनो बात नहि ?’ ओ प्रश्न बुझि नहि सकल ।
‘पास नहि अछि कि ?’
‘नहि...... ।’
‘चाही की ?’
ओकर कान ठाढ़ भऽ गेल । लड़का ओकरा लेल देवदुत नजरि आबए लागल । लोक भीतर घुसब शुरु कऽ देने छल । नाटक शुरु होवएमे एखनो १५÷२० मिनेट बाँकी छल, ओ बहुत उताहुल भऽ गेल छल ।
‘हँ ....... चाही । प्लीज अहाँ दिआ सकैत छी ?’
‘हँ, हम दिआ सकब, ’ लड़का ओकर हात पकडि़ कऽ सड़ककेँ एक दिस लऽ जा कऽ सावधानीसँ इम्हर ओम्हर देखैत बाजल ।
‘डेढ़ सय रुपैया लागत ।’
‘डेढ़ सय.....? मुदा हमरा लग.....,’ ओ फेरसँ निराश होबए लागल ।
‘कतेक अछि......कतेक ?’ लड़का जल्दिमे लागि रहल छल ।
‘एक सय रुपैया, ’ ओकरा मुँहसँ निकलि गेल ।
‘जल्दि दिअ ।’
ओ कनि हिचकिचाइत एक सय रुपैयाक नोट निकालनहे छल, लड़का फटाकसँ नोट छिन कऽ जेबमे राखि लेलक, फेर ओहि गतिमे पास ओकरा हाथमे दऽ आगा बढि़ गेल ।
आब ओहो ओहि भीड़क एकटा हिस्सा भऽ गेल छल, जेकरा भीतर पैसबाक लेल पास छल । पास भेटबाक उत्साह आ प्रशन्नता ओकर मुँहपर देखा रहल छल ।
कखनो ओ पास जेबमे रखैत छल तऽ कखनो हाथमे ।
ओ लड़काक लेल सायद सय टका बड़का चीज छल मुदा ओकरा पत्ता नहि छल, जेबमे पैसा नहि भेलाकबादो ओकरा लेल एहि पासकेँ आगा कोनो मोल नहि छल । मुदा मोनमे एकटा दुःख अवश्य छल, चारि÷पाँच दिन कोना बितत ।
यदि एकबेर जोड़Þ दैत तऽ ओ लड़का २० रुपैया आओर कममे मानि जाइत आ एक–आधबेरक चाहक जोगार भऽ जाइत ।
ई कि सोँचि रहल अछि, एतए ठाढ़ भऽ कऽ, ओहो पासकेँ सँग, इहो सभ सोचबाक चाही ? पास भेटि गेल, ई कि कम अछि ?
एहुँमे कोनो भगवानेकँे चमत्कार अछि । ओ भोजन आ भूखकेँ दिससँ ध्यान हटाबएकेँ प्रयास करए लागल मुदा दिमाग छल जे बेर–बेर ओहि समस्याकेँ दिस जाए लागल छल ।
दिनमे एकबेर भोजनक क्रम टूटि जाइत सायद..........फेर ओ जीबैत कोना रहत ?
नाटक देखब बहुत आवश्यक अछि । ओकरे लेल तऽ एतए आएल अछि । मुदा भोजन तऽ सेहो ..... ।
ओ भीतरसँ कनिक बेचयन होबए लागल छल ।
‘यार, दिस इवनिङ्ग इज सो रोमान्टिक,’ ओकर बगलमे ठाढ़ समूहमेसँ एकगोटे भद्रसन देखएबला लोक अपन मित्रकेँ कहलक ।
‘देन ह्वाई आर यू वेस्टिङ्ग योर व्यूटिफुल इवनिङ्ग हियर विदाउट बोतल ?’ सिगरेटक छाउर झारैत ओ पुछलक ।
‘नथिङ्ग, माइ बाँस इज कमिङ्ग हियर टूडे । इटस अ ग्रेट चान्स टू इम्प्रेस हिम, ’ आ ओ हँसए लागल ।
ओ ओतहुँसँ हटि गेल । एतेक भीड़मे अछि जे किओ नाटको देखए आएल अछि आ ई नाटककेँ नहि देखलाकबादो कोनो फरक पड़एबला अछि वा मात्र ओहेँ.......।
ओ कनिक आओर आगा बढि़ कऽ गेट लग ठाढ़ भऽ गेल आ ओकरा स्मरण आएल, ओ साबुन किनएकेँ विषयमे सोचने छल मुदा ओकरा लग पैसा नहि छल । बितल दश दिनसँ बीना साबुनकेँ काज चला रहल अछि । शरीरसँ गन्ध तऽ नहि आबि रहल अछि ? ओ स्थिरेसँ गर्दन घूमाकऽ कन्हाक निचा सुघंएकँे प्रयास कएलक मुदा लग पाससँ सुगन्ध एतेक आबिरहल छल, ओकरो किछु बुझएमे नहि आएल, ओकर शरीरसँ ओहने सुगन्ध आबएकेँ अनुभव भेल ।
आगाकँे दोकानपर किछु व्यक्ति मःम आ चाउमीन खा रहल छल । आई भुख लगलाक कारण भोजन भोरेमे कऽ लेने छल । एहिद्वारे भुख लागि गेल छल । कि करए, किछु खाईए लेल जाए । ओ कनि अस्कताति दोकानदिस बढि़ गेल ।
‘चाउमीन कसरी प्लेट छ, दाई ? (चाउमीन कोना प्लेट अछि, भाईजी ?)’
‘पच्चीस रुपैयेँ.... ’ ओकर मोन उदास भऽ गेल ।
‘आ मःम ?’
