ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्यायः ७८
ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्यायः ७८
सिंहः प्रसेनं अवधीत्, सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदी तव हि एषः स्यमन्तकः ॥
अर्थात् सिंह प्रसेन केँ मारलाह, सिंह जाम्बवान् सँ मारल गेल, औ बौआ ! जूनि कानू! अहींक ई स्यमन्तक मणि अछि।
द्धारिकापूरी में सत्राजित नामक एक टा सूर्यभक्त निवास करैत छलाह हुनक भक्ति सँ प्रसन्न भ'अ सूर्य देव हुनका एक टा अमूल्य मणि प्रदान केलनि. मणि के प्रभाव स्वरुप कोनो प्रकारक भय केर समाप्ति भ'अ जाइत छल आ राज्य सब तरहें आपदा सँ मुक्त भ'अ जाइत छल. एक बेर भगवान श्रीकृष्ण राजा उग्रसेन कें उक्त मणि प्रदान करबाक बात सोचलनि. परञ्च सत्राजित एहि बात के जानि जाइत छथि. एहि कारण ओ मणि अपन भाई प्रसेन के द'अ देलनि.
परञ्च एक बेर जखन प्रसेन वन में शिकार के लेल गेला तँ ओ सिंह के द्वारा मारल गेलाह आ सिंह के मुंह में मणि देखि जांबवंत सिंह के मैर ओ मणि पाबि लैत छथि, प्रजा के जखन जांबवंत लग ओ मणि हेबाक बात का पता चलैत अछि त'अ ओ सब एकरा लेल कृष्ण के प्रसेन कें मैर मणि छीन लेबाक गप्प करय लगैत छथि. एहि आरोपक पता जखन श्रीकृष्ण के लगैत छैन्ह त'अ ओ बहुत दुखी होईत छथि आ प्रसेन के ताकय लेल निकैल पड़ैत छथि.
सघन वन में हुनका प्रसेन के मृत शरीर के समीप में सिंह आ जाम्बवंत के पैरक निशान दिखाई पड़ैत छैन्ह. ओ जाम्बवंत के लग पहुँच कय हुनका सँ मणि हुनका लग हेबाक कारण पुछैत छथि तखन जांबवंत हुनका संपूर्ण घटना क्रम के जानकारी दैत छथि. जाम्बवंत अपन पुत्री जाम्बवती केर विवाह श्रीकृष्ण सँ क'अ देलनि आ हुनका ओ स्यमंतक मणि प्रदान क'अ देलनि.
प्रजा के जखन सत्यक पता चलैत अछि त'अ ओ श्री कृष्ण सँ क्षमा याचना करैत छथि. यद्यपि ई कलंक मिथ्या सिद्ध होईत अछि परञ्च एहि दिन चंद्रक दर्शन करय सँ भगवान श्री कृष्ण पर सेहो मणि चोरी करबाक कलंक लागल छल आ श्रीकृष्ण जी के अपमान के भागी बनय पड़लनि.
© संस्कार
✍ नीरज मिश्र मुन्नू
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