इण्डिया गेट लग साहित्यक चौपाडि
इण्डिया गेट लग साहित्यक चौपाडि ,
✍👤कैलाश कुमार मिश्रा
कैलाश कुमार मिश्रा ,अपन मिथिला,दिल्ली/बैशाख ४गते, काल्हि अर्थात 16 अप्रैल क आधा मोन सँ मणिकांत झा, महेश झा, सुनित ठाकुर, संजीत झा सरस के प्रेमाधिक्य में केन्द्रीय सचिवालय लग प्रचंड गर्मी में 3 बजे दिन में साहित्यक चौपाडि में एक श्रोता के रूप में गेल रही। जखन कवि सबहक आ आयोजक लोकनि के उत्साह आ समर्पण देखल त लागल जे एतय एनाई एक उपलब्धि अछि।
बहुत नीक कार्यक्रम होईत अछि ई साहित्यक चौपाडि । हम 2 बेर एहि कार्यक्रम के साक्षी एक श्रोता के रूप में रहल छी। सब सँ पैघ बात ई जे नव लोक के, युवा के मैथिली साहित्य आ मिथिलाम के प्रति प्रवास में रहैत जे सिनेह आ लगाव देखैत छी ओ जेना सोझे गाम सँ मिथिलाक माटि सँ जोड़ि दैत हो!
आयोजक लोकनि के धन्यवाद। नव सृजनकर्मी के काव्य प्रतिभा देखि चमत्कृत छी।
कवि सबहक कविता में एना बुझना गेल जेना नव रस के सब रसक प्रयोग भेल हो। कियोक प्रेम त कियोक करुण, कियोक श्रृंगार, त कियोक बीभत्स, कियोक शौर्य त कियोक रौद्र, त कियोक हास्य कुनो रस छुटल नहि। बाह! बाह! बाह! हम आ हमरा सङ्गे सुनीत ठाकुर एवम 2 नव युवक अपना आप के श्रोता के रूप में धन्य बुझैत रही। आफ्टर इफ़ेक्ट एखनो तक अछिये।
अहु बातक बहुत संतोष भेल जे ओ सब महिला के सघन सहभागिता नहि पाबि दुखी छथि आ प्रयासरत छथि जे जनसंख्या केर आधा अधिकारिणी कथि लेल नहि आगा डेग द रहलि छथि?
किछु सबरंगी ज़िला, सबरंगी धर्म, सबरंगी जाति के लोक अहि में आबथि से हमर सभक साधल आ संयुक्त प्रयास हो। ई सांस्कृतिक चेतना केर मंच एकरंगी नुआ सँ बहुरंगी चुनरी बनत तखन साहित्य अपन सिंगार सँ चमत्कृत हैत।
एक चीज़ जे नीक लागल से ई जे जखन कविता पाठ चलैत छ्ल त एक मौलवी साहेब आबि क बगल में ठाढ़ भ गेला। हुनका नीरज कुमार 'नीरज' अपना लग बैसेलनि। ओ अंतिम धरि बैसल रहलनि। नीक लागल। बाद में कहला जे केवटी लग के छथि। अपन भाषा के लोक के देखला त ठमकि गेला। बाह! ई भेल मातृभाषा - देसिल बयना - के प्रति सहज अनुराग आ समर्पण।
कवि सब मे एहो देखल जे दूर देस में अपन देसक टीस जेना बेर-बेर चुभनि। मोन तिरपित भेल, आँखि नोरेबो कैल।
कतेक कवि नव शब्द, संस्कृतनिष्ठ शब्द के प्रयोग के कविता के गीतमय लयबद्ध केलनि त कतेक ठेठ देसी शब्द आ भाव के धेने रहलनि। किछु एहनो भेटलनि जे भाव आ कवित्तक धार के प्रवाह नहि टूटे ताहि लेल दोसरो भाषा के भाव आ शब्दावलि के मदति लेलनि। मुदा जड़ि में मैथिली आ मिथिलाक भाव बनल रहल।
सीता मिथिला के बेटी छथि, श्री छथि, शक्ति छथि, विश्व के उदाहरण छथि, अगर ओ ठानि लेथि त आततायी के संहारिका सेहो भ सकैत छथि, एहि भावक नाद घुमरि-घुमरि अबैत रहल। जखन कखनो कियोक एहेन भाव के व्यक्त करेलनि त सब करतल ध्वनि सँ शब्दक वेग सँ, आ मुखक सम्प्रेषण सँ एहि भाव के अपन बनबैत स्वीकार केलनि।
नीक इहो लागल जे लोक चौमासा, कजरी आदि के रचना दिल्ली में बैसल क रहल छथि, गाबि रहल छथि। पूर्णता आ संपूर्णता अलग बात छैक, सब सँ पैघ बात अपन संस्कृति सँ तारतम्य स्थापित केनाई, हम ओहि संस्कार आ भूमि के छी ताहि बात पर गर्व केनाई। से भाव सब सहभागी में भेटल।
ई प्लेटफार्म साहित्य के सब विधा - गद्य, नाट्य, संगीत - के नहु-नहु अपना सङ्गे आगा बढबय तेहेन अभिलाषा अछि।
पुनः आयोजक के, सब कवि के, श्रोता के, युवा के अहि तरहक जनजागरण अभियान आ पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म बनेबाक लेल साधुवाद।
लेखक- कैलाश कुमार मिश्रा
जयति मैथिली, जिबथु मैथिली ......।
💖🌍💖💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💚🌍
पोस्ट - अशोक कुमार सहनी
🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖
✍👤कैलाश कुमार मिश्रा
कैलाश कुमार मिश्रा ,अपन मिथिला,दिल्ली/बैशाख ४गते, काल्हि अर्थात 16 अप्रैल क आधा मोन सँ मणिकांत झा, महेश झा, सुनित ठाकुर, संजीत झा सरस के प्रेमाधिक्य में केन्द्रीय सचिवालय लग प्रचंड गर्मी में 3 बजे दिन में साहित्यक चौपाडि में एक श्रोता के रूप में गेल रही। जखन कवि सबहक आ आयोजक लोकनि के उत्साह आ समर्पण देखल त लागल जे एतय एनाई एक उपलब्धि अछि।
बहुत नीक कार्यक्रम होईत अछि ई साहित्यक चौपाडि । हम 2 बेर एहि कार्यक्रम के साक्षी एक श्रोता के रूप में रहल छी। सब सँ पैघ बात ई जे नव लोक के, युवा के मैथिली साहित्य आ मिथिलाम के प्रति प्रवास में रहैत जे सिनेह आ लगाव देखैत छी ओ जेना सोझे गाम सँ मिथिलाक माटि सँ जोड़ि दैत हो!
