तमाकूल सँ बरबाद होइत मैथिल आ मैथीली संस्कृति
तमाकूल सँ बरबाद होइत मैथिल आ मैथीली संस्कृति
✍👤 डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
मिथिलाक संस्कृति केर दू अभिशाप अछि: तमाकूल आ भांग। पता नहि कोना ई दुनू इलम मैथिली संस्कृति सं जुडि गेल? दुनू के सेवन मिथिला में नशा केर श्रेणी में नहि अबैत अछि। तमाकूल त बाप सं बेटा, चरबाह, हरबाह सं गिरहत तक मांगि खैत छथि। तमाकूल के नाम सुनिते मैथिली के एक चर्चित गीत जकरा आइयो बहुत सुवाद सँ सुनल जाइत अछि स्मरण आबि जाइत अछि:
मामा यौ कनि खैनी दीय
अपनों खाऊ कनि हमरो दीय
जौं नहि देब त कहि देबनि हम मामी के
तमाकूल के खैनी, सुरती, तम्बाकू आदि नाम सं जानल जैत अछि। ई अपन समग्र अवस्था मिथिला के संस्कृति में रचल बसल अछि। लोक त बारी-झारी में खेबा जोग तमाकूल उपजा लैत छथि। फेर ओकर कटनी, छटनी करैत छथि। शीत-रौद देखबैत छथि आ अंत में खर में राखि साल भरि लेल जमा करैत छथि। तमाकूल के ऐंठी आ जूम में सेहो कला देखि सकैत छी। कम्पनी सब के आबि गेलाक बाद सकरी कट आ आरो रंगक तमाकूल बाज़ार में उपलब्ध अछि। कनि तेज लगबा लेल कम्पनी सब ओहि में एसिड डालि दैत छैक। लोक कहता, “बड्ड चहट्गर अछि।” तमाकूल लोक सीधे चून लगा खाइत छथि, नोसि लेत छथि, बीड़ी में, सिगरेट में, चुरुट में, सिगार में, पाइप में, गुटखा, गुड़ाखू, गूल आ नहि जानि कथी-कथी में प्रयोग होइत अछि। आर त आर एकटा गूल केर कम्पनी "गुलाब गूल" नाम सँ अपन प्रोडक्ट बनबैत छ्ल। ओहि डिब्बा में एक चहटगर स्लोगन रहैक - "गूल हमारा आविष्कार है"। आब कहु, कुनो जोड़ अछि एकर महत्त्व के?
मुदा जे सबसँ खतरनाक तरीका तमाकूल खेबाक अछि से अपन मिथिला आ आसपास केर क्षेत्र में देखल जाइत अछि - शुद्ध तमाकूल में चून मिला आ चुनेटि क ठोर में आँगुर सँ ठुसि लेनाइ। ई साक्षात् यम के नौत देबाक प्रथा अछि। ऊपर सँ ई लोक के असभ्य आ सुचिता के सिद्धान्त सँ दूर सेहो भगबैत अछि। लोक तमाकूल ठुसि यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकैत रहैत छथि। ई एहेन पपियाह लत अछि जे समाजवाद केर सिद्धांत पर अटकल अछि। समाजवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद के जोड़ सँ पकड़ने अछि। की ब्राह्मण आ की हरिजन, की हिन्दू आ की मुस्लमान, ईसाई आ बहुत ठाम स्त्रीगण तक एकर स्वाद सँ झुमैत रहैत छथि। अतेक समाजवादी जे रिक्शा पर चढ़ल हाकिम रिक्शावाला सँ दांत निपोड़ैत बिना कुनो मान सम्मान के चिंता केने तमाकूल माँगि अपन ठोर में ठुसि लैत छथि। रिक्शावाला सेहो जे कनिकबेकाल पहिने लघुशंका केने छ्ल आ पानि के अभाव अथवा आर कुनो कारणे हाथ नहि धोने छ्ल अपन ओहि पवित्र हाथ सँ खूब मोन सँ तमाकूल के चून सँ रगरैत अछि आ हाकिम के दैत छनि। बाह! की दृश्य - जेहिना हाकिम तहिना रिक्शावला दुनू मस्त।