‘बीस रुपैयेँ ।’
ओ खुदरा निकाललक । बसकँे किरायाकँे बाद मात्र १० रुपैयाँ बाचल छल । गरम–गरम चाउमीन ओकर पेटक आगिमे घी दऽ रहल छल । कखनो ओकर मोनमे सबाना आजमीक उतार–चढ़ावयुक्त सम्बाद शैली गुञ्जए लगैत छल तऽ कखनो चाउमीन आ मःम केँ स्वाद मुँहपर अबैत–अबैत रहि जाईत छल । ओ बेचयन भऽ ईम्हर उम्हर टहलए लागल ।
एहिबीच एकगोटे मोटरसाईकिल रोकि कऽ अपन मित्रसँग जल्दिसँ भीड़मे ठाढ़ भऽ किछु पुछए लागल । सभदिस पुछि लेलाकबाद ओ दूनु ओकरोदिस बढ़ल ।
‘हेल्लो बाँस, एक्सट्रा पास अछि कि ?’
‘नहि, मात्र एकहिटा अछि, ’ ओ जबाब देलक ।
‘अहाँ असगरे छी ने ? मित्र हमरा दऽ दिए पास । हमरा लग पास नहि अछि, ’ ओ बिहुँसैत मजाकमे प्रस्ताव रखलक आ ई सोँचि कऽ जे ई मानि जाएत, कनिक आगा निकलि गेल । ओकर मित्र सेहो घूमि कऽ मजाकमे बाजल, ‘दऽ दिऔ ने, डेढ़–दू सय लऽ लिए । हिनका असगरे जाए पड़त ।
ओ ओहिना ठाढ़ छल । एकटा कठिन निर्णय शीघ्र लेबाक छल । दूनु गेटक भीतर गेल । दोकानमे एखने चाउमीन बनल छल । लोक अपन–अपन प्लेटमे चाउमीन राखि कऽ खा रहल छल । चाउमीनसँ सुगन्धक भाफ उठि रहल छल । ओ किछु सोचि रहल छल, ओकरा भीतरसँ एकटा तेज आवाज आएल, ‘हेल्लो सर,दू सय रुपैया ।’
दूनु किछु आगा निकलि गेल छल । आवाज सुनि कऽ घुमल आ ओकरादिस आबए लागल, ओहिमेसँ एकगोटे पर्स निकाललक । ओ आश्चर्यचकित छल, ओ तऽ बजबे नहि कएल, फेर ओकर मोनक बात कोना ओसभ बुझि गेल मुदा ओ पास ओकरा नहि देत । आखिर सबाना आजमीक नाटक अछि ने ? पत्ता नहि फेर कहिआ हएत ? नहि ओ स्वयं नाटक देखत । कोनो मूल्यपर पास ओकरा नहि देत । पैसा कि एहि सभ चीजकेँ मूल्य चुका सकत ?
एकटा मित्र एक÷एक सयकेँ दूटा नोट निकालि लेने छल । ओ एक हाथसँ रुपैँया पकरलक आ दोसर हाथसँ पास ओकरा दऽ देलक । दूनु गेटक भीतर चलि गेल छल ।
ओ ओतहि ठाढ़ छल । ओकरा ब्रह्मा भाईकँे बात स्मरण आएल । पूरे संसार एकटा रंगमञ्च अछि आ हमसभ ओकर ‘कठपुतली’ । जबरदस्ती बिहुँसल । हाथमे सय÷सयकँे दू टा नोट पकराएल छल । किछु देरधरि ओ ठाढ़ भऽ पोष्टरदिस देखैत रहल । एकसयकेँ नोट जेबमे राखि लेलक, दोसर दिन होबएबला नाटककेँ टाईमिङकँे मोनमे दोहरबैत एक सयकेँ नोट हाथमे लऽ कऽ दोकानदिस बढि़ गेल । चाउमीन आ मःम केँ प्लेटसँ भाफ उठि रहल छल ।
लेखकः ✍सुजीत कुमार झा
जनकपुर ,नेपाल
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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कठपुतली
✍सुजीत कुमार झा
पाँचे बजे ओ नाटक घर पहुँच गेल छल । ओना शो ७ बजेसँ छल, मुदा ओकरा चयन कहाँ छलैक ? आजुक दिनकेँ ओ बहुत व्यग्रतासँ बितल एक हप्तासँ प्रतीक्षा कऽ रहल छल । कोना ओ ई एक सय टका बचौने छल, ओ ओहे जनैत अछि । पाँच बाजि गेल छल, जँ यदि भीड़ बेसीओ हएत तऽ टिकट आरामसँ भेटि सकैत अछि ।
ब्रह्मा भाइकेँ ओ कहि देने छल, आई नाटक देखए जएबाक अछि, जल्दि जा रहल छी । ओतए पहुँच कऽ बिल्कुल एना लगैत अछि, जेना सपनाक संसारमे आबि गेल होइक । चारुदिस नाटककेँ पोष्टर आ सभ्रान्त व्यक्तिसभक भीड़ । काठमाण्डूक अन्य नाटक घर चलि जाउ वा इम्हर नाच घरमे जाउ । चारुदिस ओहेसभ देखाइ दैत छथि, जेकरासँ ओकरा प्रेरणा भेटैत हुए । प्रत्येक क्षण नाटकमे डुबल, रंगमंचक बात करैत लोक । एहने वातावरण, ओ चाहैत छल । अपन शहरमे ओकरा ई सभ नहि भेटि पाबि रहल छल । इहए माहोल जेकरा लेल, अपन घरसँ एतेक दूर एतेक पैघ शहरमे आएल छल ।
