माय बाप के बिसरि के बाबू
🙏🌹माय बाप के बिसरि के बाबू 🌹🙏
✍👤मणि कान्त झा
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माय बाप के बिसरि के बाबू
कोना बसब परदेश यौ
हुनको अहॉ ध्यान करूँ यौ
घूरि अाबू अपने देश यौ॥१॥
माय अहॉ के मैया पर्वती
पिता प्रतिपालक महेश यौ
बाबू भैया घूरि के देखू
अहूँ बनूँ पुत्र गणेश यौ ॥२॥
जिनगी मे पाय बहुत कमेलाहूँ
कमाऊ जन्मदाता के अशेष यौ
हुनके अहॉ चरण रज पाबूँ
सब सुख शान्ति विशेष यौ ॥३॥
धरा आनि ओ हर्षित भेलाह
मोह फॉस पड़ि सब गमोलाह
अपन मनोरथ मे आगि लगा कँ
अहॉ के जीवन जोत जड़ेलाह ॥४॥
पहिल मास्टरनी माये बनलिह
देव पितर के ओ चिन्हबेलिह
सबसे बेसी बुद्धियार बनाके
आइ ओ कोना बकलेल यौ ॥५॥
नेना छलाहूँ कोरा ओ उठेलाह
पेट काटि ओ लॉट बनेलाह
पढ़ि लिखि बौआ हाकीम बनल
छनि अहॉ पर बड्ड गुमान यौ ॥६॥
राज काज मे सेट यौ बाबू
छी अपना मे अहॉ परफेक्ट यौ
देश विदेश अहॉ जेट सँ धूमैय छी
ओ कोना एतेक अपसेट यौ ॥७॥
लोक पूछैयत छनि बौआ कतय गेल
ओ हँसि करैयत अहीं के गुणगान यौ
मोनक बेथा ऑखि से निकलल
जखन अगल बगल नैं कियो आन यौ ॥८॥
अपन दु:ख बिसरि के बुढ़िया
अहीं लेल कर रहल अनघोल यौ
बौआ कखन घूरि घर ओताह
कखन सुनब हुनकर मिठगर बोल यौ ॥९॥
बिन माय बाप के ऋण उतारने
कोना बनब अहॉ उतृण यौ
जेहने करम करब हम अपन
हमरो ओहने एतैय दिन यौ ॥१०॥
************************************
-मणि'आमारूपी'- २९.०४.२०१७
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सब मातृ एवम् पिता तुल्य के हमर कोटि कोटि प्रणाम ।
श्रद्धेय मॉ बाबूजी के चरण वन्दन के संग इ प्रस्तुति ।
कोनो त्रृटि के क्षमा के संग
अहीं के
✍👤मणि कान्त झा
✍👤मणि कान्त झा
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माय बाप के बिसरि के बाबू
कोना बसब परदेश यौ
हुनको अहॉ ध्यान करूँ यौ
घूरि अाबू अपने देश यौ॥१॥
माय अहॉ के मैया पर्वती
पिता प्रतिपालक महेश यौ
बाबू भैया घूरि के देखू
अहूँ बनूँ पुत्र गणेश यौ ॥२॥
जिनगी मे पाय बहुत कमेलाहूँ
कमाऊ जन्मदाता के अशेष यौ
हुनके अहॉ चरण रज पाबूँ
सब सुख शान्ति विशेष यौ ॥३॥
धरा आनि ओ हर्षित भेलाह
मोह फॉस पड़ि सब गमोलाह
अपन मनोरथ मे आगि लगा कँ
अहॉ के जीवन जोत जड़ेलाह ॥४॥
पहिल मास्टरनी माये बनलिह
देव पितर के ओ चिन्हबेलिह
सबसे बेसी बुद्धियार बनाके
आइ ओ कोना बकलेल यौ ॥५॥
नेना छलाहूँ कोरा ओ उठेलाह
पेट काटि ओ लॉट बनेलाह
पढ़ि लिखि बौआ हाकीम बनल
छनि अहॉ पर बड्ड गुमान यौ ॥६॥
राज काज मे सेट यौ बाबू
छी अपना मे अहॉ परफेक्ट यौ
देश विदेश अहॉ जेट सँ धूमैय छी
ओ कोना एतेक अपसेट यौ ॥७॥
लोक पूछैयत छनि बौआ कतय गेल
ओ हँसि करैयत अहीं के गुणगान यौ
मोनक बेथा ऑखि से निकलल
जखन अगल बगल नैं कियो आन यौ ॥८॥
अपन दु:ख बिसरि के बुढ़िया
अहीं लेल कर रहल अनघोल यौ
बौआ कखन घूरि घर ओताह
कखन सुनब हुनकर मिठगर बोल यौ ॥९॥
बिन माय बाप के ऋण उतारने
कोना बनब अहॉ उतृण यौ
जेहने करम करब हम अपन
हमरो ओहने एतैय दिन यौ ॥१०॥
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-मणि'आमारूपी'- २९.०४.२०१७
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सब मातृ एवम् पिता तुल्य के हमर कोटि कोटि प्रणाम ।
श्रद्धेय मॉ बाबूजी के चरण वन्दन के संग इ प्रस्तुति ।
कोनो त्रृटि के क्षमा के संग
अहीं के
✍👤मणि कान्त झा

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