तमाकूल के सेवन केनिहार रंग-रंग के बहाना बनबैत छथि। कियोक एकरा B B C अर्थात बुद्धिवर्धक चूर्ण त कियोक आरो किछु कहि संबोधित करैत छथि आ भांति - भांति के महिमा के बखान करैत छथि। हमर एक सम्बन्धी एक घंटा में 20 बेर तमाकूल ठोर तर दैत छथि। एयर फाॅर्स में काज करैत छला। हवाई जहाज केर इंजन केर अभियंता रहथि। हुनका बारे में एक बात प्रचलित छ्ल। जखन कखनो फाइटर हवाई जहाज केर इंजन में कुनो खरापी होइक आ हुनका भांगट बुझ में नहि आबनि त वरिष्ठ अधिकारी कहैंन, "भाई, हिनका चून तमाकूल दियौन, ई तुरत सब किछु ठीक क देताह।" फेर की लोक तुरंत तमाकूल तैयार करैत छल, हुनका दैत छलनि आ ओ बहुत गर्वित होइत तमाकूल के ठोर में ठुसैत अपन काज में मनोयोग सँ लागि जाइत छला। ई बात अलग अछि जे बाद में दम्माक गहन रोगी भ गेला। हालाँकि तमाकूल केर लत एखन धरि नहि गेलनि अछि। हुनकर पत्नी ओना त तमाकूल खेबा लेल हुनका सँ झगरैत रहैत छली मुदा जखन यैह बात एक दिन हुनकर छोट भाई बुझाब' लागलथिन त पत्नी के भेलनि , "तमाकूल के इलम कुनो बड्ड कलंकक बात थोड़े ने भेल? खाइत छथि त कोन कुकर्म?" झट दनि पतिक सुरक्षा कवच बनैत अपन देवर के ऊंच नीच कहनाय शुरू केलनि: "अहाँके अतबो संस्कार नहि बचल जे जेठ भाय सँ कोना बाजी? कोना हिम्मत भेल हिनका भाषण देबके? तमाकूल खाइत छथि कुनो कुकर्म नहि।" बेचारा छोट भाय, काटू त खून नहि! आ तमाकूल ठूसा श्रीमान अपन पत्नी सँ गदगद भेल।
जखन दिल्ली यूनिवर्सिटी केर हॉस्टल में रहैत रही त अनेक बिहारी मित्र सब तमाकूल खैत छलाह आ एकरा बिहार आ मिथिला के सांस्कृतिक धरोहर जकाँ मनैत अपन लत पर नितराइत छला। यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकबा के परंपरा के सेहो शाश्वत केने छला। एक मित्र त एहेन छला जे की कही। बहुत ज्ञानी, पढ़बा में विलक्षण, कुशाग्रबुद्धि मुदा तमाकूल खेबाक घनघोर समर्थक। वाक्यपटु सेहो छला। अपना सङ्गे अनेक बिहारी आ बहुत रास आनो ठाम के लोक के तमाकूल ठुसबक लत में निपुण केने छला - सिद्धस्त गुरु जकाँ। कहियों काल चिलम सेहो देख लैत छला। बाद में आई पी एस अधिकारी भेला। मित्रता एखनो अछि मुदा नाम देखार नहि करब। हमर त किछु नहि करता कनि देखार भ जेताह।
