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गाछसँ खसल पातक मोल (कविता)

गाछसँ खसल पातक मोल 


✍👤मैथिल प्रशान्त 

अहाँ नहि बुझबै
गाछसँ खसल पातक मोल 
अहाँके सुआद नहि लागत 
सुखाएल टटाएल पातमे ।

नहि कलशत 
हरियर-कचोर 
काव्य शाश्त्र -- शिल्प-छंद
मुदा हमर चुल्हि 
पजरैत छै 
इएह अबडेरल पात सभसँ । 

अहल भोरे 
हमर घरनी--- हमर कंटीरबी 
हाथमे खर्रा 
आ कखियाक' पथिया 
सहेजि आनैत छै 
अहींक कलम-गाछीसँ  
(अहाँक पत्नी 
जेना छोट बाकसमे 
किनि आनैत अछि गहना )
तहिना --खर-पात 
आ 
तखन पजरैत अछि 
हमर घ'रक चूल्हि 
आगि पजरलासँ 
मिझाइत छै 
धधकैत भूख ।

नहि पहुँचल अछि 
सरकारक 
उज्ज्वला जोजनाक 
एक्को ठोप इजोत 
हमर भनसा घरक 
चिनबार धरि ।

देसौंस लागि गेल छै 
सरकारक कागत पर 
चल'वला नीति सभकेँ 
जुड़ाएले केँ जुड़बति 
निघटि जाइ छै 
जुड़हरकेँ पानि 
हमर चैन 
जरले रहि जाइत अछि ।

कहियो माइट पर आबि देखियौ 
कोना घिसियौर कटैए 
अहाँक बड़का-बड़का बजट
ए. सी. मे बैस 
आकलन टा क' सकै छी 
रौदी-दाहड़, भूख ,अशिक्षा 
आदि-इत्यादिकेँ 
नहि बुझबै 
टाट-फरकमे 
रहयवला जीव-जंतुक दुख ।

~> मैथिल प्रशान्त 
  दुर्गौली, बेनीपट्टी ।।

कवि - मैथिल प्रशान्त जी

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