हँ, ओतउ कहिओ–कहिओ नाटक होइत छल । कोनो संस्थाक वार्षिक उत्सव वा कोनो मेला भेल जेना दुर्गा पूजा, छठि, होरी, गणेश पूजा सभमे नाटक मंचित होइत छल । ओहिमे टिकट नहि लगैत छल । ओ हरेकराति अबेरधरि बैसि कऽ पूरे मंचन देखैत रहैत छल । ओतए एहन रंगशाला नहि छल । खाली स्थानपर मंच बना कऽ नाटक होइत छल । रातिमे जखन घरमे भोजन बनावएकेँ समय होइत छल तऽ नाटक स्थलपर लोकक भीड़ बढि़ जाइत छल, जाहिमे बच्चा बेसी होइत छल । कारण ओकरा इहे बुझएमे अबैत छल, भोजन बनावएमे जखन बच्चा माँकेँ परेशान करैत हएत तऽ माँ कहैत हएत, ‘जो बेटा मुन्ना, जनक चौकपर नाटक देखि कऽ आ, तखनधरि हम भोजन बना लैत छी । एतए रहबे तऽ मुन्नीसँ झगड़ा होइत रहतउ ।’
महिलासभ अपन पतिसँ कहैत हएत, ‘अहाँ हमरा आरामसँ भोजन बनावए दिअ ताबैतधरि मिश्रा जीकेँ लऽ कऽ नाटक देखि आउ । भोजन बनलाक बाद टिंकुकँे पठा कऽ बजा लेब ।’
ओहिठाम हल नहि भेलाक कारण जखन मोन होइत छल, लोक अबैत छल आ जखन मोन होइत छल चलि जाइत छल । मंचक आगामे बच्चासभ रहैत छल आ पाछु बड़कासभ । किओ लगातार पाँच मिनेट मुँह बन्द कऽ कऽ नहि बैसैत छल । बीच–बीचमे लोक सीटी सेहो बजवैत रहैत छल । खास कऽ कऽ मंचपर कोनो सुन्दर लड़की अबैत छल आ ताली नहि बजएबला स्थानपर सेहो अपना शहरक प्रसिद्ध मस्तीकँे उदाहरण दैत एतेक एकतासँ एतेककाल ताली बजबैत रहैत छल, एक दू लाइन संवाद सुनाइ देब आसान नहि होइत छल ।
दर्शकमे किशोर लड़कीकँे होवएकेँ सम्भावना सेहो होइत छल । एहि सम्भावनाकँे नजरअन्दाज नहि करैत किछु स्थानीय स्कुलक किशोरसभ सम्भावनाकँे खोजीमे ओहिठाम चलि अबैत छल, नवका सुन्दर सर्ट आ टमाटर कट जेहन क्रिज लागल पेन्ट लोककेँ आकर्षित करैत छल ।
किछु गिन्तीकेँ दर्शक होइत छल, नाटककेँ नाटक जकाँ देखैत छल । बाँकी मात्र टाइम पास करबाक लेल अबैत छल । ओकरा कहिओकाल कऽ बहुत तामस होइत छल, ई नाटक संस्था जे एतेक दूरसँ अबैत अछि कि सोचत हमरा शहरक विषयमे ? कि ओ इहे शहर अछि, देशकेँ बड़का–बड़का नाटककार रमेश रञ्जन, अवधेश पोखरेल जेहनकँे जन्म देने अछि । मैथिलीक शेक्सपीयर महेन्द्र मलंगियाक कर्मभूमि रहल अछि । जिनकर लिखल नाटकक मंचन आइयो देशक विभिन्न स्थानपर होइत अछि ।
किछुदेरमे लोकक भीड़ जम्मा होबए लागल छल । हरेकदिस पढ़ल लिखल आ सम्भ्रान्त लोकक झुण्ड देखाइ दऽ रहल छल । सुन्दर–सुन्दर कार वा अन्य गाड़ीमे बैसि कऽ महिला पुरुष आ स्मार्ट युवा जिनका आगा सम्भावना बहुत सागर लहरा रहल छल, मात्र नाटक देखबाक लेल अपन समय निकालि कऽ आएल छल । सभकेँ दिस देखि कऽ लगैत छल, सभ मात्र नाटक आ सबाना आजमीक विषयमे बात कऽ रहल अछि ।
एकटा सपनाकेँ सत्य होएबाक जेहन सभ किछु, ओकरा लेल रंगमंचक बहुत बड़का कलाकार, ओकर प्रिय अभिनेत्री आई आँखिक सोझा अभिनय करतीह । एतए सहीमे सम्मान होइत अछि, नाटक आ अभिनेताकेँ । ओतए शहरमे मित्रसभ मात्र एहिबातपर ओकर मजाक उड़ौने छल, ओ आन्हर लड़काद्वारा प्रस्तुत नाटक देखए चलि गेल छल ।
‘तऽ कि तोसभ मात्र लड़कीएकेँ देखए जाइत छिही ? नाटक बढि़या हुए वा खराब, अभिनय कोन स्तरक अछि, प्रकाश, मंच, संगीत केहन अछि, एहिमे तोरासभकँे कोनो फरक नहि पड़ैत छौक ?’ पूरा बहसकेँ बाद सहीमे चौकएबला बात ओकरा पत्ता चलल छल ।
उत्तरमे सभ एकहिसँग हँसि देने छल । ओकरा अपना संगतिपर दया आएल । स्नातकक परीक्षा समाप्त होइते ओ काठमाण्डू चलि आएल । ओतए ओहँुना ओकरा लेल किछु नहि बचल छल । बाबूजीसँ ओकर अल्पसंवाद, जे प्रारम्भेसँ औपचारिक रहल, आब नाटकप्रति बढ़ल सखक कारण समाप्त जकाँ भऽ गेल छल । माँ बड़का भाईजीक तलब, हुनक विवाह जेहन समस्यामे फसल छलीह ।