भारत के अनेक तथाकथित शैक्षणिक कौशल में माहिर विश्वविद्यालय में त तमाकूल सङ्गे बीड़ी के प्रचलन भ गेल। लोक बीड़ी के धुआं में समाजवाद के संगीतक आनंद आ परमानन्द में भेर होमय लगला। अनेक महिला सब सेहो एकरा समाजवाद, वर्ग बिभेद हटेबाक, आ स्त्री-पुरुख के समानता के इंडिकेटर के रूप में देखैत छथि। सभा में, रैली में लोक बीड़ी पिबैत मस्त भेल मकुनी हाथी जकाँ चलैत रहैत छथि जेना बीड़ी केर हरेक कश सँ एक कुप्रथा के सर्वनाश क लेता, समाज सभ्य आ सम्यक भ जैत, माओ, नक्सल सब समस्या के चट सँ निदान।
मुदा तमाकूल के आयुर्विज्ञान आ वैज्ञानिक शोध के तराजू पर जोखब त लागत जे ई दारु सँ अधिक हानिकारक अछि। कैंसर केर खतरा सब सँ अधिक तमाकूल सँ ओहू में ठोर में सीधे चुनेटल तमाकूल सँ अछि।
विज्ञानक भाषा में कही त तमाकूल के गाछ निकोटियाना प्रजाति के अछि जकर जड़ि भारत में नहि अपितु दक्षिण अमेरिका में छैक। दक्षिण अमेरिका सँ ई पुर्तगाल आ पुर्तगाल सँ भारत 1600 ईस्वी में आनल गेल। आई विश्व के कुल उत्पाद के 7.8 प्रतिशत तमाकूल अपन देश भारत में होइत अछि। जे अनकर छ्ल, हानिकारक छल, व्याधि के घर छ्ल से अपन भेल अछि?
कहल ई जाइत छैक जे एक बेर पुर्तगाल स्थित फ़्रांसिसी राजदूत जॉन निकोट अपन देश के रानी लग तमाकूल के बिया भेजलनि आ अहि तरहेँ प्राचीन इतिहास में तमाकूल नामक ई गाछ प्रचलित भ गेल जे आई समस्त विश्व लेल पैघ समस्या बनल अछि। निकोट महोदय केर नाम सं एकरा निकोटिन कहल गेल।
एमहर हमरा किछु बूढ़ आ जानकार सब सूचना देलनि अछि जे जखन बीड़ी के कंपनी सब बीड़ी बनेलक त लोक ओकरा पीबे नहि करैक । जों नहि व्यवहार करतै त व्यापार कोना हेतैक? एकरा ध्यान में रखैत कंपनी सब किछु कलाकार के एकत्रित केलक आ अनेक शहर, गाम, चौराहा पर लोक सबके लैला मजनू, सीरी फरहाद, सुल्ताना डाकू आदि नाटक केर आयोजन कर लागल। लोक सब के बजा मंगनी में नाटक देखबै आ बीच-बीच में बीड़ी लुटबै। लोक नहु-नहु बीड़ी पिनाई शुरू केलक। नशा केर प्रयोग बढ़े लागल। बीड़ी सँ वर्ग केर रचना भेल। ब्राह्मण शुरू में बीड़ी नहि पिलनि। सोइत ब्राह्मण - राम-राम कोना छोट लोकक चीज़ ग्रहण करितथि? लेकिन एकर स्वाद के चखबाक आकांक्षा सब के छलैक। फेर की समाधान? समाधान के रूप में पहिने सँ चुनेटल तमाकूल त छले बाद में सिगरेट आबि गेल। सिगरेट भेल त क्लास भ गेल। फेर की ब्राह्मण आ की जमींदार। बुझु जे सिगरेट त मॉडर्न आ पढ़ल लिखल ओहू में आधुनिक आ अंग्रेजी शिक्षा केर मापदंड भ गेल। जे मिथिला आई सं ४०-५० वर्ष पूर्व टमाटर के सार्वजानिक भोज में, आ आन व्यवहार में अनबाक अनुमति नहि देने छल। चूँकि ई बिलायत सं आयल रहैक ताहि एकर बिलौती कहैत छल। तीमन-तरकारी में टमाटर के बदला आमिल आ नेबो के प्रयोग करैत छल वैह समाज बिना कुनो मीन-मेख केने तमाकूल के कोना अपना लेलक? छैक ने गूढ़ बात! आर-त-आर, तमाकूल भ गेल शुद्ध, छुआछूत सं सेहो मुक्त। केह्नो उपास में आरो किछु खाऊ-कि-नहि खाऊ तमाकूल चूसि सकैत छी। कर्मकाण्डी के एकरा ग्रहण करबा में कुनो हर्ज नहि, शायद भगवान बैकुण्ठ सं अनुमति प्रदान केने छथिन।
