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दहेज लेनिहारके बहिष्कृत कऽ दैत अछि बत्तिसगामा

दहेज लेनिहारके बहिष्कृत कऽ दैत अछि बत्तिसगामा



अपन मिथिला /अगहन मास आबि रहल अछि आ संगे आनि रहल अछि बेटीबला आ बेटा बलाके लेल विवाहक चिंता सेहो । चिंता अहि बातक जे कोनाक बेटीक विवाह होयत क्यिाक तऽ मिथिलामे विवाहके मतलब मात्र विवाहे नइ होइत अछि । विवाहके चर्चाके संगे एकटा आउरो चर्चा हेबे करत आ ओ अछि – दहेज ।
जे कहियो समाज सँ अलग नइ भेल ओ अछि दहेज । दहेज इ शब्द सँ परहेज तऽ सबके मुदा लेताह सब कियो । बेटा वाला छाइथ तऽ लेता बेटीवाला छाईथ तऽ देताह । बिना कोनो संकोच के ढ़िढ़ोरा सेहो पीटता जे हमरा बेटाके तऽ बेटीवाला एतेक दैत छल मुदा हमहीं तैयार नइ भेलहुँ । हमरा कन्या निक चाहि छल, ताहि सँ बिना किछु देने लेने विवाह केने छी । बड़ा सुन्दर लागत ई बात सुनैत मुदा सत्यता किछु आओर होइत अछि ।



क्यिाक तऽ इ एहन नइ लेनाय छै जे बेटी पक्ष देबौऽ करै छै बेटा पक्ष लेबौऽ करै छैथ आ समाज बुझिकऽ अनठेबौ करै छै । अहि सँ बेशी दुर्भाग्यपूर्ण बात कि हेतै जे अखनो आबिक हमरा अहाँके देशमे दहेजके लेल बेटी मारल जाइत अछि । चारुकात अखन्न याह बात आबि रहल अछि जे दहेजके हटेनाय बहुत आवश्यक अछि । प्रत्येक दिन किछ ने किछ एहन समाचारमे भेट जायत जे फलां ठाम लड़की दहेजके कारण प्रताड़ना देल गेल अछि , कतेक ठाम तऽ लडकी के मारल गेल अछि, दहेजक लोभमे । एहन बात सुनिक मोन डरा जाइत अछि । मोनमे इहो आबै लागैयऽ जे कहिया खत्म हेतै इ दहेजक प्रथा । कि कहियो नइ ?
मुदा अहि मिथिलांचलमे एकटा गाम एहनो अछि जाहिठाम दहेज लेनाइ आओर देनाई दुनु समाजिक अपराध मानल जाइत अछि । इ गाम अछि बत्तीसगामा जाहिठाम दहेज लेनाइ देनाई दुनु अपराध अछि ,आ जे दहेज लैत वा दैत अछि ओकरा समाज सँ निकालि देल जाइत अछि । कहल जाइत अछि जे परम्परा सँ आबि रहल अहि चलनके बत्तीसगामाके लोक सब अखनोधरि मानैत आबि रहल छथिन । बत्तीसगाम बत्तीस टा गामके मिलाक बनावौल गेल अछि । आउर तऽ आउर हर बातमे एकमत सेहो । बिहार जाहिठाम अखनो बहुत बेशी शिक्षा आ चेतनाके आवश्यकता अछि आ अहिठाम मधुबनि जिलाके इ बत्तीसगामा दहेज नइ लै दैके लेल चर्चामे अछि ।


बत्तीसगामा गाममे मैथिल कर्ण कायस्थ सब अपन बेटा बेटीके वियाह बिना किछो लेने देने करै छाईथ । जँ कियो दहेज लैत छाइथ तऽ सबसँ पहिने तऽ हुनका समाजसँ बाहर कऽ देल जायत छैन आ संगहि संग कियो हुनक कोनो काज मे शामलि सेहो नइ होइत छथिन । एतेक तक कि बादोमे कियो अपन बेटा बेटीके विवाह आहि परिवारमे नइ करै छथिन । बत्तिसगामाक एकटा बुजुर्ग कहला जे बहुत बुझि सुझिके हमर सबके पूर्वज इ नियम बनेने छलथिन आ हम सब याह चाहैत छी जे ई युगो तक चलैत रहै । बत्तिसगामाक एकटा महिला सँ बात कैला पर ओ कहली जे गर्व अछि हमरा अपन गाम पर जे अहि तरहके परम्परा के निर्वाह कऽ रहल अछि । आ हम सब याह कामना करै छी जे चाहे भारतके गाम होई वा नेपालके सब गाम बत्तिसगामा बनै । ताकि जाहि दहेजके आगिमे मिथिला आओर मधेश जैर रहल अछि ओ पूर्णत खत्म होई ।
अहि परम्पराके नींव दरभंगा महाराज हरि सिंह देव रखने छलखिन । लगभग आठ सौ साल पहिने ई परम्परा शुरु भेल । समाजमे धनिक आओर गरिब बीच विभेद नइ रहै, समाजमे सबकियो बराबर रहै, आ कियो अपना आपके ककरो सँ बेशी वा ककरो सँ कम नइ बुझै । ओना आब बहुत किछ बदैल गेल अछि मुदा अहि गामक के मैथिल कर्ण सब नइ बदलाइथ ओ सब अखनो अपन परम्परा के पूरा करैमे लागल छथिन ।
आब आउ असली बात पर आबैत छी जे कियाक कम नइ भऽ रहल अछि दहेज । सत्त कहुँ तऽ हमरा तऽ बुझनामे आबि रहल अछि जे पहिने सँ बेशी विकराल भऽ गेल अछि दहेजके समस्या । बड़का लोक बड़का तरीका सँ लैत छाइथ । कहैके लेल किछ नइ लेता मुदा, चारि पहिया तऽ आब आम बात भऽ गेल अछि, कहता जे ओहिपर तऽ हुनके बेटी जमाइ ने चढ़तैन । बेटीवला कहलक बातो तऽ सहि छै आखिर चढ़त तऽ हमरे बेटीने । तहिना कहता जे हम पाई ताई नइ लेब मुदा बत्तीस भैर सोना चाहबे करी ।संगे इहो कहि देता जे सोना कोनो हम राखब हुनके बेटी ने पहिरतैन । आब एहन अवस्थामे की कयल जाई ।
सबसे पहिने तऽ पुरजोर विरोध करु जँ स्वयं विवाह योग्य लड़का आ लड़की छी । अहाँ मानू नइ मानू मुदा शरुवात अहिंके करै पड़त । एकटा बात आरो महिला अखनो अपना पढ़ाई लिखाई पर ध्यान नइ दऽ रहल छथिन । तऽ आग्रह जे शिक्षाक स्तर बढ़ाबी ताकि आत्मनिर्भर होइमे सहज होयत आ दहेज जे एकटा भयानक रुप लऽ लेने अछि ओहो धीरे धीरे कम होइत जेतै ।




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पोस्ट:- अशोक कुमार सहनी
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