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कियैक ने गाबी हम गीत अपन अस्तित्व के

*उत्सव*

कियैक ने गाबी हम गीत अपन अस्तित्व के


✍👤प्रिय रंजन झा 


हमर मोनक नवका मेघ मे
उगल अछि नवका सुरूज
जतए  सहस्त्र उन्मुक्त चिड़ै
चिरमुक्त चिरुगुणक
सजौने अछि सतरंगा अरिपन

हम ताकि लेलहुँ अर्थ जिनगीक
गुणि लेलहुँ की दुनिया गोल अछि
घर जेना चौकर नहि
देवाल के रंग बादो
बहुत रास रंग अछि एहि नैनके लोभाब' के लेल
तहन
कियैक ने मनाउ हम उत्सव
अपन होयबाक
कियैक ने गाबी हम गीत अपन अस्तित्व के
कियैक ने नाची हम आई झूमिक 
कियैक त' पौलहुँ दोसर जनम हम
एहि जनम मे।

✍👤priyaranjan_jha'दड़िमा'

कवि - प्रिय रंजन झा जी 





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