हमरा त लगैत अछि जे मिथिला आ मिथले कथिलेल समस्त बिहार में दारू संग तमाकूल आ भांग पर बंदी करक अत्यंत आवश्यकता अछि। नीतिश कुमार जी कनि इम्हरो ध्यान दियौक। अते त एखनो तमाकूल के प्रोडक्ट बनबे बला कम्पनी सब खुजल उक बनल अछि। कुनो प्रतिबन्ध नहि। पश्चिमी देश विशेष रूपेँ अमेरिका में तमाकूल इत्यादि के कारोबारीके अपन आमदनीक एक पुष्ट भाग 'कैंसर' आ दोसर असाध्य रोगक इलाजक हेतु लगब पड़ैत छनि किन्तु एहि तरहक नियम के बारे में भारत में सोचल तक नहि गेल अछि । ई अपना आप में घनघोर चिंताक विषय अछि।
ताथाकाथित सोशलाइट, विद्वान आ प्रगतिशील लोक सब चुप छथि। कतेक त स्वयं तमाकूल चुन आ तमाकूल सं निर्मित अन्य वस्तु के उपयोग में संलग्न छथि। जनसँख्या विष्फोट के कगार पर ठाढ़ भारत केर विद्वान लोकनि धर्म, मेजोरिटी, माइनॉरिटी, हरिजन, गिरिजन, आ व्यवस्था में निक अधलाह के मीन-मेख निकलबा में भेर छथि। जनसँख्या हुनका एसेट बुझना जैत छनि। कुनो अस्पताल के कैंसर, यक्ष्मा, आ ह्रदय विभाग में जाऊ, स्थितिक भान भ जैत। दम्मा के मरिज केर सर्वेक्षण करू यथार्थ बुझि जैब। कम सँ कम तमाकूल के उत्पाद के पूर्णतः प्रतिबंधित करबाक नियम लागू कैल जा सकैत छैक जाहि सँ एकर प्रचार-प्रसार कम स कम हो और अंततः ई समाप्ति केर डेग दिश अग्रसर हो। तमाकूल सँ घटे-घाटा। तमाकूल में मादकता अथवा उत्तेजना प्रदान कर’ वला मुख्य घटक निकोटीन (Nicotine) होइत छैक। यैह तत्व सबस अधिक मारुक सेहो होइत छैक। एकर अतिरिक्त तमाकूल में अनेक तरहक कैंसर उत्पन्न कर’ वला तत्व पायल जाइत छैक। तमाकूल के सेवन सँ मुँह, घेंट, श्वांसनली आ फेफड़ा केर कैंसर (Mouth, throat and lung cancer) होबाक सम्भावना रहैत छैक। बिमारिक अंत अतै नहि होइत छैक एते धरि ह्रदय के बीमारी (Heart Disease), धमनी काठिन्यता, उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure), पेटक अल्सर (Stomach Ulcer), अम्लपित (Acidity), अनिद्रा (insomnia) आदि रोगक सम्भावना तमाकूल केर उत्पाद केर सेवन सँ बढ़ि जाइत छैक।
आदिवासी समाज में सेहो बनिया सब स्त्री-पुरुख दुनू के तमाकूल आ एकरा सं निर्मित अनेक वस्तु के लति लगा देने छैक। तमाकूल केर सेवन एक पैघ समस्या अछि। मोन आ शरीर दुनू के सर्वनाश क रहल अछि। अहि पर सोचब जरुरी अछि। हम एहि कथ्य के माध्यम सं किनको ऊँच-नीच नहि कहि रहल छी। केवल यैह जे ई बहुत खराप इलम अछि, एकर त्याग करक चाही।।
✍👤 डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
