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"लोभ किय ?" (मैथिलि कबिता )

 "लोभ किय ?" (मैथिलि कबिता )
✍👤राम सोगारथ यादब

नै किन्को ई धर्ती अछी,
नै किन्को प्राकृतिक हावा ।
हम सब छि मानव जाती,
सब करै छि ऐहि गपक दवा ।।

बेकारके लडै छि जातिक लडाई,
चार पल के नेहमान मे ।
कोई नै छथिं फरक,
लागि जाउ मानव सम्मानमे ।।

छै ई हमर छै ई अहाँके,
मनमे रखनाईयो अछी भुल ।
संसार ऐकेटा अछी,
जे अछी प्रमात्मा गोरक धुल ।।
                      
चारपल के हमर अहाँक जिन्दगिमे,
 कोई नै अछी अपन नै कोई आन ।
 अन्तिम छनमे पुगिते धन,सम्पत्ति,
 संतान सब भजाईत अछी बिरान ।।

पृथ्वी एकटा मन्दिर अछी,
मानव जिकर पुजारी ।
ई हमर ई अहाँके जाईके बेरा,
जाई परैत छै सबके बैन भिखारी ।।

कमायल सम्पती छनिक खुसी, 
सम्मानक खुसी अ्मर अछी
तैयौं बेद भाव किय ?
सब नंगे आयल छि नंगे जायब,
 नै कोई बड नै कोई छोट,
 बुझितो सम्पतिके लोभ किय ?

✍👤राम सोगारथ यादव 
कवि - राम सोगारथ यादब जी

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