बट सावित्री पूजा (बरसाइत) १ टा रचना के साथ मे - अप्पन मिथिला -Appanmithila is Maithili Portal for News ,Articles and Entertainment

Breaking News

बट सावित्री पूजा (बरसाइत) १ टा रचना के साथ मे

बट सावित्री पूजा (बरसाइत)


अशोक कुमार सहनी, अपन मिथिला / मिथिला में बट-सवित्रीक पर्व के बहुत प्रधानता देल गेल अछि जे पति के दीर्घायु और संतान प्राप्ति के लेल राखल जाइत छैक ! बरसाइत के नाम सअ प्रसिद्द और सावित्री-सत्यवान कथा सअ प्रेरित इ पाबनि आदर्श विवाहित मैथिल स्त्री के लेल बहुत पैघ पाबनि मानल जाइत अछि ! पति के दीर्घायु के लेल स्त्रीगण उपास में रहैत छैथ और बर (बरगद) के गाछ के पति मानि कअ पूजा के थाली में फल- फूल मिठाई , आम , लीची , धानक लाबा, चना , मूंग के अंकुरी, बर के फर आदि सअ पूजा करैत छैथ , रक्षा -सूत्र बांधैत छैथ , बीयनि सअ पंखा के हवा करैत छैथ और गला मिलैत छैथ ! पैघ शहर में बर के गाछ के ठाडी गमला में लगा कअ काज चला लेत छैथ ! नवविवाहिता के लेल सासुर सअ नव वस्त्र और सोलहो श्रृंगार के सामान के भार आबैत छैक ! एहन मान्यता छैक कि जेष्ठ अमावस्या के दिन वट वृक्ष के परिक्रमा करला पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश सुहागिन सब के सौभाग्यवती रहअ के वरदान दैत छथिन्ह !




बटसावित्री पूजा के एकटा रचना कवि,

शिव कुमार झा टिल्लू जी लिखने अछि 
**********************************************
चलू चलू बहिना हे ब'रक गाछतर पूजब बरसाइत
धरू हाथमे पूजाके डाली खोइँछामे वियनि 
सोझे एहिना'हे जल्दी एबै पाहुन एथिन किनसाइत !
लिय' फूलल बूटक चंगेरा लिच्ची आमसंग घौरकेरा 
जेठक महीना हे छुटत पसेना जेना नदी नहाइत !
वटमूल तीन देव वासा पूरत मोन राखल आशा 
कुलके नयना हे अबिते कटत सुखल कोखिक अहोराइत !
धरू माँथ सहेजिक' गौरी सखी बहिन समेटथि दौड़ी
बाजलि मयना हे फ'ल ग्रहण क' बीतत भक्तिके राति !

कोई टिप्पणी नहीं