मिथिलाक संस्कृति केर दू अभिशाप अछि: तमाकूल आ भांग। पता नहि कोना ई दुनू इलम मैथिली संस्कृति सं जुडि गेल? दुनू के सेवन मिथिला में नशा केर श्रेणी में नहि अबैत अछि। तमाकूल त बाप सं बेटा, चरबाह, हरबाह सं गिरहत तक मांगि खैत छथि। तमाकूल के नाम सुनिते मैथिली के एक चर्चित गीत जकरा आइयो बहुत सुवाद सँ सुनल जाइत अछि स्मरण आबि जाइत अछि:
मामा यौ कनि खैनी दीय
अपनों खाऊ कनि हमरो दीय
जौं नहि देब त कहि देबनि हम मामी के
तमाकूल के खैनी, सुरती, तम्बाकू आदि नाम सं जानल जैत अछि। ई अपन समग्र अवस्था मिथिला के संस्कृति में रचल बसल अछि। लोक त बारी-झारी में खेबा जोग तमाकूल उपजा लैत छथि। फेर ओकर कटनी, छटनी करैत छथि। शीत-रौद देखबैत छथि आ अंत में खर में राखि साल भरि लेल जमा करैत छथि। तमाकूल के ऐंठी आ जूम में सेहो कला देखि सकैत छी। कम्पनी सब के आबि गेलाक बाद सकरी कट आ आरो रंगक तमाकूल बाज़ार में उपलब्ध अछि। कनि तेज लगबा लेल कम्पनी सब ओहि में एसिड डालि दैत छैक। लोक कहता, “बड्ड चहट्गर अछि।” तमाकूल लोक सीधे चून लगा खाइत छथि, नोसि लेत छथि, बीड़ी में, सिगरेट में, चुरुट में, सिगार में, पाइप में, गुटखा, गुड़ाखू, गूल आ नहि जानि कथी-कथी में प्रयोग होइत अछि। आर त आर एकटा गूल केर कम्पनी "गुलाब गूल" नाम सँ अपन प्रोडक्ट बनबैत छ्ल। ओहि डिब्बा में एक चहटगर स्लोगन रहैक - "गूल हमारा आविष्कार है"। आब कहु, कुनो जोड़ अछि एकर महत्त्व के?
मुदा जे सबसँ खतरनाक तरीका तमाकूल खेबाक अछि से अपन मिथिला आ आसपास केर क्षेत्र में देखल जाइत अछि - शुद्ध तमाकूल में चून मिला आ चुनेटि क ठोर में आँगुर सँ ठुसि लेनाइ। ई साक्षात् यम के नौत देबाक प्रथा अछि। ऊपर सँ ई लोक के असभ्य आ सुचिता के सिद्धान्त सँ दूर सेहो भगबैत अछि। लोक तमाकूल ठुसि यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकैत रहैत छथि। ई एहेन पपियाह लत अछि जे समाजवाद केर सिद्धांत पर अटकल अछि। समाजवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद के जोड़ सँ पकड़ने अछि। की ब्राह्मण आ की हरिजन, की हिन्दू आ की मुस्लमान, ईसाई आ बहुत ठाम स्त्रीगण तक एकर स्वाद सँ झुमैत रहैत छथि। अतेक समाजवादी जे रिक्शा पर चढ़ल हाकिम रिक्शावाला सँ दांत निपोड़ैत बिना कुनो मान सम्मान के चिंता केने तमाकूल माँगि अपन ठोर में ठुसि लैत छथि। रिक्शावाला सेहो जे कनिकबेकाल पहिने लघुशंका केने छ्ल आ पानि के अभाव अथवा आर कुनो कारणे हाथ नहि धोने छ्ल अपन ओहि पवित्र हाथ सँ खूब मोन सँ तमाकूल के चून सँ रगरैत अछि आ हाकिम के दैत छनि। बाह! की दृश्य - जेहिना हाकिम तहिना रिक्शावला दुनू मस्त।