आयोजक लोकनि के धन्यवाद। नव सृजनकर्मी के काव्य प्रतिभा देखि चमत्कृत छी।
कवि सबहक कविता में एना बुझना गेल जेना नव रस के सब रसक प्रयोग भेल हो। कियोक प्रेम त कियोक करुण, कियोक श्रृंगार, त कियोक बीभत्स, कियोक शौर्य त कियोक रौद्र, त कियोक हास्य कुनो रस छुटल नहि। बाह! बाह! बाह! हम आ हमरा सङ्गे सुनीत ठाकुर एवम 2 नव युवक अपना आप के श्रोता के रूप में धन्य बुझैत रही। आफ्टर इफ़ेक्ट एखनो तक अछिये।
अहु बातक बहुत संतोष भेल जे ओ सब महिला के सघन सहभागिता नहि पाबि दुखी छथि आ प्रयासरत छथि जे जनसंख्या केर आधा अधिकारिणी कथि लेल नहि आगा डेग द रहलि छथि?
किछु सबरंगी ज़िला, सबरंगी धर्म, सबरंगी जाति के लोक अहि में आबथि से हमर सभक साधल आ संयुक्त प्रयास हो। ई सांस्कृतिक चेतना केर मंच एकरंगी नुआ सँ बहुरंगी चुनरी बनत तखन साहित्य अपन सिंगार सँ चमत्कृत हैत।
एक चीज़ जे नीक लागल से ई जे जखन कविता पाठ चलैत छ्ल त एक मौलवी साहेब आबि क बगल में ठाढ़ भ गेला। हुनका नीरज कुमार 'नीरज' अपना लग बैसेलनि। ओ अंतिम धरि बैसल रहलनि। नीक लागल। बाद में कहला जे केवटी लग के छथि। अपन भाषा के लोक के देखला त ठमकि गेला। बाह! ई भेल मातृभाषा - देसिल बयना - के प्रति सहज अनुराग आ समर्पण।
कवि सब मे एहो देखल जे दूर देस में अपन देसक टीस जेना बेर-बेर चुभनि। मोन तिरपित भेल, आँखि नोरेबो कैल।
कतेक कवि नव शब्द, संस्कृतनिष्ठ शब्द के प्रयोग के कविता के गीतमय लयबद्ध केलनि त कतेक ठेठ देसी शब्द आ भाव के धेने रहलनि। किछु एहनो भेटलनि जे भाव आ कवित्तक धार के प्रवाह नहि टूटे ताहि लेल दोसरो भाषा के भाव आ शब्दावलि के मदति लेलनि। मुदा जड़ि में मैथिली आ मिथिलाक भाव बनल रहल।
सीता मिथिला के बेटी छथि, श्री छथि, शक्ति छथि, विश्व के उदाहरण छथि, अगर ओ ठानि लेथि त आततायी के संहारिका सेहो भ सकैत छथि, एहि भावक नाद घुमरि-घुमरि अबैत रहल। जखन कखनो कियोक एहेन भाव के व्यक्त करेलनि त सब करतल ध्वनि सँ शब्दक वेग सँ, आ मुखक सम्प्रेषण सँ एहि भाव के अपन बनबैत स्वीकार केलनि।
नीक इहो लागल जे लोक चौमासा, कजरी आदि के रचना दिल्ली में बैसल क रहल छथि, गाबि रहल छथि। पूर्णता आ संपूर्णता अलग बात छैक, सब सँ पैघ बात अपन संस्कृति सँ तारतम्य स्थापित केनाई, हम ओहि संस्कार आ भूमि के छी ताहि बात पर गर्व केनाई। से भाव सब सहभागी में भेटल।
ई प्लेटफार्म साहित्य के सब विधा - गद्य, नाट्य, संगीत - के नहु-नहु अपना सङ्गे आगा बढबय तेहेन अभिलाषा अछि।
पुनः आयोजक के, सब कवि के, श्रोता के, युवा के अहि तरहक जनजागरण अभियान आ पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म बनेबाक लेल साधुवाद।
लेखक- कैलाश कुमार मिश्रा
जयति मैथिली, जिबथु मैथिली ......।
💖🌍💖💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💚🌍
पोस्ट - अशोक कुमार सहनी
🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖🌍💖

कोई टिप्पणी नहीं