एतए आकांक्षाक जहाजपर बैसि कऽ आएल ओ ओहि समय पूरापूर निराश भऽ गेल, जखन ओ छोटका–बड़का, धनी–गरीबसभकेँ भागैत देखलक । एहि अन्हरदौड़Þमे, जतए ओकरा स्वयं नहि पत्ता छल कोन मूल्यपर कि पाबएकेँ लेल दौड़ रहल छी ? ओ एकटा गोल परिधिमे भगैत लोककेँ देखलक, जे भागि कऽ हरेक साँझ ओहि बिन्दुपर आबि जाइत अछि, जतएसँ भोरमे भागब शुरु कएने छल । जीवनक एकदिन निकलि जएबाक अनुभवो नहि होइत छल आ दोसर दिन भागब शुरु कऽ दैत छल । ओ बुझि गेल, एतए स्थान बनाएब ओतेक आसान नहि अछि, जतेक ओ बुझैत छल ।
नाटककँे आनन्द उठावएकेँ लेल जीबित रहब आवश्यक अछि, जीबित रहबाक लेल किछु खाएब, किछु खएबाक लेल कमाएब सेहो । ओ एकटा कुरीयर कम्पनीमे काज करब शुरु कऽ देलक । ओना बीना मोटरसाइकिलकेँ काज भेटएमे बहुत दिक्कत भेल आ करएमे सेहो बहुत दिक्कत । मुदा भीतरक एकटा अभिलाषा ओकरा हरेक समय सक्रिय रखैत छल ।
चाहैत तऽ काठमाण्डूक कोनो करकुटुम्ब वा मित्रसँ उधार वा किछु मद्दत लऽ सकैत छल मुदा अपना भीतरक आगि आ स्वाभिमान ओकरा असगरे सपनाक देबालपर अपन पसीनाक प्लाष्टर करएमे लगौने छल ।
किछु समयक बाद ओ एकटा नाट्य संस्था ज्वाइन कऽ लेलक, जतए साँझ कऽ दू तीन घण्टा रिहर्सलमे समय देवए पडैÞत छल । निर्देशक जे ओहि नाट्य संस्थाक मालिक रहथि, ओकरासँ एक हजार टाका फि सेहो लैत छल जे बादमे ओकरा व्यर्थ लागए लागल छल । तीनटा नाटकक अनुभव बतौलाक बादो निर्देशक ओकरा मंच सज्जाक काजमे लगौने छल आ एतेक दिन बितलाक बादो एखनधरि ओ वएह कऽ रहल छल । मुदा पात्रकेँ संवाद बजबाक ढंङ्गसँ ओहि संस्थाकेँ पूरा स्तर बुझएमे चलि अबैत छल । सदस्यसभ कतेको क्षेत्रकँे छल ओकर संवाद बजबाक कलासँ आँखि बन्द कऽ कऽ सेहो पत्ता लागि जाति छल, कोन मातृभाषा बाजएबला लोक अछि । धीरे–धीरे ओ ओतए जाएब छोडि़ देलक आ कोनो योग्य निर्देशक आ नाट्य संस्थाकँे खोजी करए लागल ।
आब दिनभरि ओ अपन काज करैत छल आ साँझमे अफिसमे जानकारी करा काठमाण्डूक नाट्य संस्थामे साटल निर्देशकक फोन नम्बर नोट करए लगैत छल । फेर प्लान करए, काजक बोझ कम आ पैसाक आम्दानी बढ़लाक बाद कोनो बढि़या नाट्य संस्थामे जुडि़ कऽ अभिनय करब । तखनधरि नाटकसँ जुड़ल रहबाक तरिका ओकरा नाटक देखए आ ओहिसँ जुड़ल साहित्य पढ़एकेँ लेल बाध्य कएने छल ।
धीर–धीरे बहुत लोक जम्मा भऽ चुकल छल । ओसभ अपन मित्रक सँग छोट–छोट समूह बना कऽ बातचित कऽ रहल छल । ओकरा अनुभव भेल, कतेक मोनसँ ओ नाटककेँ पोष्टर देखि रहल अछि आ कतेक भक्तिभावसँ नाटकक विषयमे बात कऽ रहल अछि । मुदा ओतए बाबूजी ई कहैत छलथि, ‘झूठफूसकेँ कलाकारसभ इम्हर ओम्हर नचैत रहैत अछि । कोनो नीक घरक लोक थोरहे रहैत अछि ..... ।’
ओना ओकर कम तलबमे हरेक नाटक देखि पाबि सम्भव नहि छल, मुदा ओ नाटक अवश्य देखैत छल, जकर टिकटक मोल कम रहैत छल । २५÷३० सँ बेसीकँे नहि टिकट होइत छल तऽ पैसाक कमीक कारणसँ ओकरा कतेको पसीनक निर्देशककेँ नाटक छोडि़ देबए पडैÞत छल, जकर पूर्ति ओ ओकर समीक्षा पढि़ कऽ करैत छल ।
जीवन एखन बहुत कठिनसँ चलि रहल छल । ई एक सय रुपैया जुटावएकेँ लेल बितल एक हप्तासँ एकहुँ कप चाह नहि पिलक अछि । मुड फ्रेस करबाक लेल चाह बहुत आवश्यक अछि । जतेक जल्दि एकर आदत छुटि जाइ ओतेक बढि़या हएत । ओना चाह, कनी मनी भुख सेहो मारैत अछि । ओना कनी मनी भुख ओकरा लागि रहल छल, एतेक बढि़या माहोलमे एतेक बड़का अभिनेत्रीक नाटक देखबाक उत्साह ओहि भुखपर हाबी भऽ गेल छल ।
ओ प्रसन्न छल आ पहिलबेर एक सय टकाक टिकट किनएकेँ लऽ कऽ एकदम गम्भीर सेहो । जेबमे किछु खुद्रा पैसा सेहो छल, बसक टिकटमे काज आवएबला छल । टिकट यदि पचासकेँ भेल तऽ आओर मजा आएत । नाटको देखि लेब आ भरि पेट मःमः सेहो खा लेब । पचास रुपैया तऽ चारि पाँचदिन चलिए जाएत, एकरबाद तलब सेहो भेटत । ई तऽ सोचने छल, जे ई नाटक देखि लेब यदि पैसा बचल तऽ रातिमे खाएब । ब्रह्मा भाईकँे कहि देने छल, ‘एहिबेर तलब समयपर चाही ।’