तमाकूल के सेवन केनिहार रंग-रंग के बहाना बनबैत छथि। कियोक एकरा B B C अर्थात बुद्धिवर्धक चूर्ण त कियोक आरो किछु कहि संबोधित करैत छथि आ भांति - भांति के महिमा के बखान करैत छथि। हमर एक सम्बन्धी एक घंटा में 20 बेर तमाकूल ठोर तर दैत छथि। एयर फाॅर्स में काज करैत छला। हवाई जहाज केर इंजन केर अभियंता रहथि। हुनका बारे में एक बात प्रचलित छ्ल। जखन कखनो फाइटर हवाई जहाज केर इंजन में कुनो खरापी होइक आ हुनका भांगट बुझ में नहि आबनि त वरिष्ठ अधिकारी कहैंन, "भाई, हिनका चून तमाकूल दियौन, ई तुरत सब किछु ठीक क देताह।" फेर की लोक तुरंत तमाकूल तैयार करैत छल, हुनका दैत छलनि आ ओ बहुत गर्वित होइत तमाकूल के ठोर में ठुसैत अपन काज में मनोयोग सँ लागि जाइत छला। ई बात अलग अछि जे बाद में दम्माक गहन रोगी भ गेला। हालाँकि तमाकूल केर लत एखन धरि नहि गेलनि अछि। हुनकर पत्नी ओना त तमाकूल खेबा लेल हुनका सँ झगरैत रहैत छली मुदा जखन यैह बात एक दिन हुनकर छोट भाई बुझाब' लागलथिन त पत्नी के भेलनि , "तमाकूल के इलम कुनो बड्ड कलंकक बात थोड़े ने भेल? खाइत छथि त कोन कुकर्म?" झट दनि पतिक सुरक्षा कवच बनैत अपन देवर के ऊंच नीच कहनाय शुरू केलनि: "अहाँके अतबो संस्कार नहि बचल जे जेठ भाय सँ कोना बाजी? कोना हिम्मत भेल हिनका भाषण देबके? तमाकूल खाइत छथि कुनो कुकर्म नहि।" बेचारा छोट भाय, काटू त खून नहि! आ तमाकूल ठूसा श्रीमान अपन पत्नी सँ गदगद भेल।
जखन दिल्ली यूनिवर्सिटी केर हॉस्टल में रहैत रही त अनेक बिहारी मित्र सब तमाकूल खैत छलाह आ एकरा बिहार आ मिथिला के सांस्कृतिक धरोहर जकाँ मनैत अपन लत पर नितराइत छला। यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकबा के परंपरा के सेहो शाश्वत केने छला। एक मित्र त एहेन छला जे की कही। बहुत ज्ञानी, पढ़बा में विलक्षण, कुशाग्रबुद्धि मुदा तमाकूल खेबाक घनघोर समर्थक। वाक्यपटु सेहो छला। अपना सङ्गे अनेक बिहारी आ बहुत रास आनो ठाम के लोक के तमाकूल ठुसबक लत में निपुण केने छला - सिद्धस्त गुरु जकाँ। कहियों काल चिलम सेहो देख लैत छला। बाद में आई पी एस अधिकारी भेला। मित्रता एखनो अछि मुदा नाम देखार नहि करब। हमर त किछु नहि करता कनि देखार भ जेताह।
भारत के अनेक तथाकथित शैक्षणिक कौशल में माहिर विश्वविद्यालय में त तमाकूल सङ्गे बीड़ी के प्रचलन भ गेल। लोक बीड़ी के धुआं में समाजवाद के संगीतक आनंद आ परमानन्द में भेर होमय लगला। अनेक महिला सब सेहो एकरा समाजवाद, वर्ग बिभेद हटेबाक, आ स्त्री-पुरुख के समानता के इंडिकेटर के रूप में देखैत छथि। सभा में, रैली में लोक बीड़ी पिबैत मस्त भेल मकुनी हाथी जकाँ चलैत रहैत छथि जेना बीड़ी केर हरेक कश सँ एक कुप्रथा के सर्वनाश क लेता, समाज सभ्य आ सम्यक भ जैत, माओ, नक्सल सब समस्या के चट सँ निदान।
