मैथिल छातीसँ मेटा रहल यऽ मिथिला
मैथिल छातीसँ मेटा रहल यऽ मिथिला
✍👤विद्यानन्द वेदर्दी
कित्ता कित्तामे बटा रहल यऽ मिथिला
अपने अपनेमे लुटा रहल यऽ मिथिला॥
वाभन टोली,यादव टोली,मण्डल टोली,
टोलीये टोलीमे फुटा रहल यऽ मिथिला॥
अहू-ओहू पार स्वर संवेदनाक गुञ्जए,
स्वार्थक रेतीसँ कटा रहल यऽ मिथिला॥
पश्चिमी प्रभावक चपेटमे पड़ि-पड़िकऽ,
मैथिल छातीसँ मेटा रहल यऽ मिथिला॥
जागू आ अस्तित्व जोगाबू सभ एक भऽ,
यौ मानचीत्रसँ छटा रहल यऽ मिथिला॥
______________________________
✍👤 विद्यानन्द वेदर्दी
राजबिराज, सप्तरी ,नेपाल
२०७४\०१\२९
✍👤विद्यानन्द वेदर्दी
कित्ता कित्तामे बटा रहल यऽ मिथिला
अपने अपनेमे लुटा रहल यऽ मिथिला॥
वाभन टोली,यादव टोली,मण्डल टोली,
टोलीये टोलीमे फुटा रहल यऽ मिथिला॥
अहू-ओहू पार स्वर संवेदनाक गुञ्जए,
स्वार्थक रेतीसँ कटा रहल यऽ मिथिला॥
पश्चिमी प्रभावक चपेटमे पड़ि-पड़िकऽ,
मैथिल छातीसँ मेटा रहल यऽ मिथिला॥
जागू आ अस्तित्व जोगाबू सभ एक भऽ,
यौ मानचीत्रसँ छटा रहल यऽ मिथिला॥
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✍👤 विद्यानन्द वेदर्दी
राजबिराज, सप्तरी ,नेपाल
२०७४\०१\२९
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| कवि - विद्यानन्द वेदर्दी जी |


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