ब्रह्मा भाई ओहि कुरीयर कम्पनीक मालिक रहथि, जाहिमे ओ काज करैत छल । ओ देखएमे लगैत छला जे ओ, कुरीयर कम्पनी चलावएकँे लेल एहि पृथ्वी पर जन्म लेने छथि । छोट कद, दूरधरि निकलल पेट, बड़काटाकेँ माथ जाहिपर बचल केशकेँ रंगएकेँ चक्करमे अपन चानि रंगि लैत रहथि । ढिलढालबला कपड़ामे ओ एकटा इन्ट्रेस्टेड पार्सल लगैत रहथि । मुदा ओ हृदयक बहुत बढि़या लोक रहथि आ ओकर नाटक प्रेमक कारण अफिससँ कनिक जल्दि निकलि जएबाक आदेश दऽ दैत रहथि । ओ बिजनेसमैन भेलाक बादो एकटा कलाप्रेमी रहथि । अपन क्याम्पसक समयमे नाटकमे हिरो बनैत छला । ओ ब्रह्मा भाईसँ एक–दूबेर मजाकेमे सही, नाटक देखए चलबाक लेल आग्रह कएने छल । मुदा हुनक कहब रहन्हि, ‘पूरे संसारे एकटा रंगमंच अछि आ हमसभ कठपुतली छी ।’
ओ एहि संसारक नाटककेँ बहुत नजदिकसँ देखने रहथि एहिद्वारे एहि नाटकमे हुनक मोन नहि लगैत छल । ओकरा नाटकक विषयमे बात कएला पर ब्रह्मा भाई ई बात बराबर दोहरबैत छलथि आ बादमे इहो अवश्य जोडि़ दैत छलथि, युवा अवस्थामे ओ बहुत रसीक आ कलाप्रेमी रहथि ।
आई ओकराद्वारा सबाना आजमीक चर्चा करिते, ओकरा तुरुन्त छुट्टी दऽ देने रहथि । एहि रहस्यकेँ खुलासो कएलन्हि, ‘युवा अवस्थामे ओ सबाना आजमीकँे बहुत बड़का फ्यान छलथि ।’
ओ टिकट खिड़कीकेँ खुलबाक प्रतीक्षा कऽ रहल छल । एखनधरि तऽ खुलि जएबाक चाही छल । प्रायः ७ बजेक शो केँ लेल ६ बजे खिड़की खुलि जएबाक चाही । मुदा ६ सँ उपर भेलाक बादो खिड़की नहि खुजल छल । बन्द खिड़कीक भीतर एक गोटेकेँ किछु कागजपत्र सम्हारिकऽ लऽ जाइत, ओ देखलक ।
‘सुन्नुस दाई (सुनू भाईजी)...... ।’
‘भन भाई (हँ कहुँ) ।’
‘यो टिकट खिड़की अहिलेसम्म बन्द किन रहेको छ ? टिकट कुन बेला देखि काटिन्छ ? (ई टिकट खिड़की कखनधरि बन्द रहत ? टिकट कखनसँ कटत ?’
‘टिकट....? कुन टिकट ? (टिकट ....?कोन टिकट ? )’
‘यो नाटकको टिकट.....(ई नाटककेँ टिकट )’
‘टिकट छैन ?(टिकट नहि अछि ?) पासबाट एन्ट्री रहेको छ । (पाससँ एन्ट्री रहल अछि ।)’
‘पाससँ....? कसरी भेटाउँछ (पाससँ....? कोना भेटत ।)’ ओ आश्र्चयमे छल, ओकरा पत्ते नहि चलल छल ।
‘अब भेटाउँदैन जसलाई भेटनु थियो, त्यसलाई भेटाइहाल्यो । (आब नहि भेटत । जकरा भेटबाक छल, ओकरा भेटि गेल अछि ।)’ ओ तमसाइत बाजल ।
‘इम्हर तऽ कतहुँ नहि लिखल अछि, टिकट पाससँ देल जाए ।’ कहैत ओ आगा बढि़ गेल ।
एहि विषयमे सोचबे नहि कएने छल । ओ ध्यान देलक जतेक लोक भीतर जा रहल अछि सभक हातमे लाल कार्ड अछि, एहिद्वारे खिड़की एखनधरि नहि खुजल अछि । तऽ ओ बाहर आबिकऽ चबुतरापर बैसि गेल । पूरे शरीर भीतरसँ एकटा अप्रत्याशित झटकासँ काँपि रहल छल । एकटा सुन्दर सपना पूरा होइत–होइत रहि गेल ।
सबानाकेँ नजदिकसँ देखबाक एतेक सुन्दर अवसर हातसँ जा रहल छल । एतेक सुन्दर सपना जे एतेक आसानीसँ पूरा होबएबला छल, से टूटि रहल छल ।
एकक्षणक लेल ओकरा लागल, चलु कोनो बात नहि । एतए तऽ ओहिना बड़का–बड़का कलाकार अबैत रहैत अछि, जाहिमे बलिउडक सेहो । आई नहि तऽ आओरो कोनो दिन सही । मुदा फेर एकटा साधारण महानगरीय कलाप्रेमी एकटा छोटका शहरक असाधारण कला प्रेमीपर हाबी भऽ गेल, जेकरा लेल अपन आदर्श अभिनेत्रीपर साक्षात अभिनय देखब एकटा छोटछिन घटना नहि छल ।
एकटा अन्तिम प्रयास करैत छी, सोचैत आगा बढ़ल । ओ गेटपर ठाढ़ भऽ कऽ प्रवेश करएबला लोकसँ पुछए लागल, ‘हेल्लो सर, अपने लग अतिरितm पास अछि ?’
