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मैथिलीकेँ  चरण पखारैत गेलौं

मेटबति रहल हम  पारैत  गेलौं
जिनगी  अपन  सम्हारैत  गेलौं

सहि लै  छी गाइर  देलक क्यो
गर्दा उरौ देह बस  झारैत गेलौं

भाव  बिनु करेजा  पाथर बुझू
दुख  ककरो  नोर  ढारैत गेलौं

गेलै आँखि दने आगि  लेसक'
नेहक घूर सदति पजारैत गेलौं

सभतरि  जिबै  छी मैथिल बनि
मैथिलीकेँ  चरण पखारैत गेलौं

~> लेखक✍मैथिल प्रशान्त
  दुर्गौली, बेनीपट्टी ।

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