मुदा तमाकूल के आयुर्विज्ञान आ वैज्ञानिक शोध के तराजू पर जोखब त लागत जे ई दारु सँ अधिक हानिकारक अछि। कैंसर केर खतरा सब सँ अधिक तमाकूल सँ ओहू में ठोर में सीधे चुनेटल तमाकूल सँ अछि।
विज्ञानक भाषा में कही त तमाकूल के गाछ निकोटियाना प्रजाति के अछि जकर जड़ि भारत में नहि अपितु दक्षिण अमेरिका में छैक। दक्षिण अमेरिका सँ ई पुर्तगाल आ पुर्तगाल सँ भारत 1600 ईस्वी में आनल गेल। आई विश्व के कुल उत्पाद के 7.8 प्रतिशत तमाकूल अपन देश भारत में होइत अछि। जे अनकर छ्ल, हानिकारक छल, व्याधि के घर छ्ल से अपन भेल अछि?
कहल ई जाइत छैक जे एक बेर पुर्तगाल स्थित फ़्रांसिसी राजदूत जॉन निकोट अपन देश के रानी लग तमाकूल के बिया भेजलनि आ अहि तरहेँ प्राचीन इतिहास में तमाकूल नामक ई गाछ प्रचलित भ गेल जे आई समस्त विश्व लेल पैघ समस्या बनल अछि। निकोट महोदय केर नाम सं एकरा निकोटिन कहल गेल।
एमहर हमरा किछु बूढ़ आ जानकार सब सूचना देलनि अछि जे जखन बीड़ी के कंपनी सब बीड़ी बनेलक त लोक ओकरा पीबे नहि करैक । जों नहि व्यवहार करतै त व्यापार कोना हेतैक? एकरा ध्यान में रखैत कंपनी सब किछु कलाकार के एकत्रित केलक आ अनेक शहर, गाम, चौराहा पर लोक सबके लैला मजनू, सीरी फरहाद, सुल्ताना डाकू आदि नाटक केर आयोजन कर लागल। लोक सब के बजा मंगनी में नाटक देखबै आ बीच-बीच में बीड़ी लुटबै। लोक नहु-नहु बीड़ी पिनाई शुरू केलक। नशा केर प्रयोग बढ़े लागल। बीड़ी सँ वर्ग केर रचना भेल। ब्राह्मण शुरू में बीड़ी नहि पिलनि। सोइत ब्राह्मण - राम-राम कोना छोट लोकक चीज़ ग्रहण करितथि? लेकिन एकर स्वाद के चखबाक आकांक्षा सब के छलैक। फेर की समाधान? समाधान के रूप में पहिने सँ चुनेटल तमाकूल त छले बाद में सिगरेट आबि गेल। सिगरेट भेल त क्लास भ गेल। फेर की ब्राह्मण आ की जमींदार। बुझु जे सिगरेट त मॉडर्न आ पढ़ल लिखल ओहू में आधुनिक आ अंग्रेजी शिक्षा केर मापदंड भ गेल। जे मिथिला आई सं ४०-५० वर्ष पूर्व टमाटर के सार्वजानिक भोज में, आ आन व्यवहार में अनबाक अनुमति नहि देने छल। चूँकि ई बिलायत सं आयल रहैक ताहि एकर बिलौती कहैत छल। तीमन-तरकारी में टमाटर के बदला आमिल आ नेबो के प्रयोग करैत छल वैह समाज बिना कुनो मीन-मेख केने तमाकूल के कोना अपना लेलक? छैक ने गूढ़ बात! आर-त-आर, तमाकूल भ गेल शुद्ध, छुआछूत सं सेहो मुक्त। केह्नो उपास में आरो किछु खाऊ-कि-नहि खाऊ तमाकूल चूसि सकैत छी। कर्मकाण्डी के एकरा ग्रहण करबा में कुनो हर्ज नहि, शायद भगवान बैकुण्ठ सं अनुमति प्रदान केने छथिन।