‘नो साँरी ।’
‘हेल्लो सर, डू यू हएब एनी एक्स्ट्रा पास ?’
‘साँरी यंग मेन ।’
‘सर, अपने लग पास अछि.....?’
‘साँरी ।’
‘सर, आई निड अ.... ।’
‘साँरी ।’
‘सर, इफ यू...... ।’
‘साँरी, आई डन्ट हएब ..... ।’
हरेक उत्तरक सँग ओ आओर निराश होइत चलि गेल । एकटा १८÷१९ बर्षक लड़का ओकर गतिविधिकेँ ध्यानसँ देखि रहल छल । ओ उदास आ निरास टहलैत एकटा समूह लग जा कऽ ठाढ़ भऽ गेल जाहिमे तीनटा सुन्दर लड़की आ दूटा स्र्माट देखएबला आपसमे बात कऽ रहल छल । ओ उदास मोनसँ ठाढ़ भऽ कऽ बोर्डकँे देखि रहल छल, जाहिपर नाटककेँ परिचय लिखल छल । लड़का–लड़की अपना बातमे डूबल छल । ओ ओकरसभक बातकेँ सुनएकेँ प्रयास सेहो कऽ रहल छल, सायद सबानाकेँ आगुकँे कार्यक्रमक विषयमे किछु पत्ता चलए ।
‘ह्वाट दिस प्ले इज अल अबाउट ?’ नम्हर केश आ कानमे बाली पहिरने लड़का बाजल ।
‘आइ डाँट नो एक्जैक्टली, थिंक बेस्ट अन सम स्टोरीज,’ उज्जर कुर्ता बाली लड़की बजलीह ।
‘मुदा रवि, एतेक भीड़ किए अछि आई ?’ लाल टिसर्टबाली लड़की पुछलीह जिनकर टिसर्टक फैलाव हुनक देहक फैलावट आगा कम क्षमताबला साबित भऽ रहल छल ।
‘मित्र, सबाना हएज कम फार दिस शो,’ उज्जर कुर्ताबाली लड़की बजलीह ।
‘हँ सबाना ?’ लड़कीक जिज्ञासा आओर बढ़ल ।
‘सबाना आजमी, द फेमस एक्टर अफ आर्ट सिनेमा एण्ड हिन्दी,’ बाली आ लम्बा केशबला लड़का फटाकसँ सबाना आजमीक उपयुक्त वर्गीकरण कऽ अपन ज्ञान आ प्रजेन्स अफ माइन्डसँ लड़कीकेँ प्रभावित करबाक चेष्टा कएलन्हि ।
‘आइ डाँट लाइक आर्ट सिनेमा एण्ड सबाना आजमी,’ लड़की हुनक चेष्टा पर पानि फेडैÞत अपन दुनू हात उपर कएलन्हि । अँगौठी मोड़ लेलन्हि आ अपन ढोरीकेँ दर्शन उपस्थित लोकक सुलभ कऽ देलन्हि ।
‘देन हु डू यू लाइक,’ लड़का एहि प्रश्नकेँ उपयोग रब्बर जकाँ कऽ लड़कीक जवावकँे सुन्दर बनावएकेँ प्रयास कएलन्हि ।
‘टाँम क्रुज, ’ लड़का स्वयं निरुतर भऽ गेल ।
ओ एहि बातसभकेँ सुनि कऽ आश्चर्यमे डुबल जा रहल छल । बाप रे ! हिनकर विषयमे ओ कि–कि सोचि रहल अछि । ई एतेक कलाप्रेमी अछि, समर्पित अछि आ नहि जानि कि–कि अछि ...। एतए तऽ कि सभ भऽ रहल अछि, इहोधरि पता नहि अछि ।
‘आइ अल्सो डाँट लाइक दिस आर्ट सिनेमा एण्ड दिज बोरिङ्ग हिन्दी प्लीज अल्सो .......,’ ब्लु टपबाली लड़की ओहि लड़कीसँ दू कदम आगा बढि़ कऽ ओकर समर्थन कएलक, जाहिसँ ओ बहुमतमे आबि गेल । एहि खुसीमे ओ दुनू अपन बाँकी मित्रसँ चारि कदम आगा जा कऽ सिगरेट पिबए लागल । लम्बा केसबला लड़का अपन केश आ बालीक कारणसँ लड़कीकेँ समूहमे जा कऽ मिलल आ सिगरेट पिबएकेँ कार्यक्रममे सहयोग करए लागल । बाँकी बचल मित्रसभ अपनामे बात कऽ रहल छल ।
‘यार राम, तो असगरे कोना ? मीरा कहाँ छथि ?’ उज्जर कपड़ामे कनी भलादमी लागएबाली लड़की सभ्य भाषामे पुछलिह ।
‘सी इज अबाउट टू कम,’ जीन्स सर्ट आ जीन्स प्यान्ट लगावएबला लड़का गम्भीरतासँ जवाव देलन्हि ।
‘श्योर ...... ? प्रश्नमे सायद कोनो ब्यङ्ग नुकाएल छल ।
‘श्योर ? आ यदि नहि अएलन्हि तऽ ई दुनू पास फाडि़ देब एण्ड विल नेवर मिट हर,’ लड़का कनीक तामसमे आबि गेल ।
ओ कन्खी आँखिसँ ओहि लड़का दिस देखलक जकरा लेल नाटकसँ आवश्यक एकटा लड़कीकेँ लेल ओतए पहुँचब छल । भगवान ओ लड़की नहि आवए आ ओ ओहि लड़कासँग पास माँगि कऽ ई नाटक देखि सकए ओकरा मोनमे आयल ।
‘आर प्ले नहि देखब ?’ उज्जर कुर्ताबाली लड़की पुछलन्हि ।
‘बुलसीट प्ले ।’
ओ लड़की चुप भऽ गेलीह । कनीक देर चुप रहलाक बाद फेर ओ सम्झावए लागल, ‘यू नो, यू अल गाइज हैभसेम प्रोब्लेम, मीरा हरिकेँ सँग कनीक घुमए चलि गेल, आ अहाँ .......’
