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सात गोट लघु कविता (विकाश वत्सनाभ )

 सात गोट लघु कविता

 ✒👤विकाश वत्सनाभ 
______________
कबि- विकाश वत्सनाभ जी


|| उत्सव  ||

कहिओ,चेष्टा कएल पढ़बाक
अस्पतालक आगाँ
गेना फूलक माला बेचैत
ओहि नेनाक आँखिक भाषा (?)
मृत्यु सेहो एकटा उत्सव होइत अछि

||नवतुरिया ||

अहाँक कान्ह पर छथि मैथिली
आंजुर मे अछि संस्कार
मुदा, कपार पर एकटा बज्रलेप सेहो
नहि सम्हारि सकब ई सभ (?)
आब "मैथिल आँखि" सँ देखू अहाँलोकनि

||  जड़ी||

महसूस कएलहुँ अछि ओकर अकुलाहटि
जखन सगर राति
देबार सँ,
ओ गप करैत अछि अपन मातृभाषा मे
कतेक गहींर होइत अछि स्मृतिक जड़ि (?)

|| कविता  ||

आओर की कहबाक छलनि
कुलानन्द मिश्र केँ
यात्री,
किएक फोड़लनि अहिबातलक पातिल
राजकमल किएक
टावर चौक पर खोलितथि पानक दोकान
धधराक चेरा किएक दैत छथि हरेकृष्ण झा
ई प्रश्न नहि, परम्परा थिक
मैथिली कविताक "विकासक परंपरा"

|| प्रेम ||

अहाँक प्रतिमान तकैत
पहुँचैत छी अपन कविता धरि
शब्द, शिल्प, भाव आ भाषा
जेना पहिलुक भेंट मे
अहाँक टिकुली, काजर, अलता आ आँखि
अहीँ छी अपन प्रतिमान
मोनालिसा आ अहाँ मे अंतर अछि प्रिय

|| व्यवसाय ||

मंदिरक गर्भगृह मे विराजित अछि स्वर्णमूर्ति
चौखटि पर दानपात्र
प्रकृतिमय अछि टेलीविजनक विज्ञापन
टूथपेस्ट मे हवनक सामाग्री
आस्था आ व्यवसाय सहोदरि अछि एखन ।

|| शिक्षा ||

हमर कल्पना मे मृत्यु नहि
यात्राक संघर्ष अछि
इसकुलिया नेना सभक बस्ता मे
जाधरि नहि पहुँचल अछि हमर मातृभाषा ।

-विकाश वत्सनाभ
१५/७/२०१८

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