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बिला गेलियै यै चाँन हमर,जीवनक गगन सँ


बिला गेलियै यै चाँन हमर,जीवनक गगन सँ
मिट नै सकत अहाँके नाम कहियो ई मन सँ॥

जनमोक नाता क्षणे भरिमे तोडि देलौ किए?
एक-एकटा साँस पुछैय बेर-बेर धड़कन सँ॥

चाहैछी नै देखी फेर ओ भयाओन सुरतिया,
मूदा उतरै नै य' कखनो पियासल नयन सँ॥

ई करेजाक लहुँ ऊ माङ्गक सेनुर बनल रहै,
अहाँक सुहागके भगवान जी राखै जतन सँ॥

'विद्यानन्द' जीबैछै दिलके बढका बना एत',
'राधा' लोग कतौ नम्हर भेल छै कि धन सँ?
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    © विद्यानन्द वेदर्दी
      विराटनगर,मोरङ्ग
      » 2073/05/29 (वेरसपति)

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