ओ आगा नहि सुनलक ओतएसँ हटि गेल प्राङ्गणमे ठाढ़ भऽ कऽ सेहो ई सभ बात सुनि सकैत अछि । ओकरा छोट–छोट समस्याकँे लऽ कऽ एहि नाटककँे महत्व नहि देब बढि़या नहि लागि रहल छल । एकटा ओ जे भोजन जेहन प्रमुख चीजकेँ तिलांजली दऽ कऽ आएल अछि, तैओ ओकरा देखएकँे अनुमती नहि अछि आ एकटा ई अछि, मात्र घुमएकेँ उद्देश्यसँ आएल अछि । ओ एकबेर पूरे भीड़ दिस तकलक । नहि ..... । किओ नहि, किओ नाटक देखए नहि आएल अछि, मात्र टाइम पास करए आएल अछि । ओकरा लागल, जेना ओ सबानाकेँ देखबाक लेल उताहुल भऽ गेल अछि । ओकरा सतांश सेहो किओ नहि अछि । सभ अपन साँझकेँ सुन्दर बनावएकेँ लेल चलि आएल अछि ।
लड़का एखने ओकरा दिस देखि रहल अछि । ओ ओकरा दिस चलए लागल आ लड़का सेहो ओकरा दिस आबए लागल ।
‘कि बात अछि ?’ लड़का नजदिक आबि कऽ धीरेसँ बाजल ।
‘कोनो बात नहि ?’ ओ प्रश्न बुझि नहि सकल ।
‘पास नहि अछि कि ?’
‘नहि...... ।’
‘चाही की ?’
ओकर कान ठाढ़ भऽ गेल । लड़का ओकरा लेल देवदुत नजरि आबए लागल । लोक भीतर घुसब शुरु कऽ देने छल । नाटक शुरु होवएमे एखनो १५÷२० मिनेट बाँकी छल, ओ बहुत उताहुल भऽ गेल छल ।
‘हँ ....... चाही । प्लीज अहाँ दिआ सकैत छी ?’
‘हँ, हम दिआ सकब, ’ लड़का ओकर हात पकडि़ कऽ सड़ककेँ एक दिस लऽ जा कऽ सावधानीसँ इम्हर ओम्हर देखैत बाजल ।
‘डेढ़ सय रुपैया लागत ।’
‘डेढ़ सय.....? मुदा हमरा लग.....,’ ओ फेरसँ निराश होबए लागल ।
‘कतेक अछि......कतेक ?’ लड़का जल्दिमे लागि रहल छल ।
‘एक सय रुपैया, ’ ओकरा मुँहसँ निकलि गेल ।
‘जल्दि दिअ ।’
ओ कनि हिचकिचाइत एक सय रुपैयाक नोट निकालनहे छल, लड़का फटाकसँ नोट छिन कऽ जेबमे राखि लेलक, फेर ओहि गतिमे पास ओकरा हाथमे दऽ आगा बढि़ गेल ।
आब ओहो ओहि भीड़क एकटा हिस्सा भऽ गेल छल, जेकरा भीतर पैसबाक लेल पास छल । पास भेटबाक उत्साह आ प्रशन्नता ओकर मुँहपर देखा रहल छल ।
कखनो ओ पास जेबमे रखैत छल तऽ कखनो हाथमे ।
ओ लड़काक लेल सायद सय टका बड़का चीज छल मुदा ओकरा पत्ता नहि छल, जेबमे पैसा नहि भेलाकबादो ओकरा लेल एहि पासकेँ आगा कोनो मोल नहि छल । मुदा मोनमे एकटा दुःख अवश्य छल, चारि÷पाँच दिन कोना बितत ।
यदि एकबेर जोड़Þ दैत तऽ ओ लड़का २० रुपैया आओर कममे मानि जाइत आ एक–आधबेरक चाहक जोगार भऽ जाइत ।
ई कि सोँचि रहल अछि, एतए ठाढ़ भऽ कऽ, ओहो पासकेँ सँग, इहो सभ सोचबाक चाही ? पास भेटि गेल, ई कि कम अछि ?
एहुँमे कोनो भगवानेकँे चमत्कार अछि । ओ भोजन आ भूखकेँ दिससँ ध्यान हटाबएकेँ प्रयास करए लागल मुदा दिमाग छल जे बेर–बेर ओहि समस्याकेँ दिस जाए लागल छल ।
दिनमे एकबेर भोजनक क्रम टूटि जाइत सायद..........फेर ओ जीबैत कोना रहत ?
