प्रेमक दीपक बारि लेलहुँ हम
सुखक जिनगी जारि लेलहुँ हम
अहीँक हृदयमे गुजर करब
घर --- दुआरि उजाडि. लेलहुँ हम
प्रिय ! हृदयँ केर आश नञि तोडू
अहीँ जीत लिय हारि लेलहुँ हम
अहीँक दरस ले विकल हृदय
मन कते थथमारि लेलहुँ हम
सुधिमे अहीँक आब मरि जाएब
मनहिँ मन विचारि लेलहुँ हम
✍ दीप नारायण विधार्थी
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