मैथिल प्रशान्त जी केर ३ टा मुक्तक
१.
कहिया एबै अहाँ घर आँगन पुछय ।
कोना करबै लवाण अगहन पुछय ।।
आँच नेहक सुनगा बिसैर गेलियै पिया,
भाव उधियाइत हमरा अधन पुछय ।।
२.
निर्मोही निर्दय की पाथर कहू ।
मागक सिनूर की काजर कहू ।।
भाव मोनक जे पढि ने सकल,
आब लिखिक' की आखर कहू ।।
३.
छोड़ि गेलहुँ अहाँ अकाबोनमे ।
रखलहुँ मुर्ति बैसा अपन मोनमे ।।
अष्टदल कमल आब मौला गेलै यौ,
गान्ही लगलै जेना पिया सोनमे ।।
~>✍👤 मैथिल प्रशान्त


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