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रही जुड़ायल प्रासंगिक कते जूड़शीतल छै

रही जुड़ायल  प्रासंगिक कते जूड़शीतल छै 


✍👤अश्विनी कुमार तिवारी 
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अखनौ जँ मन भाव बचल छै , 
प्रकृति माय के हाथ बनल छै ।
सदति रहब जुड़ायल माटि सँ ,
जूड़ शीतल के भाव सकल छै ॥

जल चक्रणके बुझियौ निमित ,
पोखरि खत्ताके भाव प्रबल छै ।
गाछ बिरिछ के जड़िमे पानि ,
चर अचर अनुराग जुड़ल छै ॥

नहि हो ब्यर्थ समय कनिको ,
बसियौरा के प्रथा बनल छै ।
दिवस प्रकृति के एक दियौ ,
जगताधारके जल सम्बल छै ॥

आगत मौसम के छै तैयारी ,
संक्रांति काल भाव प्रबल छै ।
जल संकट के भावी युग मे ,
प्रासंगिक कते जूड़शीतल छै ॥

रही जुड़ायल माटि पानि सँ ,
अश्विनीक मनआस अटल छै ।
जीवन के तखने किछु माने ,
आँखिमे जँ पानि बचल छै ॥

---- ✍👤अश्विनी कुमार तिवारी 



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पोस्ट - अशोक कुमार सहनी

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