नाटक देखब बहुत आवश्यक अछि । ओकरे लेल तऽ एतए आएल अछि । मुदा भोजन तऽ सेहो ..... ।
ओ भीतरसँ कनिक बेचयन होबए लागल छल ।
‘यार, दिस इवनिङ्ग इज सो रोमान्टिक,’ ओकर बगलमे ठाढ़ समूहमेसँ एकगोटे भद्रसन देखएबला लोक अपन मित्रकेँ कहलक ।
‘देन ह्वाई आर यू वेस्टिङ्ग योर व्यूटिफुल इवनिङ्ग हियर विदाउट बोतल ?’ सिगरेटक छाउर झारैत ओ पुछलक ।
‘नथिङ्ग, माइ बाँस इज कमिङ्ग हियर टूडे । इटस अ ग्रेट चान्स टू इम्प्रेस हिम, ’ आ ओ हँसए लागल ।
ओ ओतहुँसँ हटि गेल । एतेक भीड़मे अछि जे किओ नाटको देखए आएल अछि आ ई नाटककेँ नहि देखलाकबादो कोनो फरक पड़एबला अछि वा मात्र ओहेँ.......।
ओ कनिक आओर आगा बढि़ कऽ गेट लग ठाढ़ भऽ गेल आ ओकरा स्मरण आएल, ओ साबुन किनएकेँ विषयमे सोचने छल मुदा ओकरा लग पैसा नहि छल । बितल दश दिनसँ बीना साबुनकेँ काज चला रहल अछि । शरीरसँ गन्ध तऽ नहि आबि रहल अछि ? ओ स्थिरेसँ गर्दन घूमाकऽ कन्हाक निचा सुघंएकँे प्रयास कएलक मुदा लग पाससँ सुगन्ध एतेक आबिरहल छल, ओकरो किछु बुझएमे नहि आएल, ओकर शरीरसँ ओहने सुगन्ध आबएकेँ अनुभव भेल ।
आगाकँे दोकानपर किछु व्यक्ति मःम आ चाउमीन खा रहल छल । आई भुख लगलाक कारण भोजन भोरेमे कऽ लेने छल । एहिद्वारे भुख लागि गेल छल । कि करए, किछु खाईए लेल जाए । ओ कनि अस्कताति दोकानदिस बढि़ गेल ।
‘चाउमीन कसरी प्लेट छ, दाई ? (चाउमीन कोना प्लेट अछि, भाईजी ?)’
‘पच्चीस रुपैयेँ.... ’ ओकर मोन उदास भऽ गेल ।
‘आ मःम ?’
‘बीस रुपैयेँ ।’
ओ खुदरा निकाललक । बसकँे किरायाकँे बाद मात्र १० रुपैयाँ बाचल छल । गरम–गरम चाउमीन ओकर पेटक आगिमे घी दऽ रहल छल । कखनो ओकर मोनमे सबाना आजमीक उतार–चढ़ावयुक्त सम्बाद शैली गुञ्जए लगैत छल तऽ कखनो चाउमीन आ मःम केँ स्वाद मुँहपर अबैत–अबैत रहि जाईत छल । ओ बेचयन भऽ ईम्हर उम्हर टहलए लागल ।
एहिबीच एकगोटे मोटरसाईकिल रोकि कऽ अपन मित्रसँग जल्दिसँ भीड़मे ठाढ़ भऽ किछु पुछए लागल । सभदिस पुछि लेलाकबाद ओ दूनु ओकरोदिस बढ़ल ।
‘हेल्लो बाँस, एक्सट्रा पास अछि कि ?’
‘नहि, मात्र एकहिटा अछि, ’ ओ जबाब देलक ।
‘अहाँ असगरे छी ने ? मित्र हमरा दऽ दिए पास । हमरा लग पास नहि अछि, ’ ओ बिहुँसैत मजाकमे प्रस्ताव रखलक आ ई सोँचि कऽ जे ई मानि जाएत, कनिक आगा निकलि गेल । ओकर मित्र सेहो घूमि कऽ मजाकमे बाजल, ‘दऽ दिऔ ने, डेढ़–दू सय लऽ लिए । हिनका असगरे जाए पड़त ।
ओ ओहिना ठाढ़ छल । एकटा कठिन निर्णय शीघ्र लेबाक छल । दूनु गेटक भीतर गेल । दोकानमे एखने चाउमीन बनल छल । लोक अपन–अपन प्लेटमे चाउमीन राखि कऽ खा रहल छल । चाउमीनसँ सुगन्धक भाफ उठि रहल छल । ओ किछु सोचि रहल छल, ओकरा भीतरसँ एकटा तेज आवाज आएल, ‘हेल्लो सर,दू सय रुपैया ।’
दूनु किछु आगा निकलि गेल छल । आवाज सुनि कऽ घुमल आ ओकरादिस आबए लागल, ओहिमेसँ एकगोटे पर्स निकाललक । ओ आश्चर्यचकित छल, ओ तऽ बजबे नहि कएल, फेर ओकर मोनक बात कोना ओसभ बुझि गेल मुदा ओ पास ओकरा नहि देत । आखिर सबाना आजमीक नाटक अछि ने ? पत्ता नहि फेर कहिआ हएत ? नहि ओ स्वयं नाटक देखत । कोनो मूल्यपर पास ओकरा नहि देत । पैसा कि एहि सभ चीजकेँ मूल्य चुका सकत ?
एकटा मित्र एक÷एक सयकेँ दूटा नोट निकालि लेने छल । ओ एक हाथसँ रुपैँया पकरलक आ दोसर हाथसँ पास ओकरा दऽ देलक । दूनु गेटक भीतर चलि गेल छल ।
ओ ओतहि ठाढ़ छल । ओकरा ब्रह्मा भाईकँे बात स्मरण आएल । पूरे संसार एकटा रंगमञ्च अछि आ हमसभ ओकर ‘कठपुतली’ । जबरदस्ती बिहुँसल । हाथमे सय÷सयकँे दू टा नोट पकराएल छल । किछु देरधरि ओ ठाढ़ भऽ पोष्टरदिस देखैत रहल । एकसयकेँ नोट जेबमे राखि लेलक, दोसर दिन होबएबला नाटककेँ टाईमिङकँे मोनमे दोहरबैत एक सयकेँ नोट हाथमे लऽ कऽ दोकानदिस बढि़ गेल । चाउमीन आ मःम केँ प्लेटसँ भाफ उठि रहल छल ।
लेखकः ✍सुजीत कुमार झा
जनकपुर ,नेपाल
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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