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आई सुदिन दिन मजदूरी के (लेख)

आई सुदिन दिन मजदूरी के 


डॉ. कैलाश कुमार मिश्र 

आई विश्व मजदूर दिवस अछि। समस्त विश्व सङ्गे भारत मे मज़दूर सँग केहेन शोषण भेल से हमरा सबके ज्ञात अछि। 
आई कनि बात शोषण आ मिथिला पर करी। मिथिला में कोना शोषण भेल सेहो हमरालोकनि जनैत छी। केना एक लाचार भूखे पियासे दग्धल महिला जेठक दुपहरिया में एक अठन्नी लेल भूख सँ बिलखैत नेना के आरि पर लेटा काज करैत अछि आ बदला में ओकरा घसल अठन्नी भेटैत छैक जे बाजार में कतहु नहि चलैत छैक; आ पुनः अहि आशा में जे गिरहत दोसर द देताह अबैत अछि त कोना ओकरा अपमानित होईत अपन प्राण सँ हाथ धोबय पड़ैत छैक तकर अद्भुत विवरण मधुप जी केर कालजयी कविता, "घसल अठन्नी" में देखल जा सकैत अछि। 

अगर ओहि कविता के आइयो इतिहासक गर्त में जा पढ़ब त सब नोर खसि पडत। 
लाचार भय मजदूर सब पहिने कोलकता आ बाद में मुम्बई, दिल्ली, असम, पंजाबक शरण मे गेल। जानवरक जीवन जिबैत अर्थोपार्जन केलक मुदा भद्र लोक अथवा इलीट के ओकर देहक गन्ध, चामक-घामक गन्ध, सुरती, तमाकूल आ बीड़ी के गंध कत बर्दास्त???
ऐना में बाबा बैद्यनाथ मिश्र 'यात्री'/ 'नागार्जुन' के घुमक्कड़ी सँ अनुभव भेल कवित्त वेदना आ संघर्ष के जेना एक एक छिलका ओदारैत हो!



नागार्जुन ई बझल छनि जे इलीट (अभिजनवादी) के सोच केहेन छैक। कुन मनोदशा में ओ रहि रहल अछि।  करैत किछु आर आ बजैत किछु आर। कथनी करनी के अंतर। जे सोच आई एक स्थापित इलीट संस्कृति में परिणत भ गेल अछि। जे कुनो बोझ उघैत, ठेला खिचैत, धुर-गरदा में भीजल  'ट्राम में डरे दुबकल बैसल  'कुली-मजदूर' के बगल में बैसबा में अपन स्तर के विपरीत बुझैत छथि।   बाबा नागार्जुन ओही इलीट सोच सँ निश्छल भाव मे पुछैत कहैत छथि: 

'पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचका
सटता है बदन से बदन-
पसीने से लथपथ
.......
सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है?
जी तो नहीं कुढ़ता है?
...कुली मजदूर हैं
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सटकर
आपस में उनकी बतकही
सच-सच बतलाओ
नागवार तो नहीं लगती है?
घिन तो नहीं आती है?

भाग्य एहि समाजक नीक रहैक जे प्रारम्भ में मधुप आ बाद में हुनके सङ्गे यात्री हिनक दुर्दशा, वेदना के अनुभव करैत लिखनाई शुरू केलनि। मैथिली आ हिंदी साहित्य में सेहो बाबा एकरा अपन रचनाधर्मिता के विषय बनोलनि। घाम के  गुण धर्म जेना बाबा के मन मे बिरडो उठेने होनि;

"क्षार-अम्ल
बिगलनकारी,दाहक
रेचक,उर्वरक
रिक्शेवाले की पीठ पर फटी बनियाइन
पसीने के गुण-धर्म को कर रही है प्रमाणित.."

यात्री के रूप में व्यग्र बाबा के एहो चिन्ता छनि जे बिना अन्न-वस्त्र-पानि के गरीबक नेना कोना पढ़तैक???
"अन्न नहि छैक
वस्त्र नहि छैक
गरीबक नेना कोना 
पढ़तैक रे"

बाबा कखनो मल्लाहक व्यथा, कखनो दूधबली फेकनी के व्यथा, कखनो बलचनमा केर व्यथा ओकरे चरित्र में घुसि करैत रहलनि। दुःखके अपन कवित्त आ साहित्य केर श्रृंगार बनोलनि। 

आई मजदूर दिवस पर एतबे।

✍👤 डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

लेखक - डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जी

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