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छठि,पूजाआ हमर परमेसरी (संस्मरण)

#छठि_पूजा_आ_हमर_परमेसरी (संस्मरण)


✒✍विन्देश्वर ठाकुर

हमरा एखनो याद अछि -ओ दिन । ओ पल । ओ दिवस । जहिठाँ छिलाइत छलै माटि,निपाति छलै घाट,गारैत छलौ केराक थम । आ २ दिन अगते सँ सजैत छलै पोखरि । ठीके कते चकमक करैत छलै पोखरिके चहु ओर आ तहुसँ बेसी ओहि इजोतमे चमकैत छलै - हमर ओ - लाले कलरके सूट सलबारमे । सत्ते मोनमे आनन्दक कम्पन पैदा करबाक काज करैत छल । कखनो ठकुवा/भुसबा ल' जाएब बेर त कखनो दियौरी बरबाक बहन्ने हाथमे हाथ ठेकिते देहमे झनाक द' झुनझुनी भरि जाइत । मोनमे असीम नेहक हिलोर एना ने उठति बुझू जेना चानके देखने चकोर अपन बाट बदैल लेने हो ।

 छठिके नहाए/खाए दिन सँ ओकरा घरे अबरजात शुरु भऽ जाए । माए सँ झुठो/फुस्सोके अर्डर लैत काकीके(ओकर माए)  बजा अबियौ ?? काकीके पुछि अबियौ ?? काकीके  फल्लाँ चिउज देने अबियौ ?? आदि इत्यादी बहन्ने दसो/बिसो बेर गेल करी ओकरा घरे । जेनाइओ कोनो बेकार नै । हमरो माए त छोटछीन सँ ल' क पैघ काजसबमे ओकरे माए के संग करै छलैथ आ पुछा अछी करैत छलीह । वजह इएह ने रहैक जे हमहूंसब एक/दोसरके अतेक नजिक एलौ । नै जानि कहिया कि भऽ गेल मुदा अते धरि पता चलल जे एक/दोसरके देखने विना एक्को पल रहब असम्भव !

खायर जे जेना, नहाइ/खाए दिन सं ल' क' पारन दिन तक हमसब संगे रहल करी । ओकरा अरगौती मात्रे होएबाक कारणे अरगौतीक सब समान हमरे घरे रखैक । हमर माए आ काकी(ओकर माए) मिलिक' ठकुआ,भुसबा, आदि इत्यादी परिकार पकाबैक । हमरासबहक काज समानसब किनिक' लाएब, मिलाएब, चंगेरामे सजाएब आ घाटधरि ल' जाएब रहए । दुनूगोटे छठिक' समानसब ढोब' मे खूब व्यस्त रही । कखनो अरगौतीक सुप्पा त कखनो ठकुआ/भुसबाक चंगेरा । एकबेर त केराक घौर लेल हम त हम ल' जाएब लेल कसिक' विवाद उठल रहे । फेर काकीक कहला पर ओकरे ल' जाइ देलियै । आगु आगु ओ आ पाछु पाछु हम । बीच - बीचमे टोकारी सेहो दियैक - - अच्छा ! एम्हर सँ त ल' जाइछा महरानी आ ओम्हर सँ त हमरे पार रहतै ।प्रतिउत्तरमे - पाछु मुहे उनटिक' एक अँजुली मुस्कियाइत -" ठीक छै राजाबाबू ओम्हर सँ अहाँ बोकब आ हम तोडि तोडि प्रसादी बाटब ।" कहथि । मोन तृप्त भऽ जाए ओकर जबाबे सुनि । तबधल मोन शान्त भऽ जाइक ओकर ओ जानमारा  मुस्कीएमे ।
घाटपर पहुँची । नानाथरीक गीतनाद होइक । ओ महिलासब संग गीतनादमे व्यस्त । हमसब एम्हर फटाका छोर मे व्यस्त । जखने पलखति भेटए झट्ट द' आबि जाइ । बात किछु नै बस नजरिसँ नजरि मिलैक आ प्रश्नोत्तर स्वयं नैन सँ नैने करैक । फटाकामे फुलझरी ओकरा खूब पसंद । तें प्राय क' फुलझरीए छोडल करी हम । ओकरे देखा' ओकरे दिस ताकि ताकि फुलझरी जे छोडियै ... ठीके भवाक्क द' हसली ओ । हमहूं आनन्द बिभोर भऽ गेलहुँ ।

अन्तिम छठि आ अन्तिम ओ हंसी एखनो याद अछि - वि.स. २०६८ साल । दोहा आबए सँ पूर्ब । लगभग  बर्ष पहिनेक गप्प छी । गाममे बत्ती आबि गेल रहैक । तें सडकसब सेहो इजोते । हमर घर सँ उतरबारी कात पोखरि छैक । पोखरिसँ घरधरि झिलमिल -झिलमिल बत्ती बरैत रहैक । पूर्बहि सालसब जकाँ अहूं साल छठिक' सबकिछु ओरियान क' दुनूगोटे घाटपर जाइत रही । बाटमे बहुतो गप्प सप्प भेल । घाट पर पहुँचलौ । धुप-दीप, अगरबत्ती बरल । दियौरीसब नेसैत घाट चमचम कर लगलै । दाइमाइ सब गीत गाबए लगलीह ।कनिक देर ओहो गीत गैलीह । तकराबाद फटाका छोर गेलहुँ हम । संगमे ओहो छलीह । एहिबेर फुलझरीमे आगि ओएह धरौलीह । खूब उपर तक छुरछुराएल ... देखिक' खूब खुशी भेलीह ओ । ओकर हंसी सँ छठिक' घाट महमहा उठल छल । हमरा मोनमे सेहो उमंगक खूब जोडगर बारिष बर्षल ।

 तकराबाद प्रात भेने पारन । सूर्यके भोरका अर्घ संग छठि पूजा विधिवत समाप्त । प्रसादी वितरण । घाट सँ घरधरि खूब भेल । दुनूगोटे घाटे पार सँ केरा खूब खाइत एलौ । अंगनामे आबि त जबर्दस्ती भुसबा मुंहमे कोचने याद अछि । स्मरण अछि - ओकर हाथके अन्तिम स्पर्श आ अन्तिम बेर मुंहक' खुआएल ठकुआ । तकराबादसँ ने ओ छठि भेटल आ नहिए ओ हमर परमेसरी । छठि एहि लेल नै जे प्रवासमे छी आ परमेसरी एहि लेल नै जे आब ओ ककरो दोसरके  धरोहर भऽ गेलीह । आइ एकाएक मरुभूमिक एहि जंगल सँ इयाद आएल मानसपटलमे बैसल छठि विशेष ओ एकटा पछिला पन्ना जे नै जानि मृत्यु प्रयन्त आब बस संस्मरण बनिक' रहि जाएत .......

लेखकः✍विन्देश्वर_ठाकुर
०६/११/२०१६


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पोस्ट:- अशोक कुमार सहनी
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