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रदेशीमें जरल जुडशितल

🌍परदेशीमें जरल जुडशितल🌐


✍👤रंजीत झा 

असोरा पर निसोहर भऽ दादी,
बैसल छन्हि जुरायल पानि लऽ।
अरब मे हुनकर पोता,
बिसुकि रहल छैक सुख्खल चाँनि लऽ॥
केहन भेलै ई समय बज्जरखसुवा,
जुड़ल के आई जरा देलकै।
सखुवा सुखलै कोयल कनलै,
कोमल करेज कुहका देलकै॥
लड़कारी मे माथ सँ चुवैत छल,
जुडल पानि टघोर भऽ।
व्याह पानि परदेश मे भैया,
टघरे चाँनि अङोर भऽ॥
माटि मे तऽ परदेशो मे छि,
लेरहोने पुरे देह के।
मुदा ओ सोन्ह्गर कतऽ उधिएलै,
वो गमकैत माटि विदेह के॥

लेखक - रंजीत झा

कवि - रंजीत झा जी




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पोस्ट - अशोक कुमार सहनी
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