हमरा त लगैत अछि जे मिथिला आ मिथले कथिलेल समस्त बिहार में दारू संग तमाकूल आ भांग पर बंदी करक अत्यंत आवश्यकता अछि। नीतिश कुमार जी कनि इम्हरो ध्यान दियौक। अते त एखनो तमाकूल के प्रोडक्ट बनबे बला कम्पनी सब खुजल उक बनल अछि। कुनो प्रतिबन्ध नहि। पश्चिमी देश विशेष रूपेँ अमेरिका में तमाकूल इत्यादि के कारोबारीके अपन आमदनीक एक पुष्ट भाग 'कैंसर' आ दोसर असाध्य रोगक इलाजक हेतु लगब पड़ैत छनि किन्तु एहि तरहक नियम के बारे में भारत में सोचल तक नहि गेल अछि । ई अपना आप में घनघोर चिंताक विषय अछि।
ताथाकाथित सोशलाइट, विद्वान आ प्रगतिशील लोक सब चुप छथि। कतेक त स्वयं तमाकूल चुन आ तमाकूल सं निर्मित अन्य वस्तु के उपयोग में संलग्न छथि। जनसँख्या विष्फोट के कगार पर ठाढ़ भारत केर विद्वान लोकनि धर्म, मेजोरिटी, माइनॉरिटी, हरिजन, गिरिजन, आ व्यवस्था में निक अधलाह के मीन-मेख निकलबा में भेर छथि। जनसँख्या हुनका एसेट बुझना जैत छनि। कुनो अस्पताल के कैंसर, यक्ष्मा, आ ह्रदय विभाग में जाऊ, स्थितिक भान भ जैत। दम्मा के मरिज केर सर्वेक्षण करू यथार्थ बुझि जैब। कम सँ कम तमाकूल के उत्पाद के पूर्णतः प्रतिबंधित करबाक नियम लागू कैल जा सकैत छैक जाहि सँ एकर प्रचार-प्रसार कम स कम हो और अंततः ई समाप्ति केर डेग दिश अग्रसर हो। तमाकूल सँ घटे-घाटा। तमाकूल में मादकता अथवा उत्तेजना प्रदान कर’ वला मुख्य घटक निकोटीन (Nicotine) होइत छैक। यैह तत्व सबस अधिक मारुक सेहो होइत छैक। एकर अतिरिक्त तमाकूल में अनेक तरहक कैंसर उत्पन्न कर’ वला तत्व पायल जाइत छैक। तमाकूल के सेवन सँ मुँह, घेंट, श्वांसनली आ फेफड़ा केर कैंसर (Mouth, throat and lung cancer) होबाक सम्भावना रहैत छैक। बिमारिक अंत अतै नहि होइत छैक एते धरि ह्रदय के बीमारी (Heart Disease), धमनी काठिन्यता, उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure), पेटक अल्सर (Stomach Ulcer), अम्लपित (Acidity), अनिद्रा (insomnia) आदि रोगक सम्भावना तमाकूल केर उत्पाद केर सेवन सँ बढ़ि जाइत छैक।
आदिवासी समाज में सेहो बनिया सब स्त्री-पुरुख दुनू के तमाकूल आ एकरा सं निर्मित अनेक वस्तु के लति लगा देने छैक। तमाकूल केर सेवन एक पैघ समस्या अछि। मोन आ शरीर दुनू के सर्वनाश क रहल अछि। अहि पर सोचब जरुरी अछि। हम एहि कथ्य के माध्यम सं किनको ऊँच-नीच नहि कहि रहल छी। केवल यैह जे ई बहुत खराप इलम अछि, एकर त्याग करक चाही।।
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| लेखकः,कवि- कैलाश कुमार मिश्र जी |
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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